Wednesday, 8 October 2014

दीवार पत्रिका ‘नवांकुर’-चुनौतीपूर्ण सफलता की कहानी

दीवार पत्रिका के अभियान को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से पिछले दिनों फेसबुक में एक समूह का निर्माण किया गया।उससे लोगों के जुड़ाव को देखते हुए कुछ मित्रों ने सुझाव दिया कि क्यों न इसके लिए एक ब्लाॅग का निर्माण किया जाय, ताकि दीवार पत्रिका से संबंधित संपूर्ण सामग्री एक स्थान पर आसानी से उपलब्ध हो सके। मुझे यह सुझाव अनुकरणीय लगा। हम इस ब्लाॅग में दीवार पत्रिका से संबंधित आलेख, अनुभव, गतिविधियां, फोटो,विभिन्न स्कूलांे में निकल रही दीवार पत्रिकाओं की समीक्षा तथा उनमें प्रकाशित महत्वपूर्ण रचनाओं को स्थान देंगे।
इसकी शुरूआत हम कवि-शिक्षक मित्र चितांमणि जोशी जी के अनुभव से कर रहे हैं। आशा है आपको यह अनुभव पसंद ही नहीं आएगा बल्कि आपको भी अपने अनुभव लिखने के लिए प्रेरित करेगा। श्री जोशी उन शिक्षकों में से हैं, बच्चों में रचनात्मकता का विकास करना जिनकी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रहता है। वह शिक्षा में नित नए प्रयोग करते रहते हैं।आईये दीवार पत्रिका को लेकर किये गए उनके नए प्रयोग से परिचित होते हैं ...........

