Tuesday, 21 October 2014

दीवार पत्रिका निर्माण कार्यशाला
  
       बच्चों में रचनात्मक लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ विशेष प्रयास करने की भी आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए उन्हंे लगातार अध्ययन करने के लिए प्रेरित करना तो जरूरी है साथ में  लेखन की बारीकियों से भी अवगत कराना जरूरी हो जाता है। इस उद्देश्य से लंबे समय से बच्चों के साथ लेखन कार्यशाला का आयोजन करने का मन विचार में था। अप्रैल 2014 में यह अवसर मिल गया। अधिकांश शिक्षकों की बोर्ड परीक्षा में ड्यूटी लगी थी । शिक्षकों की कमी के चलते नए सत्र की पढ़ाई विधिवत नहीं चल पाई पायी थी। नए सत्र के लिए समय चक्र भी नहीं बन पाया था। बच्चों ने नई कक्षा की पाठ्यपुस्तकें भी नहीं खरीदी थी। मुझे यह अनुकूल समय जान पड़ा।
      जहां तक रचनात्मक कार्यशालाओं का सवाल है, मेरा मानना रहा है कि  बच्चों की प्रतिभा और अभिरूचियों को पहचान कर उन्हें सही दिशा में आगे बढ़ाने ,नए अवसर प्रदान करने, अपसंस्कृति से बचाते हुए उन्हें मानवीय मूल्यों व संस्कृति की सही राह दिखाने, समाज के प्रति बच्चों में सरोकार और संवेदनशीलता और सामूहिकता की भावना विकसित करने के उद्देश्य से इन कार्यशालाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। ये कार्यशालाएं बच्चों को न केवल रचनात्मक वातावरण उपलब्ध कराती हैं बल्कि रचनात्मकता के विविध क्षेत्रों से उनका परिचय भी कराती हैं। बच्चों के भीतर एक नई सोच को जन्म देती हैं। बच्चों को यह पता चलता है कि वे किस-किस क्षेत्र में और कैसे आगे बढ़ सकते हैं।वे कुछ नया करने को प्रेरित होते हैं। अवकाश का रचनात्मक उपयोग हो पाता है। दूर दराज क्षेत्रों में तो इनकी उपयोगिता और अधिक बढ़ जाती है।अनुभव बताते हैं कि यदि बच्चों की सर्जनात्मकता को कम उम्र से ही प्रोत्साहित किया जाय और उन्हंे अनुकूल माहौल मुहैया कराया जाय तो उसके परिणाम बहुत सकारात्मक होते हैं।
      इधर ऐसी कार्यशालाएं आम होती जा रही हैं पर यहाँ एक सवाल खड़ा होता है कि ये कार्यशालाएं क्या अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में सफल हो रही हैं? यदि नहीं तो उसके पीछे क्या कारण हैं?अधिकतर यह देखने में आता है कि ये कार्यशालाएं अपने उद्देश्य को पाने में असफल रहती हैं उसके पीछे सबसे बड़ा कारण आयोजकों में बालमन की समझ और विभिन्न विधाओं के विशेषज्ञों का अभाव है।इन कार्यशालाओं की कार्ययोजना इतनी लुंजपुंज होती है कि पता ही नहीं चलता कि कार्यशाला का अयोजन क्यों किया गया है?आयोजकों को खुद पता नहीं होता है कि बच्चों को क्या देना चाहते हैं और क्यों? माँ-बाप इन कार्यशालाओं में बच्चों को इसलिए भेज देते हैं कि छुट्टियों में बच्चे उन्हें परेशान न करें।इधर-उधर उछलते-कूदते न रहें। फलस्वरूप कार्यशाला बच्चों को खाली समय में व्यस्त रखने तक सीमित होकर रह जाती हैं।इन कार्यशालाओं और स्कूल की परंपरागत कक्षाओं में कोई विशेष अंतर नहीं दिखाई देता है। वही कड़ा अनुशासन,दबाब ,डाँट-डपट,जबरदस्ती।बच्चों की आजादी और आनंद का कोई ध्यान नहीं।वही गतिविधियां इन कार्यशालाओं में करवायी जाती हैं जो बच्चे स्कूल में अक्सर करते हैं। प्रतियोगिताओं पर अधिक जोर दिया जाता है। हर गतिविधि के बाद प्रथम-द्वितीय-तृतीय निकालने पर बल होता है।फलस्वरूप पहले दिन कुछ अलग करने-सीखने की इच्छा से आए बच्चे दो-तीन बाद ऊबने लगते हैं। समय प्रबंधन इतना कड़ा होता है कि बच्चे थक कर चूर हो जाते हैं। घर लौटते हुए बच्चों के चेहरे लटके होते हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि इन कार्यशालाओं में रचनात्मकता का कितना विकास होता होगा? 
      दरअसल ,इन कार्यशालाआंे की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि यहाँ बच्चों को आनंद आए। वे खुशनुमा माहौल में अपनी रूचि के विषयों पर अपनी जिज्ञासाओं को शांत कर सकें। आनंददायी गतिविधियां कर सकें जो रचनात्मकता के प्रति एक नया रुझान पैदा कर सके। इसलिए योजना बनाकर कार्यशालाएं आयोजित करने की आवश्यकता है जिसमें विभिन्न विधाओं के ऐसे विशेषज्ञों को बुलाया जाय जो अपनी विधा की गहरी समझ के साथ-साथ बालमनोविज्ञान की समझ भी रखते हों।उनका व्यवहार इतना मित्रवत हो कि बच्चे उनसे अधिकाधिक संवाद करना चाहें।ताकि अपनी जिज्ञासाओं को उनके सामने रख सकें।बच्चों को ऊबाउ और लंबे भाषण न देकर, करने के अवसर दिए जांय। बच्चों को समूह में कार्य करते हुए आगे बढ़ने को प्रोत्साहित किया जाय।प्रतिस्पर्धा से अलग रखा जाय। गतिविधियों को प्रतिस्पर्धा में न बदला जाय क्योंकि इससे बच्चे में व्यक्तिवादी मूल्य का विकास होता है जो बाजारवादी मूल्य है। एक सुंदर समाज ऐसे नहीं बन सकता है। बच्चों को ऐसा न लगे कि उन्हें वहाँ कुछ सिखाया जा रहा है। वे किसी और से निर्देशित न होकर स्वनिर्देशित हों।कुल मिलाकर इन कार्यशालाओं में बच्चों को संवाद,अवलोकन, कल्पना,विश्लेषण और सृजन के अधिकाधिक अवसर मिलने चाहिए। उद्देश्यों के अनुकूल गतिविधियों का संयोजन किया जाय और उसमें निरंतरता लाई जाय।  

