पिछली पोस्ट में हमने 'दीवार पत्रिका निर्माण कार्यशाला 'का जिक्र किया था . दस दिवसीय इस कार्यशाला में हमने क्या और कैसे किया ? इस बारे में प्रस्तुत है उस दौरान लिखी डायरी के कुछ पन्ने . ये पन्ने इस आशा से प्रस्तुत किये जा रहे हैं कि आप अपने कुछ अनुभव और सुझाव जोड़ सकें ताकि अगली कार्यशाला बच्चों के लिए और अधिक रोचक और उपयोगी बना सकें .
21-4-2014।रा0इ0का0देवलथल
दीवार पत्रिका निर्माण कार्यशाला को लेकर मैं बहुत उत्साहित था लेकिन शुरूआत कुछ अच्छी नहीं रही। कल लगभग बीस बच्चों ने अपना नामंकन करवाया था उसमें से केवल सात बच्चे उपस्थित थे।मन बहुत खराब हुआ। पता किया बच्चे क्यों नहीं आए? बताया कि कुछ बच्चे नए सत्र के लिए कापी-किताब खरीदने पिथौरागढ़ गए हैं। कक्षा दस की बोर्ड परीक्षा दे चुके जिन बच्चों को कार्यशाला में प्रतिभाग करने के लिए संदेश भेजा था उनमें से भी कोई नहीं आया जबकि कल परीक्षित और वंदना ने आने का आश्वासन भी दिया था।दोनों की गिनती अच्छे विद्यार्थियों में होती है। एक समय विचार आया कि कार्यशाला कल से प्रारम्भ की जाय। फिर लगा कल की क्या गारंटी। कक्षा दस के जो बच्चे पुस्तकालय में उपस्थित थे उनसे अपनी पूरी कक्षा को बुला लाने को कहा। थोड़ी देर में पूरी कक्षा पुस्तकालय में उपस्थित हो गई। कुछ बच्चों को बैठने के लिए भी जगह नहीं मिली। निर्णय लिया कि हाॅल में चला जाय।
सारे बच्चे हाॅल में उपस्थित हो गए। मैंने कार्यशाला के उद्देश्य को लेकर अपनी बात रखी। कोशिश की कि बच्चे उसे गंभीरता से लें। बच्चों का मन नहीं लग रहा था। मुझे बार-बार चुप कराने के लिए चिल्लाना पड़ रहा था। लेकिन मैंने कोशिश जारी रखी।
सर्वप्रथम समूहीकरण की गतिविधि प्रारम्भ की। मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि बच्चों के भीतर सामूहिकता का विकास किया जाना चाहिए। बच्चों में अकेले नहीं बल्कि समूह में आगे बढ़ने की भावना का विकास हो। इसी मूल्य को विकसित करने के उद्देश्य से पूरी कार्यशाला में हर गतिविधि समूह में करने का निर्णय लिया गया। समूह में काम करने का दूसरा लाभ यह भी है कि बच्चे तनाव मुक्त होने के कारण आसानी से और जल्दी सीखते हैं।सीखने में साथियों की मदद महत्वपूर्ण होती है। बच्चों को ‘प’वर्ण से प्रारम्भ होने वाले शब्द लिखने के लिए कहा गया। तीन मिनट का समय दिया गया। बच्चों ने बिना नकल किए शब्द लिखने प्रारम्भ किए। एक बालिका ने सबसे अधिक 33 शब्द लिखे। सबसे कम 8 शब्द लिखे गए।अंकों के आधार पर बच्चों को पहले सात समूहों में बाँटा गया उसके पश्चात सबसे कम शब्द लिखने वाले 7 बच्चों को समूह प्रमुख बनाया गया।जिन्हें शेष 6 समूहों में से अपने साथियों को चुनने को कहा गया। ऐसा इसलिए किया गया ताकि प्रत्येक समूह में तेज गति सेे ,धीमी गति से और औसत गति से सीखने वाले सभी तरह के बच्चे शामिल हो जाएं।यह भी कोशिश की गई की हर समूह केवल एक ही लिंग के न बन जाएं।