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01 अक्टूबर 2014, राजकीय इण्टर कालेज टोटानौला की दीवार पत्रिका ‘नवांकुर’ का अंक - 4 लगभग तैयार था। पत्रिका के कला संपादक अंशु कापड़ी स्केच पेन व स्केल की सहायता से आलेखों की आउटलाइन तैयार कर रहे थे। प्रीति, स्टैपलर, कैंची, टेप, तागा, गोंद की बोतल, मार्कर,कटर आदि संभालकर भाषा प्रयोगशाला में यथास्थान रख रहीं थीं। सम्पादक एवं प्रबन्धन मंडल के अन्य सदस्य विद्यार्थी प्रशंसात्मक निगाहों से पत्रिका को निहार रहे थे। मैं भी अपने विद्यार्थियों की उपलब्धि पर संतुष्टि का भाव ओढ़कर अतीत में पहुँच गया।
    मैंने 90 के दशक में एक पब्लिक स्कूल में अध्यापन करते हुए एक वर्ष तक बच्चांे की हस्तलिखित बाल पत्रिका ‘चाकेलेट’ का प्रकाशन किया था और अनुभव किया था कि यदि उचित प्रकार से सूचनाएं मिलें तो बच्चे अपनी रचनाशीलता से आश्चर्यजनक सृजन कर लेते हैं। अपने पूर्व विद्यालय राजकीय इण्टर कालेज गौड़ीहाट में भी मैंने प्रयास किये। गौरव ठकुन्ना,रोशन धारियाल, ज्योति, कैलास के छोटे-छोटे आलेख, कवितायें अमर उजाला के ‘आपका कोना’ में छपीं। रेनू खेड़ा, भारती की कविताएं बाल प्रहरी में छपी। लेकिन दो वर्ष के प्रयास के बाद भी मैं दीवार पत्रिका का एक ही अंक निकाल पाया। आज पीछे मुड़कर देखता  हूँ तो  इस असफलता के पीछे कतिपय कारण समझ आते हैं यथा संस्थाध्यक्ष को विश्वास में न ले पाना, पुस्तकालय का प्रभार अपने पास न होना, वाचनालय कक्ष का न होना, उद्देश्य प्राप्ति हेतु कमजोर इच्छाशक्ति आदि।
    बरहाल 01 नवम्बर,2013 को राजकीय इण्टर कालेज टोटानौला में कार्यभार ग्रहण करने के साथ मंैने उक्त कमजोरियों को ही अपना हथियार बनाया। प्रधानाचार्य ने कहा- एक प्रभार आपकेा दंेगें। मंैने पुस्तकालय मांग लिया। पुुस्तकालय प्रभार माने प्रधानाचार्य कक्ष मंे ही एक कोने पर रखी पुस्तकों से भरी दो अलमारियांे की चाबियों का गुच्छा।
    शिक्षक साथी अर्धवार्षिक परीक्षा के परीक्षाफल निर्माण में लगे थे। कक्षा शिक्षण सुचारू नही था। मैं विद्यालय में वर्तमान में जिम्मेदारी विहीन नया शिक्षक था। बच्चे लिखें, इससे पहले जरूरी है कि उनमें पढ़ने की आदत विकसित हो और विविध विधाओं के प्रति रूचि विकसित हो। मैंने मध्यान्तर के बाद बच्चों को बड़े समूह मे बिठाकर इस दिशा में प्रयास प्रारम्भ कर दिये। मेरे पास बच्चों की बाल धमाल, चम्पक, नन्दन, बाल प्रहरी, ज्ञान विज्ञान बुलेटिन की लगभग 30 प्रतियां     थीं जो मैंने कक्षावार बदल-बदल कर पढ़ने की सलाह के साथ बांट दीं। विविध प्रसंगों पर तत्काल कहानियां गढ़कर सुनाईं। तमाम विषयों पर तत्काल कविताएँ रचकर सुनाई। दीवार पत्रिका क्या, क्यों, कैसे पर बातें कीं। कहानी कैसे बनायंे, कविता कैसे बनायें पर चर्चा की। फिर एक दिन कहानी और एक दिन कविता निर्माण पर अभ्यास कार्य हुआ। कहानी के लिए विषय दिया-‘ एक था.............’ और कविता के लिए- ‘माँ’, ‘चिड़िया’, ‘वृक्ष’, ‘मेरा स्कूल’ में से कोई एक। बच्चे शुरू हो गये। जो कविता, कहानी नहीं बना पा रहे थे उन्हें लघु निबन्ध लिखने या चित्र बनाने के लिए प्रेरित किया। हाँ, इस बीच विभिन्न स्कूली पत्रिकाआंे में छपी बच्चों की रचनाओं व बालप्रहरी में छपीं गौड़ीहाट के विद्यार्थियों की कविताओं व अन्य रचनाआंे ने भी बच्चों के लिए अच्छे प्रेेरक का काम किया। लगभग एक हफ्ते की इस कार्यशाला के बाद मेरी फाईल में पर्याप्त महत्वपूर्ण सामग्री जमा हो गई थी- पुनरावलोकन, पुनर्लेखन एवं प्रबन्धन की प्रतीक्षा में।
    पुस्तकालय एवं वाचनालय हेतु कक्ष की आवश्यकता थी। जहाॅ भाषा प्रयोगशाला भी मैं विकसित करना चाहता था और दीवार पत्रिका का भी प्रबन्धन होता। प्रधानाचार्य जी ने असमर्थता जतायी। विद्यालय में एक कक्ष लगभग 20× 12 फिट का निष्प्रयोज्य था। बन्द पड़ा था। छत पर पानी का तालाब। खोला तो जगह-जगह पर टपक रहा था। दीवारों पर सीलन थी। मैन सोचा बैठे से बेगार भला। बच्चों ने कमरा साफ किया। पीछे की मिट्टी हटाई। एक सप्ताह तक खिड़की- दरवाजे खुले रखे। कमरा सूख गया। पुस्तकालय की अलमारियाँ शिफ्ट कीं। कुर्सी-टेबल लगाये। बैंच-टेबल लगाकर एक तरफ वाचनालय बनाया। दूसरे दिन सूखी दीवार के सहारे मेजें लगाकर मैनें अपना अंग्रेजी भाषा सिखाने का टी.एल.