Tuesday, 6 January 2015

दीवार पत्रिका सृजन कार्यशाला की डायरी -चिंतामणि जोशी

दीवार पत्रिका सृजन कार्यशाला की डायरी -चिंतामणि जोशी
‘दीवार पत्रिकाःएक अभियान’ के शुरूआती दिनों से ही  जिन शिक्षकों ने सबसे अधिक रूचि दिखाते हुए न केवल अपने विद्यालय में दीवार पत्रिका प्रारम्भ की बल्कि दूसरे शिक्षक साथियों को भी इसके लिए प्रेरित किया, उनमें से एक प्रमुख नाम है- शिक्षक और कवि चिंतामणि जोशी। इस अभियान को गति देने में जोशी जी की भूमिका अग्रणी रही है। बिल्कुल उसी तरह जैसे  शैक्षिक दखल पत्रिका को आम शिक्षक तक पहुंचाने में रहती आयी है।  यह रचनात्मकता के प्रति उनके गहरे सरोकारों का परिचयाक है। कोई भी ऐसा अवसर जिसका संबंध रचनात्मकता से होता है ,वे कभी पीछे नहीं दिखते।  पिछले दिनों सी.आर.सी.टकाना में संपन्न हुई दीवार पत्रिका सृजन कार्यशाला में भी पहले दिन से लेकर अंतिम दिन तक पूरे समय उनकी सक्रिय उपस्थिति इस बात का प्रमाण है। इस कार्यशाला में उन्होंने न केवल बच्चों को लेखन की बारीकियों से अवगत कराया बल्कि अंतिम दिन समापन समारोह का सफल और प्रभावशाली संचालन भी किया। मेरे अनुरोध पर उन्होंने अपनी डायरी के पन्ने हमारे ब्लाॅग के लिए उपलब्ध कराए ,जिसके लिए मैं उनका आभारी हूं। प्रस्तुत है उनके द्वारा लिखी डायरी के पन्ने- 
26/12/2014

शैक्षिक नवाचार के क्षेत्र में दीवार पत्रिका सृजन मेरे लिए चूंकि एक बड़ा कार्य था। इसीलिए छोटे बच्चों के साथ दीवार पत्रिका सृजन कार्यशाला को लेकर काफी उत्सुकता थी। कार्यशाला का प्रथम दिवस काफी रोचक रहा। राजकीय प्राथमिक पाठशाला टकाना के 25 बच्चों के बीच पूर्व निर्धारित तीन घंटे का समय कब बीत गया, पता ही नहीं चला। बच्चे 2ः30 बजे भी घर जाने को तैयार ही नहीं थे। सच, छाटे-छोटे बच्चे अपने भीतर बहुत बड़ा विस्तार समेटे होते हैं। कविता, कहानी, हास-परिहास, खेल-गतिविधियों के समन्दर में एक बार गोता लगा लें, फिर देखिए। चुटीले, चुलबुले, अभिव्यक्ति-उन्मुख, जिज्ञासु, प्रश्न खड़े करने वाले, और आगे बढ़ने को तत्पर। बस ठीक से रास्ता दिखा दीजिए-बच्चे मंजिल पर। हाँ, बड़ों के धैर्य की अच्छी-खासी परीक्षा लेते हैं छोटे-छोटे बच्चे। आज हम शिक्षक, परीक्षार्थी थे-चन्द्रशेखर जोशी, नरेश पुनेठा, राजेन्द्र जोशी,मनोज विश्वकर्मा, योगेश पाण्डेय, डाॅ0 सी0 बी0 जोशी, स्वयं मैं और महेश पुनेठा। मुझे लगा,हम सफल रहे।
    प्रथम दिवस की कार्यशाला में परिचय गतिविघि मेरी दृष्टि में सर्वाधिक उपयोगी रही। बच्चों ने रोचक अंदाज में अपना परिचय तो दिया ही हम बड़ों का परिचय भी ले लिया। बच्चे आपस में नहीं लड़ते। कुछ लड़कियां पुलिस बनना चाहतीं हैं। कुछ टीचर। कुछ लड़कों को हरा रंग पसंद है,वे फौजी बनकर राष्ट्र की सेवा करना चाहते हैं।फलों का राजा आम काफी बच्चों को अच्छा लगता है। कुछ बच्चों ने सुन्दर तुकबन्दी के साथ अपना परिचय दिया। कविता रावत अच्छी वक्ता बन सकती है।खुशबू खातून को स्कूल का खाना अच्छा लगता है। पल्लवी माॅडल बनना चाहती है। मैं ये बातें उनकी टीचर एवं अभिभावकों को बताऊंगा।