समूह बनने के बाद समूहों का नामकरण किया गया। इसके लिए भी एक गतिविधि करवायी गई-कहानी,कविता,व्यंग्य,संस्मरण,निबंध तथा उपन्यास की एक-एक किताब मेज पर रख दी गई । सभी समूह प्रमुखों को एक-एक किताब उठाने के लिए कहा गया। अपने समूह में जाकर उस पुस्तक की विधा की पहचान करने के कहा गया। तीन समूहों ने विधा की सही-सही पहचान कर ली। अन्य समूहों को पहचान करने में मदद की गई। इस तरह जिस समूह के पास जिस विधा की पुस्तक गई उसे वही नाम दिया गया।सातवें समूह को कोई किताब नहीं दी गई और इन विधाओं से इतर किसी भी विधा को अपने समूह के नाम के रूप में चुन लेने को कहा गया। सातवें समूह ने अपना नाम ‘आत्मकथा समूह’ रखा। इस गतिविधि का उद्देश्य यह था कि बच्चे साहित्य की विभिन्न विधाओं से परिचित हो सकें।यह गतिविधि पुस्तक के स्थान पर पाठ्यपुस्तक से एक-एक रचना देकर उसको पहचानने के लिए कहते हुए भी करवाई जा सकती है।
अगली गतिविधि के रूप में प्रत्येक समूह को एक सादा कागज दिया गया जिस पर उन्होंने सबसे ऊपर अपने समूह का नाम और उसके नीचे समूह के सभी सदस्यों का नाम लिखते हुए उसके आगे अपनी अभिरूचि और सपने(क्या बनना चाहते हो)लिखे। इससे पहले भी कक्षा-शिक्षण के दौरान मैं बच्चों से उनके सपनों के बारे में पूछता रहा हूँ। अधिकांश बच्चे फौजी बनने की बात कहते थे। कुछ पुलिस तो कुछ डाॅक्टर,इंजीनियर बनने की , लेकिन आज बच्चों के सपनों के बारे में जानकर मुझे बहुत खुशी हुई।आई.ए.एस.,आई.पी.एस. और सेना में उच्च अधिकारी के साथ-साथ बच्चों ने डांसर,लेखक,कलाकार आदि बनने के सपने दर्ज किए।इस तरह हर समूह ने अपना परिचय पत्र तैयार किया जो इस पूरी कार्यशाला के दौरान उन्हें अपने मेज पर रखना है। कुछ समूहों ने अपने परिचय-पत्र को आकर्षक बनाने की कोशिश भी की। सुंदर लेखों में लिखने के साथ-साथ उसके चारों ओर फूल-पत्तियां भी बनाई।
समूह बनाने और उनका नामकरण करने के पश्चात ‘दीवार पत्रिका की उपयोगिता’ पर सभी समूहों को आपसी विचार-विमर्श से कम से कम आठ बिंदु लिखने के लिए कहा गया जिसमें शर्त रखी गई कि प्रत्येक प्रतिभागी कम से कम एक बिंदु अवश्य बताए।
इसी दौरान प्रत्येक समूह को तीन-तीन बाल पत्रिकाएं वितरित की गई।गृह कार्य के रूप में हर समूह को कहानी,कविता,चुटकुले या पहेली में से किसी एक विधा पर रचना तैयार कर लाने को कहा गया जिसे कल समूहवार पूरे सदन के सामने प्रस्तुत करना होगा। प्रत्येक समूह ने दीवार पत्रिका की उपयोगिता के बारे में लिख लिया था जिन्हें जमा कर लिया गया। घर लौटकर मैंने डायरी लिखते हुए उनका अध्ययन भी किया। ‘व्यंग्य समूह’ ने लिखा है कि दीवार पत्रिका के माध्यम से प्रत्येक विद्यार्थी अपने मन के विचारों को लिखित रूप से व्यक्त कर सकता है। इससे उसका ज्ञान बढ़ता है और लेखन में भी निपुण होता है। इस समूह ने एक महत्वपूर्ण बात और लिखी है कि विद्यार्थी को वर्तमान समय में केवल किताबी कीड़ा