प्रमोद दीक्षित जी से मेरा पहला परिचय यहीं ‘शैक्षिक दखल’ के बहाने हुआ,जो
दीवार पत्रिका के प्रति उनकी सहज जिज्ञासा से
प्रगाढ़ हुआ। फिर तो संवाद का एक सिलसिला ही चल पड़ा। उनके भीतर मुझे
नवाचारों के प्रति गहरा लगाव और किसी भी नवाचार को अभियान में बदल देने की अद्भुत
क्षमता दिखाई देती है। ‘शैक्षिक संवाद मंच’ के माध्यम से वह
नवाचारों को स्कूल-स्कूल तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। इसके पीछे
उनकी मंशा है कि ‘विद्यालय आनंदालय
बनें।’ इस उद्देश्य से वह न
केवल समानधर्मा और नवाचारी शिक्षकों से ही
संवाद स्थापित कर रहे हैं बल्कि समुदाय से भी जीवंत संबंध स्थापित करने की कोशिश
में लगे हैं। बच्चों की रचनात्मकता का विकास उनकी इस कोशिश के केंद्र में है।
बच्चों की अभिव्यक्ति को मंच प्रदान करने के उद्देश्य से वह अपने विकास खंड में
शिक्षक साथियों के साथ मिलकर लंबे समय से विभिन्न विद्यालयों में सफलतापूर्वक बाल
अखबार निकालते रहे हैं। इधर उन्होंने दीवार पत्रिका अभियान को आगे बढाने का संकल्प
लिया है। उनके द्वारा दीवार पत्रिका निर्माण पर पिछले दिनों एक कार्यशाला का आयोजन
किया गया जिसका रोचक अनुभव उन्हीं के शब्दों में यहां प्रस्तुत है-
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भाषायी कौशलों के विकास के लिए एक कारगर
माध्यम
प्रमोद दीक्षित ‘मलय’
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मैं ब्लाक संसाधन
केन्द्र नरैनी जिला बाँदा में सह समन्वयक (हिन्दी) पद पर कार्यरत हूँ। अनुश्रवण और
अनुसमर्थन के लिए क्षेत्र के विद्यालयों में जाना होता है। बच्चों से बातचीत करते
हुए मैंने अनुभव किया बच्चों में अभिव्यक्ति का अभाव है। इन बच्चों को विद्यालयों में मुक्त चिंतन के ऐसे अवसर नहीं मिले कि वे
खुलकर बातचीत कर सकें। यह भी सम्भव है कि घर-पड़ोस में सहज और मौलिक अभिव्यक्ति का
माहौल न मिल पाया हो। मैं जब भी उनसे बातें करता तो पाता कि वे प्रायः चुप रहते, और विषयगत जानकारी
होते हुए भी वे उसे व्यक्त न कर पाते। मेरी दिली इच्छा होती कि ये सब आँख में आँख
डालकर सहज होकर बातें करें। केवल विषय ही नहीं वरन उनसे जुडी हर छोटी-बडी बात पर
विचार रख सकें, लिख सकें। मुझे लगा
कि उन्हे केवल प्रोत्साहन की जरूरत है। नये-नये विकल्प, चुनौतियाँ और अवसर देने की देर है। उनमें उर्जा है, उत्साह है, उमंग है। वे जीवन के
विस्तृत फलक में तारों की मानिंद चमकने को तैयार हैं।
विद्यालय आनन्द घर बनें ऐसी रचनात्मक सोच
लेकर लगभग दो वर्ष पूर्व मैंने कुछ शिक्षकों के साथ मिलकर ‘शैक्षिक संवाद मंच’ का गठन कर अपनी नवाचारी शैक्षिक यात्रा
प्रारम्भ की थी। मंच का मानना है कि शिक्षा का अधिकार तथा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की
रूपरेखा 2005 के सुझावों को अपनाते हुये विद्यालय का परिवेश, बच्चों से
मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध, समुदाय का विद्यालय से जुडाव, विद्यालय प्रबन्ध
समिति की सक्रियता के साथ-साथ कक्षाओं में भय, तनाव एवं दण्ड से
परे हटकर प्रेम भरा वातावरण बने। बच्चे अपने मन की बात सहज रूप से कह सकें। उनमें
अभिव्यक्ति कौशल का विकास हो। लेकिन देखने में यह आता है कि बच्चा विद्यालय में भय, तनाव, कुण्ठा की चादर ओढ़े सहमा-सहमा सा रहता है। विद्यालय उसके लिये
कैदखाने बन गये है। जहाँ उनकी इच्छा, आकांक्षा और इन्द्रधनुषी सपनो को कोई महत्व नहीं मिलता।
उसके मन में घुमडती जिज्ञासा एवं प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं। वहाँ अभिव्यक्ति
के न तो अवसर है और न ही चुनौतियाँ। जरूरत है बच्चों को ऐसे अवसर उपलब्ध कराने की
जहाँ वे मन की बात व्यक्त कर सकें।
बच्चों की अभिव्यक्ति की दृष्टि से विद्यालयों में ‘दीवार पत्रिका’ के प्रकाशन को एक सर्व सुलभ और सहज अवसर के
रूप में देखा जा सकता है । भाषायी कौशलों के विकास के लिए भी यह एक बेहतर और कारगर
माध्यम सिद्ध हो सकता है।
शैक्षिक संवाद मंच
ने मंच से जुडे शिक्षकों में दीवार पत्रिका की आवश्यकता, महत्व, रचना प्रक्रिया एवं
समझ विकसित करने की दृष्टि से 17 अगस्त रविवार को प्राथमिक
विद्यालय सेमरिया कुशल क्षेत्र नरैनी (बाँदा) में दीवार पत्रिका निर्माण विषयक एक
दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया। 16 विद्यालयों के 20 शिक्षक /शिक्षिकाओं ने प्रतिभाग किया। लगभग सभी सहभागी ‘दीवार पत्रिका’ से न केवल अनजान थे बल्कि वे ऐसी किसी
पत्रिका के बारे में पहली बार सुन रहे थे।उन्हें कोई कल्पना नहीं थी कि दीवार
पत्रिका क्या है, कैसे बनायी जाती है
और उसमें सामग्री कैसी होगी। लेकिन उनमें कुछ नया सीखने की ललक और उत्सुकता थी, वे जानना-समझना चाह
रहे थे। मेरे सामने दो रास्ते थे, पहला कि मैं स्वयं अपनी समझ अनुसार दीवार पत्रिका पर उन्हे
जानकारी दूँ जोकि एक प्रकार का व्याख्यान ही होगा और वे केवल मूकश्रोता रहेंगे। सहभागियों की उसमें कोई सक्रियता
नहीं होगी। दूसरे कि मैं उनके सम्मुख स्वयं चिन्तन और कल्पना की चुनौती रखूँ।
मैंने दूसरा रास्ता चुनते हुए सर्वप्रथम सभी से दीवार पत्रिका पर उनके विचार रखने
को कहा। शायद वे उसके लिए तैयार न थे। कक्ष में थोडी देर सन्नाटा पसरा रहा, कोई कुछ बोल नहीं पा
रहा था। मैं उनमें झिझक देख रहा था। कोई
पहल नहीं करना चाहता था क्योंकि यह बिल्कुल नया विषय था और मन में एक डर था कि वे
कहीं गलत न हो जायें। मैंने उन्हें प्रोत्साहन देते हुए कहा कि दीवार पत्रिका के
सम्बन्ध में जो कुछ भी समझ और कल्पना बन रही हो, व्यक्त करें। मैं
चाह रहा था कि वे कल्पना करें, सोचे-विचारे और चुनौती से जूझें। धीरे-धीरे बोलना शुरू हुआ
तो सभी ने अपने विचार रखे। दीवार पत्रिका कैसे बनायी जाये - इस पर चर्चा हुयी।
