बाल पत्रिका ‘नंदन’ के अक्टूबर 14 के अंक में दीवार पत्रिका के संबंध में कौशलेंद्र प्रपन्न का एक बच्चों को संबोधित करता हुआ छोटा सा आलेख छपा है। यह आलेख उन बच्चों तथा शिक्षकों के लिए बहुत उपयोगी है जो अपने विद्यालय में दीवार पत्रिका प्रारम्भ करना चाह रहे हैं। दीवार पत्रिका के अभियान को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से हम यह आलेख नंदन से साभार अपने ब्लाॅग में दे रहे हैं। आशा है इस पर आपकी प्रतिक्रिया अवश्य कुछ नया जोड़ेगी।
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दीवार पत्रिका
कौशलेंद्र प्रपन्न(भाषा विशेषज्ञ)
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पत्रिका तो तुम सभी ने देखी ही होगी। स्कूल या घर में पढ़ी भी होगी। तो हम लोग इस बार एक दीवार पत्रिका बनाएंगे ,जिसे अंग्रेजी में वाॅल मैग्जीन कहते हैं।यह पत्रिका आप पत्रिकाओं की तरह छपकर आप के हाथ में नहीं आती।इसे ऐसे समझो कि दीवार पर नहीं लिखते हैं,बल्कि एक बड़े चार्ट पेपर पर सारा मैटर लिखकर चिपकाते हैं।
स्कूल या अपनी कक्षा की मैम या टीचर से आज्ञा लेकर किसी दीवार को पत्रिका के लिए चुन सकते हो। तुममें से जिस बच्चे की पेंटिग,लिखावट अच्छी होगी,वह इस पत्रिका में कहानी ,कविता,कार्टून आदि में चित्र बनाएगा।जिन बच्चों को कविता या कहानी लिखना अच्छा लगता है,वे पत्रिका कविता ,कहानी ,यात्रा संस्मरण लिख सकते हैं। गांव या पहाड़ कहीं भी घूमकर लौट बच्चे अपने अनुभव लिखकर इस पत्रिका में दे सकते हैं।
हर काम हर बच्चे करें,यह जरूरी नहीं ।इसलिए आपस में बातचीत कर काम का विभाजन कर लेना चाहिए।तुममें से दो-तीन को संपादन मंडल बनाना चाहिए।यह समूह छपने के लिए आई सामग्री की ठीक से जांच-परख करेगा। यहां तक कि किसे छापा जाए और कौनसी चीज छपने लायक नहीं है,इसका फैसला भी यही करेगा। इस काम में तुम अपने किसी टीचर को शामिल कर सकते हो,जो तुम्हारे काम में मदद कर सकते हैं।
जब तुम्हारी पत्रिका तैयार हो जाए,तो उसे निश्चित स्थान पर दीवार पर चिपका दो। इसे स्कूल और कक्षा के तमाम बच्चे ,शिक्षक और तुम्हारी मंमी -पापा भी पढेंगे।पढ़ने के बाद हो सकता है,कुछ अच्छे सुझाव भी दें कि यहां यह कमी रह गई या इसे इस तरह लिखा या पेश किया जाता तो ,ज्यादा अच्छा लगता। इस तरह के सुझाव को लिख लेना चाहिए और अगले अंक में इन बातों को ध्यान देना चाहिए।देखोगे तुम्हारी भाषा तो सुंदर और कसावदार होगी ही,साथ ही बहुत सारी चीजें तुम्हें पढ़ने को मिलेंगी।
फायदा
तुम अपने मन की बात दूसरों से साझा करना सीखते हो। निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है। लोगों के साथ मिलकर काम करना सीखते हो।
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दीवार पत्रिका
कौशलेंद्र प्रपन्न(भाषा विशेषज्ञ)
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पत्रिका तो तुम सभी ने देखी ही होगी। स्कूल या घर में पढ़ी भी होगी। तो हम लोग इस बार एक दीवार पत्रिका बनाएंगे ,जिसे अंग्रेजी में वाॅल मैग्जीन कहते हैं।यह पत्रिका आप पत्रिकाओं की तरह छपकर आप के हाथ में नहीं आती।इसे ऐसे समझो कि दीवार पर नहीं लिखते हैं,बल्कि एक बड़े चार्ट पेपर पर सारा मैटर लिखकर चिपकाते हैं।
स्कूल या अपनी कक्षा की मैम या टीचर से आज्ञा लेकर किसी दीवार को पत्रिका के लिए चुन सकते हो। तुममें से जिस बच्चे की पेंटिग,लिखावट अच्छी होगी,वह इस पत्रिका में कहानी ,कविता,कार्टून आदि में चित्र बनाएगा।जिन बच्चों को कविता या कहानी लिखना अच्छा लगता है,वे पत्रिका कविता ,कहानी ,यात्रा संस्मरण लिख सकते हैं। गांव या पहाड़ कहीं भी घूमकर लौट बच्चे अपने अनुभव लिखकर इस पत्रिका में दे सकते हैं।
हर काम हर बच्चे करें,यह जरूरी नहीं ।इसलिए आपस में बातचीत कर काम का विभाजन कर लेना चाहिए।तुममें से दो-तीन को संपादन मंडल बनाना चाहिए।यह समूह छपने के लिए आई सामग्री की ठीक से जांच-परख करेगा। यहां तक कि किसे छापा जाए और कौनसी चीज छपने लायक नहीं है,इसका फैसला भी यही करेगा। इस काम में तुम अपने किसी टीचर को शामिल कर सकते हो,जो तुम्हारे काम में मदद कर सकते हैं।
जब तुम्हारी पत्रिका तैयार हो जाए,तो उसे निश्चित स्थान पर दीवार पर चिपका दो। इसे स्कूल और कक्षा के तमाम बच्चे ,शिक्षक और तुम्हारी मंमी -पापा भी पढेंगे।पढ़ने के बाद हो सकता है,कुछ अच्छे सुझाव भी दें कि यहां यह कमी रह गई या इसे इस तरह लिखा या पेश किया जाता तो ,ज्यादा अच्छा लगता। इस तरह के सुझाव को लिख लेना चाहिए और अगले अंक में इन बातों को ध्यान देना चाहिए।देखोगे तुम्हारी भाषा तो सुंदर और कसावदार होगी ही,साथ ही बहुत सारी चीजें तुम्हें पढ़ने को मिलेंगी।
फायदा
तुम अपने मन की बात दूसरों से साझा करना सीखते हो। निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है। लोगों के साथ मिलकर काम करना सीखते हो।
यह लेख दीवार पत्रिका पर प्रारम्भिक समझ बनाने के लिए उत्साहित करता है । गागर में सागर भरने का प्रयास सफल हुआ है । मेरा हमेशा से मानना रहा है कि यदि भाषागत कौशलों के विकास पर काम करना है तो दीवार पत्रिका से बेहतर विकल्प सहजता से शायद ही कहीं उपलब्ध हो । इसके साथ यह सामाजिक और साँस्कृतिक समरसता का भाव भर अलगाव के ढाँचे को तोडता भी है ।
ReplyDeleteअच्छा लेख पिछले वर्ष हमारे विद्यालय के विद्यार्थियों ने एक अंक निकला था, इस वर्ष भी मैं लगातार कोशिश कर रहा हूं ,बहुत धैर्य की आवश्यकता होती है.
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