एम. एवं पोस्टर सजा दिये। मैने बच्चों से कहा-‘देखो! हम अपने खिड़की-दरवाजे खुले रखते हैं तो हमारे अन्दर की सीलन सूख जाती हैं।’ बच्चे भी खुश थे। अब तक पढ़़ने लिखने में विशेष रूचि रखने वाले बच्चों की पहचान हो चुकी थी। बैठक हुई। चर्चा के बाद पत्रिका के लिए ‘नवांकुर’ नाम का चयन किया गया। कथंाकुर, काव्यांकुर, ज्ञानविज्ञान, न्यूज डायरी, साक्षात्कार, फन टाइम, विविध आदि स्तम्भ निर्धारित किये गये। प्रधानाचार्य के संरक्षण में निदेशक तथा सम्पादक मण्डल का गठन किया गया। निदेशक मण्डल मंें भाषा, विज्ञान,कला तथा चित्रकला के अध्यापक सम्मिलित किये गये। इन सभी गति विधियों को सम्पादित करते-करते दिसम्बर माह के तीन सप्ताह बीत गये एवं विद्यालय शीतावकाश के लिए बन्द हो गया।
    फरवरी 2014 में सम्पादक मण्डल ने संकलित रचनाआंे में से चयनित रचनाओं को सफेद कागजों के साथ पुनर्लेखन हेतु विद्यार्थियों को सांेप दिया और अन्ततः 11 मार्च, 2014 को एस.एम.सी. की बैठक में ‘नवांकुर’ के प्रथम अंक का विमोचन किया गया साथ ही सुखद समीक्षा भी।
 सफलता और संतुष्टि चुनौतियां भी साथ  में लाती हैं। अगले दिन बच्चों ने मुख्य भवन की दीवार पर तीन कीलें लगाकर पत्रिका टांग दी। बच्चे अपनी व अपने साथियों की रचनायें एवं नाम पढ़ते हुए काफी खुश भी दिखे। बच्चे रचनात्मक, खोजी, चटपट ही नहीं, नटखट भी होते हैं। दूसरे  दिन दीवार से कीलें गायब मिलीं। अबकी बार बच्चों  ने  बरामदे की मजबूत दीवार पर कीलें ठोकीं। एक-एक कील ठोकने में दस मिनट लगे। हजम। दो दिन बाद अपने नटखट दोस्त ने पीट-पीट कर तीनों कीलें दीवार के अन्दर ही हजम कर दीं।
    बाल सदस्य खाली वादनों में या मध्यान्तर मंे वाचनालय में बैठकर दूसरे अंक की तैयारी करते थे। ओफ्फो ! आज नटखट ने दरवाजे के ताले के अन्दर लकड़ियां ठूंस दी हैं। बच्चों ने परकार की नोक से चूरकर लकड़ी निकाली। ताला खोला। एक दिन बाद तो असामाजिक तत्व ने हद ही कर दी। पहले ताले में छोटे-छोटे कंकड ठंूसे फिर पाॅलीथीन पिघलाकर ताले को शील ही कर दिया। सारे प्रयास विफल होने पर ताले को काटना पड़ा। न चाहते हुए भी अगले दिन प्रार्थना सभा में बुरे कार्य के लिए ईश्वर के अभिशाप का भय दिखाना पड़ा।
    दीवार पत्रिका चंूकि कक्षा शिक्षण का ही पूरक कार्य हैं। पाठ्यचर्या का तो हमें इसे हिस्सा बनाना पड़ता हैं। योजना थी हर माह एक अंक तैयार करने की। लेकिन बच्चों को दूसरा अंक तैयार करने में दो माह लग गये।
अगस्त माह में ‘नवांकुर’ का अंक -3 तैयार हुआ। स्वतंत्रता दिवस अंक। इस बीच पत्रिका के कलेवर मंे तो सुधार आ ही रहा था बाल रचनाकार धीरे-धीरे स्वतंत्र लेखन एवं मौलिकता की ओर भी बढ़ रहे थे। लगभग 100 के आसपास विद्यार्थी लेखन या चित्रांकन कर चुके थे।
    अंक- 4 की तैयारी के दौरान अनुभव हुआ कि रचना कार्य एवं प्रबन्धन में कुछ नीरसता आ रही है। इस अंक हेतु  संपादक मण्डल पूर्व योजना अनुसार विद्यालय के एक शिक्षक का साक्षात्कार भी नही ले पाया। कारण कुछ भी हो सकते हैं। बच्चों का मन कोमल होता हैं। कभी भी कहीं विचलित हो  सकता हैं। कोई भी उन्हें बरगला सकता है- तुम्हें लेखक नही इंजीनियर,डाक्टर बनना हैं। प्रबन्धन मै यदि कुछ ही बच्चे सक्रिय हों तो उन्हे अरूचि भी हो सकती हैं। एतदर्थ मार्ग दर्शक शिक्षक की आॅंख- कान ख्ुाले रहना जरूरी हैं। प्रत्येक वर्ष पुनर्गठन एवं प्रत्येक कक्षा, प्रत्येक विद्यार्थी की भागीदारी आवश्यक हैं। बहरहाल बच्चों की क्षमता व कौशल को पुनः ललकारा गया, पुनः उन्हें प्रेरित किया गया और सप्ताह भर की देरी से ही सही 01 अक्टूबर को नवाॅंकुर का अंक 04 भी दीवार पर आ ही गया। देर आया लेकिन दुरस्त आया।
    दीवार पत्रिका के लिए किसी बजट का अलग से  प्राविधान तो है नही अतः मार्गदर्शक शिक्षक को सफेद कागज, मार्कर, स्केच पेन, गोद, स्टैपलर, कटर आदि क लिए स्वयं संसाधन जुटाने को तत्पर रहना पड़ता हैं। बच्चे अपनी अभ्यास पुस्तिका के पन्ने फाड़ें, शोभा नही देता।
    नवाॅंकुर का पाॅचवा अंक निर्माण प्रक्रिया में है। विश्वास है, सभी बाधाओं को बहाते हुए यह प्रवाह जारी रहेगा- भाषा के लिए ज्ञान के लिए विज्ञान के लिए विकास के लिए....................

 -चिन्तामणि जोशी, भाषा अध्यापक

2 comments:

  1. आपके कार्य को देख कर प्रोत्साहन मिल रहा है और आगे बढ़ने की राह भी शुक्रिया .

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