दो प्रकार की बातें उभर कर आईं पहला यह कि कक्षा-कक्ष की दीवारों पर गीत, कहानी, कविता, समाचार लिखना दीवार
पत्रिका है। दूसरे यह कि दीवारों पर रचनाएँ लिखे कागज चिपकाने पर तैयार पत्रिका को
दीवार पत्रिका कहेंगे। लेकिन इन दोनों ही स्थितियों में दीवारों के गंदा होने की
बात सामने आई। सभी सहमत थे कि दीवारें गन्दी नहीं होनी चाहिए। तो फिर क्या किया जाये - सब उत्तर खोज रहे
थे। पुनः नये विचार आये कुछ प्रतिभागियों का मत था कि कागजों पर रचनाएँ चिपका कर
दीवार पर टाँगा जा सकता है। तो अन्य का विचार था कि रचनाएँ लिखे कागज चार्ट पर
चिपकाये जा सकते हैं। यह टिकाउ रहेगा और सुन्दर भी। तो किसी ने कहा कि यह खर्चीला
होगा, क्यों न प्रयोग किये
गये पुराने चार्ट पर पीछे की ओर रचनाएँ चिपकाईं जायें। वातावरण बन रहा था। अब
सक्रियता थी, उत्साह था और नई-नई
बातें निकल कर आ रहीं थीं। किसी ने कहा कि क्यों न इसमें उपर और नीचे की ओर एक-एक
पतली डन्डी बाँध दी जाये ताकि पत्रिका को टाँगना आसान और सुरक्षित हो जाये और
दीवार में कील पर सुतली से टाँग दिया जाये। इससे बच्चे आसानी से पत्रिका पढ़
सकेंगे। मुझे लगा कि अब समझ बन रही है। मैंने चर्चा को आगे बढ़ाना उचित समझा और
किसी विद्यालय में दीवार पत्रिका की आवश्यकता पर उनके विचार रखने को कहा। विचार
प्रवाह गति पकड़ चुका था। प्राप्त विचारों का समेकन यह था कि दीवार पत्रिका बच्चों
की अपनी पत्रिका है जिसमें वे गीत, कहानी, कविता, पहेली, चुटकुले, विद्यालय की गतिविधियाँ, गाँव के समाचार, चित्र, साक्षात्कार, सम्पादकीय दे सकते
हैं। विद्यालय में बच्चों द्वारा दीवार पत्रिका बनाने से बच्चों को अपनी बात कहने
को एक मंच मिलेगा, उनकी झिझक दूर होगी।
बच्चों में लेखन कला, कल्पना, चिन्तन और तर्कशक्ति का विकास होगा । कलात्मक अभिरूचि
जगेगी। उनमें समस्यायों से जूझने और समाधान खोजने की समझ विकसित होगी। समुदाय से
निकटता आयेगी। पत्रिका हेतु सामग्री चयन की दृष्टि पैदा होगी। सामूहिकता और
सामाजिक समरसता का पाठ पढ़ सकेंगे। सौन्दर्य बोध और पारस्परिक सामंजस्य के सूत्र
पकड़ सकेंगे। रचनात्मक वातावरण बनेगा। बातों के सूत्र से सूत्र जुडते चले जा रहे
थे। तभी मैंने कहा कि एक शिक्षक हैं जिन्होंने अपने विद्यालय में दीवार पत्रिका पर
बच्चों के साथ काम किया है, यदि आप चाहें तो उनसे बात करके उनके अनुभव से अपनी समझ
बेहतर की जा सकती है। सभी बात करने को उत्सुक थे। मैंने उत्तराखण्ड मे कार्यरत
शिक्षक साथी श्री महेश पुनेठा जी से मोबाइल पर सम्पर्क स्थापित किया। संवाद का मंच
तैयार था। सभी सहभागियों ने औपचारिक अभिवादन के बाद एक चेतना गीत -
‘धीरे -धीरे यहाँ का मौसम बदलने लगा है। वातावरण
सो रहा था अब आँख मलने लगा है ।’का सामूहिक गायन
किया। सबने मोबाइल पर महेश पुनेठा जी से बात की। पुनेठा जी ने दीवार पत्रिका के
बारे में बोलते हुए कहा- “भाषायी दक्षता के