       उक्त बातों को ध्यान में रखते हुए मैंने ‘दीवार पत्रिका निर्माण कार्यशाला ’ नाम से  एक कार्ययोजना तैयार की। कुछ रोचक गतिविधियां भी तैयार कर ली। कोशिश की गई कि गतिविधियां ऐसी हों जिनको करते हुए बच्चों को आनंद आए। यदि आनंद नहीं आएगा तो वे न कुछ सीख पाएंगे और न आगे इस तरह की कार्यशाला में भाग लेंगे। इस कार्यशाला से मेरी अपेक्षा थी कि दीवार पत्रिका को निकालने के लिए एक ठोस टीम तैयार हो सके ताकि दीवार पत्रिका को एक निरंतरता प्रदान की जा सके।इस कार्यशाला से मैं खुद भी सीखना चाहता था कि बच्चों के लिए रचनात्मक कार्यशाला कैसी होनी चाहिए? इससे पहले एक-दो विद्यालयों में  अन्य साथियों के साथ इस तरह की कार्यशाला कर चुका था लेकिन अकेले पहली बार कर रहा था। इस कार्यशाला के अनुभवों को मैंने अपनी डायरी में दर्ज किया  जिन्हें अक्षरशः आप अगली पोस्ट में पढ़ पाएंगे . 

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