27/12/2014


कार्यशाला जारी है। दूसरा दिन अधिक व्यस्त रहा। पहले सत्र में पुतली कला कार्यक्रम। दूसरे सत्र में पहेली निर्माण और तीसरे सत्र में कल्पना की उड़ान भरो। दरअसल समय निर्धारण में थोड़ी चूक हुई है। इस प्रकार की कार्यशाला के लिए प्रतिदिन कम से कम पाँच घंटे की आवश्यकता होगी। आज शिक्षक किशोर पाटनी, राजीव जोशी, विनोद बसेड़ा, राजेन्द्र पंत, उपेन्द्र जोशी भी कार्यशाला में उपस्थित रहे और अपना सहयोग दिया। जी.जी.आइ.सी ऐंचोली में अध्यापिका गीता पंत अपनी बालोपयोगी रचनाओं के साथ उपस्थित हुईं थी। उनसे दीवार पत्रिका की अवधारणा, सृजन, संयोजन, उपादेयता पर चर्चा हुई। गतिविधियों के दर्मियान प्रत्येक बच्चा अपनी बात पहले कहने की आतुरता दिखा रहा था कि वह छूट न जाय। कभी-कभी व्यवस्था भी बाधित हो रही थी। शायद स्वतंत्रता के मानकों  में एकाएक कुछ परिवर्तन हुआ हो।



28/12/2014

रविवार था। आज दो बच्चों ने छुट्टी कर दी थी। खैर 23 बच्चे कार्यशााला स्थल पर थे। समय पूर्व ही। मैंने चुपचाप परिसर में बिखरे कागज के टुकड़े उठाने प्रारम्भ किए। योगेश पाण्डेय जी भी शुरू हो गए। कुछ ही देर में पचास हाथ सफाई में जुट गए थे। परिसर साफ। दरियां बिछीं। बच्चे डायरी लिखकर लाए थे । जमा कीं। कुछ ही देर में डाॅ0 सी0 बी0 जोशी ने कुमाऊंना लोकधुन में गाकर ‘गोनू झा की गाय’ कथा सुनानी शुरू कर दी। राजीव जी की उंगलिया बांसुरी पर थिरकने लगीं। सुर और स्वर का संगम हुआ तो बच्चों के साथ हम उपस्थित शिक्षक भी मंत्रमुग्ध हो गए। आस-पास की छतों पर भी कुछ लोग निकल आये। बच्चों ने अपने-अपने बनाए मुखौटे पहने और शुरू हो गया संवाद निर्माण और बोलने का सिलसिला। मैं भी बना एक बार गोनू झा की गाय। बच्चों में संवाद निर्माण एवं संप्रेषण कौशल विकसित करने का कारगर तरीका है यह। दूसरे सत्र का चर्चा विषय रहा ‘कहानी कैसे लिखें’ मार्गनिर्देशन के बाद दो समूहों ने दिए गए शब्दों पर और दो ने परिसर में दिख रहीं वस्तुओं पर कहानी लिखी।
    तीसरे सत्र में रूपक रचो या तुलना करो गतिविधि में बच्चों को छोटे-छोटे वाक्य यथा-गाड़ी भाग रही है जैसे... ताला देख रहा है जैसे... पेड़ खड़ा है जैसे... टहनी झूल रही है जैसे...घंटी बुला रही है जैसे...देकर उनसे अपनी-अपनी कल्पना के आधार पर इन्हें विस्तार देने को कहा गया। परिणाम बहुआयामी थे। कुछ अनूठे भी। रा. प्रा. वि. पलचैड़ा के शिक्षक चन्द्र बल्लभ जोशी भी आज कार्यशाला में आए थे। आज यह भी तय किया गया कि ‘बड़ों की कलम से’ स्तम्भ के अन्तर्गत कार्यशाला की चयनित गतिविधियों को भी समूहों द्वारा तैयार दीवार पत्रिकाओं में समेटा जाय।
    आज बच्चों में उत्सुकता पूर्ववत थी। हाँ, आत्म अनुशासन पूर्व से बेहतर लगा। तथापि सोद्देश्य बच्चों के साथ बच्चा बनना; आनन्द, रोमांच, संतोष देने वाला तो है सहज नहीं।