विकास के लिए जरूरी है कि बच्चों को स्वतंत्र चिंतन और भाषायी कौशलों के विकास के
लिए अधिकाधिक अवसर प्रदान किए जाएं। बच्चे भाषायी कौशलों का जितना अधिक अभ्यास करेंगे
उनकी भाषायी दक्षता उतनी अधिक बढ़ेगी। भाषायी कौशलों के अभ्यास के लिए विशेषकर लेखन
कौशल की दृष्टि से दीवार पत्रिका सबसे
अच्छा माध्यम है। बच्चे जितना अधिक पढ़ते और लिखते हैं, उनकी भाषा उतनी अधिक मजबूत
होती है। दीवार पत्रिका के लिए रचना तैयार करते हुए बच्चे अपने चिंतन को टूटी-फूटी
भाषा में दबाब मुक्त होकर व्यक्त करते हैं जिससे उनकी भाषा मजबूत होती है। बच्चों
के आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।“
अब दीवार पत्रिका के सम्बन्ध में सभी सहभागियों में एक समझ
बन चुकी थी। अब दीवार पत्रिका बनाने की बारी थी।
कार्यशाला में
उपस्थित 20 सहभागियों को 10-10 के दो समूहों में बाँटा गया। समूह एक का नाम रखा गया ‘कुछ करना है’। तथा समूह दो का नाम रखा ‘हम होंगे कामयाब’। दोनों समूहों को चार्ट, कलर्ड पेंसिलें, पटरी, स्केच पेन, कैंची, कुछ पुराने अखबार
जिनमें बालोपयोगी सामग्री थी, उपलब्ध कराया गया। समूहों को कहा गया कि पहले अपनी-अपनी
पत्रिका का नाम तय करें। समूह एक ने नाम रखा ‘बाल पाठशाला समाचार’ और समूह दो ने नाम
दिया ‘बाल चेतना’।
अब करना यह था कि दिये गये समाचार पत्रों से पत्रिका के लिए
सामग्री चयन करनी थी। कुछ सामग्री जैसे कहानी, कविता ,पहेली और उनके विद्यालय के अनुभव को लिखना
था। समूह के सदस्यों ने अपने अपने काम बाँट लिए थे। कोई लिखने का काम सम्भाले था
तो कोई सजावट का। कोई समाचार पत्र से सामग्री चयन कर कतरन निकाल रहा था तो कोई आज
की कार्यशाला में दीवार पत्रिका बनाने की गतिविधि पर रिपोर्ट तैयार कर रहा था। कोई
अन्य उपयोगी सूचनाएँ जुटा रहा था। सभी अपने अपने काम मे व्यस्त और मस्त थे। दोनो
समूहों में एक प्रकार का प्रतियोगी भाव था कि मेरे समूह की पत्रिका दूसरे समूह से
बेहतर हो। कुछ सदस्य दूसरे समूह की गतिविधियों पर नजर भी रखे हुए थे। मैत्रीपूर्ण
माहौल बना हुआ था। सब के प्रयास से दीवार पत्रिकाएँ तैयार हो गईं। तैयार पत्रिकाओं
का प्रस्तुतीकरण किया गया, उनकी समीक्षा की गयी और एक दूसरे को न केवल आवश्यक सुझाव
दिए गये बल्कि सराहा भी गया ।
मैं देख रहा था कि सहभागी शिक्षकों में कुछ नया सीख पाने का
आनन्दपूर्ण भाव था। मैंने चर्चा प्रारम्भ की - इस पूरी प्रक्रिया से गुजरने के बाद
अब वे कैसा महसूस कर रहे हैं? श्रीमती मालती श्रीवास्तव ने कहा कि मेरे लिये एक
नया अनुभव रहा। दीवार पत्रिका बनाने में
सीखने के साथ साथ आनन्द भी आया। विद्यालय में यह पत्रिका निकालने से बच्चों का
वैचारिक दृष्टिकोण एवं समूह भावना का विकास होगा। सन्तोष द्विवेदी ‘मण्डेला’ की खुशी उनके चेहरे
पर झलक रही थी। उन्होने कहा कि मैं अपने विद्यालय में बाल अखबार निकालना चाहता था
लेकिन पता नहीं था कि कैसे बनाते हैं। आज की कार्यशाला से समझ बनी है। अब मैं
बच्चों के साथ दीवार पत्रिका पर काम करुँगा। रामकिशोर पाण्डेय ने कहा कि
सह-समन्वयक प्रमोद दीक्षित की देखरेख एवं मार्गदर्शन में मेरे विद्यालय पूर्व
माध्यमिक विद्यालय बरेहण्डा में ‘बाल चेष्टा’ नाम से
एक बाल अखबार गत वर्ष से प्रतिमाह निकाला जा रहा है। अखबार का पूरा काम बच्चे ही
करते हैं। बच्चों में अपनी बात कहने समस्यायें खोजने एवं हल निकालने से आत्मविश्वास बढ़ा है।
बच्चे जब अपनी रचना को पत्रिका में देखते-पढ़ते हैं तो उनका उत्साह और खुशी देखते
बनती है। आज की कार्यशाला से कुछ नये अनुभव मिले हैं। मुझे विश्वास है अब हम बेहतर
काम कर सकेंगे। अब नये रूप में दीवार पत्रिका का प्रकाशन करेंगे। श्रीमती मीरा
वर्मा उत्साह से लबरेज थीं,
बोलीं कि अब मैं अपने स्कूल में अन्य
शिक्षकों के साथ इस अनुभव को साझा करते हुए बच्चों के साथ काम करूँगी। अपने स्कूल
में हम मासिक दीवार पत्रिका निकालेंगे। अन्य सहभागियों नें भी अपने अनुभव और अपने
अपने विद्यालयों में दीवार पत्रिका बनानें की योजना रखी। सच कहूँ, आज मुझे बहुत अच्छा
लग रहा था कि कम से कम 20 विद्यालयों में ही
सही बच्चों को खुलकर अपनी बात रखने का एक अवसर मिल सकेगा। वे अब ज्ञान निर्माण की
प्रक्रिया में सही मायनों में शामिल हो सकेंगे। वे आत्मविश्वास के साथ कह सकेंगे
कि हाँ, इसे हमने किया है यह
काम हमारा अपना है। इस अवसर पर टीचर्स आफ इंडिया के सम्पादक श्री राजेश उत्साही जी
का मार्गदर्शन मिला कि किसी बच्चे के विकास में उसके परिवेश की बड़ी सशक्त भूमिका
होती है। विद्यालय बच्चे की जिज्ञासा और खोजवृत्ति को बढ़ावा देने के केन्द्र बनें ऐसे समेकित प्रयास किये जाने चाहिए ।
मंच के साथियों ने निर्णय लिया गया की मंच से जुडे प्रत्येक
विद्यालय में बच्चों द्वारा अपनी एक बाल पत्रिका ‘दीवार पत्रिका’ निकाली जाये जिसमें सामग्री जुटाने, साज-सज्जा, सम्पादन का काम
बच्चे ही करें, और विद्यालय की
समस्यायें तथा समाधान हेतु बच्चों के सुझाव, उनकी रचनाये, विद्यालय बेहतरी के
दृष्टिकोण, आदि उभर कर आयें।
शिक्षक केवल सुगमकर्ता की भूमिका में रहे। वास्तव में यह कार्यशाला एक जीवन्त
कार्यशाला रही।
सह-समन्वयक (हिन्दी) बी0 आर0 सी0 नरैनी जिला-बाँदा [उ0प्र0 ] मोबा0
-09452085234
सम्पर्क- 79/18, शास्त्री नगर, अतर्रा - 210201, जिला बाँदा, उ0 प्र0
पुनेठा सर‚ आपने शैक्षिक संवाद मंच ‚ अतर्रा द्वारा किये जा रहे दीवार पत्रिका विषयक कार्य को ब्लॉग में जगह दी ‚एतदर्थ बहुत बहुत आभार । इससे हमारे साथियों का उत्साह बढेगा। मेरा हमेशा से मानना रहा है दीवार पत्रिका बच्चों के विकास के लिए उनकी मित्र है । मित्र से आप खुलकर बातें कर सकते हैं । पुनः आभार ।
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