29/12/2014

दीवार पत्रिका सृजन कार्यशाला का चैथा दिन। हमारी पूर्वयोजना थी कि भयमुक्त, स्वतंत्र वातावरण में ही बच्चों को सृजनोन्मुख करना है। सो जितना हम प्रतिदिन चाह रहे थे उतना पा नहीं रहे थे। हमारे साथ सिर्फ 25 बचचे थे और हम 6 से 9 तक अध्यापक। फिर भी बार-बार ऐसे क्षण आ ही जा रहे थे जब हमें अपने माथे की शिकन पर काबू करने में भी ऊर्जा लगानी पड़ती थी। हमने बच्चों से अपेक्षा की कि बच्चे ‘जब मुझे खुशी हुई’ या ‘जब मुझे रोना आया’ में से किसी एक शीर्षक पर अपने अनुभव लिखें। एक बच्चा बड़ी मासूमियत से पूछता है,‘‘सर यह अनुभव क्या होता है?’’ अनुभव क्या है समझा ही रहे थे कि दूसरा बच्चा आकर कान में कहता है, ‘‘बर्थडे कैसे लिखा जाता है?’’ तभी तीसरा कापी-कलम लेकर झूले पर जाकर बैठ जाता है-अनुभव लिखने। चैथा जिस पर आप ध्यान नहीं दे पाए, अगले सत्र की तैयारी कर रहे योगेश भाई का हाथ पकड़कर बैठ जाता है, ‘‘सर, दीपावली लिखूं या हैप्पी बर्थडे?’’ तभी पाँचवा शिकायत करने लगता है कि पल्लवी ने उसकी पेन ले ली है। यह है असली बाल संसार। एक महत्वपूर्ण अनुभव उल्लेखनीय है। 25 में से किसी भी बच्चे ने ‘जब मुझे रोना आया’ शीर्षक नहीं चुना। बच्चे मूलतः खुशी चाहते हैं। खुशी के हकदार हंै। खुशी के क्षण याद रखते हैं। यहाँ पर एक प्रश्न खड़ा होता है। क्या एक अकेला शिक्षक एक विद्यालय को आनन्दाजय बना सकता है? आज समाचार पत्र ‘अमर उजाला’ में एक खबर छपी थी। जिसके अनुसार चम्पावत और नैनीताल को छोड़कर उत्तराखण्ड के सभी जिलों में 100 से अधिक प्राथमिक शालाएं एकल शिक्षक के सहारे चल रहीं हैं। अपने पिथौरागढ़ में तो 222 विद्यालय एकल शिक्षक वाले हैं।
    इस कार्यशाला के दर्मियान एक बात तो साफ समझ में आ रही है कि शिक्षक- शिक्षिकाओं को बुलाकर सी आर सी, बी आर सी, जिला व राज्य स्तर पर आयोजित किए जाने वाले प्रशिक्षण एवं तमाम ऐसी कार्यशालाएं जिनमें बच्चों का प्रतिभाग नहीं है, क्यूं बेमानी साबित हो रही हैं?
    बच्चे ‘सड़क किनारे स्कूल हमारा’ से कविता बनाना शुरू करते हैं तो उन्हें अपना स्कूल कभी प्यारा लगता है कभी न्यारा। स्कूल का खाना भी उन्हें अच्छा लगता है। स्कूल के मैदान पर उन्हें गर्व भी है। मैदान में लगे झूले उनकी शान हैं। उनकी मैडम बहुत प्यारी है। उन्हें ज्ञान देती(सिखाती) है। लेकिन अकेली मैडम या सर समाज की तमाम अपेक्षाओं और प्रश्नों के बीच आँखिर कब तक, कितना और कैसे...?
    चैतरफा प्रश्नों से घिरा जब, शिक्षक एकल रह जाएगा
    अंतहीन  जिज्ञासाओं  को, शांत वो कैसे कर  पायेगा?

30/12/2014

पाँचवा दिन अन्य दिनों से कुछ (बहुत कुछ) हटकर रहा। हमसे पहले पँहुचकर बच्चे प्रांगण साफ कर चुके थे। हमने दरी बिछाई और चार्टों को आपस में जोड़ने का कार्य प्रारम्भ कर दिया। बच्चे हमारे चारों ओर घिर आये।हम भी पत्रिका बनाएंगे। तभी योगेश जी ने दीवार पर टंगे बोर्ड पर चाॅक से सुन्दर चित्र उकेरने प्रारम्भ कर दिए। अधिकांश बच्चे चित्र बनाने चले गए। कुछ हमारे साथ पत्रिका संयोजन में लगे रहे। आज शिक्षक-कवि डाॅ0 गिरीश चन्द्र पाण्डेय कार्यशाला में आये थे। उन्होंने आज चल रही गतिविधियों पर बच्चों को आशुकविता सुनाई। बच्चे आनन्द ले रहे थे। मैंने भी एक कविता सुनाई।फिर महेश पुनेठा  ने बच्चों से कहा,‘‘आओ आज एक-एक पत्र लिखें। अपने दोस्त को या मम्मी-पापा को या टीचर को या गाय को या डाॅगी को सम्बोधित। जो भी अच्छा लगे।’’ कुछ ने लम्बे पत्र लिखे। कुछ दो पंक्तियां लिखकर खेलते रहे।कुछ अपने चित्रों में मस्त। दो बजते ही योगेश भाई ने कहा, ‘‘बस्ता उठाओ, मेरे पीछे आओ, रेल बनाओ।’’ और पूरी रेल गेट से बाहर पँहुचा दी। हम समापन दिवस के कार्यक्रम नियोजन हेतु कुछ देर और बैठे।




31/12/2014

वर्ष 2014 का आंखिरी दिन। वर्ष पर्यन्त क्या पाया, क्या छूटा, क्यूं छूटा? समीक्षा का दिन। लेकिन आजकल तथाकथित ‘थर्टी फस्र्ट’ मनाने का प्रचलन बढ़ गया है।खैर, हमें तो छः दिवसीय दीवार पत्रिका सृजन कार्यशाला की संप्राप्ति पर समीक्षा करनी थी। एक संदेश देना था। कल फेसबुक पर इस आशय का संदेश पोस्ट कर दिया था। पचास के आसपास शिक्षक और लगभग इतने ही बच्चे कार्यशाला स्थल पर पंहुचे थे। नगराध्यक्ष एवं शिक्षक श्री जगत सिंह खाती ने कार्यशाला में शरीक होकर हमारा उत्साहवर्धन किया। हम चाह रहे थे कि मुख्य शिक्षा अधिकारी श्री जुकरिया का मार्गदर्शन इस अवसर पर प्राप्त हो। लेकिन उनकी मेज पर फाइलों के बोझ के कारण यह संभव नहीं हो पाया। बहरहाल विभाग की ओर से खण्ड शिक्षा अधिकारी श्री एच0 आर0 कोहली ने पूरा समय दिया और समर्थन भी। मुझे कार्यक्रम संचालन का दायित्व दिया गया था। प्रत्येक बच्चा अपना अनुभव, गीत, कविता सुनाने या कोई गतिविधि करने का इच्छुक था। क्यंूकि हमारी कार्यशाला के केन्द्र में बच्चा था। सो ‘दीवार पत्रिका: एक अभियान’ के उद्देश्यों पर महेश पुनेठा द्वारा आधार वक्तव्य प्रस्तुत करने के तुरंत बाद हमने बच्चों के कार्यक्रम सम्पादित किये। अनुभव, गीत-गतिविधियां, रंग वीथिका, मुखौटा संवाद और नाटक ‘ गोनू झा की गाय’। मुखौटे पहनकर बच्चे सहजता से अपने पात्र में रच-बस जाते हैं और उनके संवाद प्रभावशाली हो जाते हैं। कुल मिलाकर इस अवसर पर बच्चों की मंचीय अभिव्यक्ति, अतिथि वक्ताओं की प्रतिक्रिया, और आगन्तुकों का बच्चों द्वारा सृजित ‘उपवन’, ‘तरंग’, ‘मुस्कान’ एवं ‘चुनमुन’ दीवार पत्रिकाओं को प्रशंसात्मक निगाह से देखना मेरे लिये बेहद सुखद अनुभूति थी। योगेश पाण्डेय की क्रिएटिव आइ, डाॅ0 सी0 बी0 जोशी के सांस्कृतिक कौशल एवं अन्य बाल वत्सल शिक्षक साथियों के बीच सीखने के लिहाज से यह सप्ताह मेरे लिए अभूतपूर्व रहा। अविस्मरणीय रहेगा। वर्ष का सुखद समापन और आगत के लिए नव संकल्प।


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