ही नहीं बनना चाहिए बल्कि उसे अन्य जानकारियां भी रखनी चाहिए। ‘संस्मरण समूह’ का कहना है कि दीवार पत्रिका में दूसरों का लिखा देखकर हमारा भी लिखने का मन करता है। ‘निबंध समूह’ मानता है कि इसके माध्यम से हम अपनी लिखने और सोचने की शक्ति बढ़ा सकते हैं तथा अपनी कला को और संुदर बना सकते हैं। ‘कविता समूह’ और ‘कहानी समूह’ दोनों का कहना है कि दीवार पत्रिका में छात्रों द्वारा की गई रचनाओं को देखकर अन्य छात्रों का आत्मविश्वास बढ़ता है। ‘कविता समूह’ ने एक सुझाव भी दिया है कि यदि दीवार पत्रिका में अच्छी रचनाओं को पुरस्कृत भी किया जाय तो छात्र उसकी ओर अधिक आकर्षित होंगे।
आज कार्यशाला लगभग दो घंटे चली। कार्यशाला के अंत में साथी शिक्षक सुभाष चंद्र वर्मा भी हाॅल में आए उन्होंने स्वीकार किया कि बच्चों के लिए इस तरह की कार्यशाला की बहुत आवश्यकता है ताकि बच्चे अपनी मौलिक अभिव्यक्ति कर सकें। चलते-चलते ही हिमांशु बसेड़ा जो दीवार पत्रिका के संपादक भी हैं उनसे आज के दिवस की आख्या लिखने के लिए कहा। दिन की शुरुआत भले निराशाजनक रही लेकिन अंत अच्छा ही रहा। मन को संतोष पहुँचा कि चलो एक शुरुआत तो हो गई।
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22-04-14
कार्यशाला को लेकर बच्चों में कोई खास उत्साह नहीं देखा। बहुत कम बच्चे समय पर कार्यशाला स्थल पर पहुँचे। शायद इसका कारण यह हो कि उन बच्चों को भी कार्यशाला में बैठा दिया जिनकी पढ़ने-लिखने में कोई खास रूचि नहीं है। बाल पत्रिकाएं जिन्होंने कभी देखी तक नहीं। पहले चयनित बच्चों के साथ ही कार्यशाला करने का मन था लेकिन संख्या कम होने के चलते लगा सभी को शामिल कर लिया जाय। कुछ तो सीखेंगे। पता नहीं यह निर्णय कितन सही है यह कार्यशाला पूरी होने के बाद ही पता चल पाएगा। कार्यशाला को रोचक बनाना अपने आप में एक चुनौती है। आज कुछ बच्चे अनुपस्थित भी थे तो कुछ वे बच्चे आए जो कल उपस्थित नहीं हो पाए। इस तरह कल के बराबर लगभग चार दर्जन बच्चों ने आज भी प्रतिभाग किया। अनुपस्थित रहने वालों में दो समूहों के समूह प्रमुख भी थे। कुछ बच्चों को शायद जिम्मेदारी भी नहीं बांध पाती है।
अकेले इनते बच्चों के साथ कार्यशाला करना आसान नहीं है। मुझे लगा यदि प्रत्येक समूह या फिर दो समूहों के साथ भी एक और अध्यापक होते तो काम आसान भी होता और प्रभावशाली भी। बच्चों के साथ लगातार लगे रहना पड़ता है अन्यथा वे आपस में बातें करने लग जाते हैं। कभी -कभी झगड़ने भी। जब प्राथमिक विद्यालय में पाँच कक्षाओं को अकेले पढ़ाना होता था तब भी इसी मनोदशा से गुजरना होता था।एक समय में एक साथ एक से अधिक कक्षाओं को पढ़ाना बहुत चुनौती पूर्ण कार्य है। बहुकक्षा शिक्षण या बहुस्तरीय शिक्षण मुझे आज भी सैद्धांतिक अवधारणा ही लगती है, कम से कम परम्परागत स्कूल व्यवस्था में तो। खैर यहाँ विषयांतर हो रहा है।
आज कार्यशाला की शुरुआत पिछले दिन की आख्या के वाचन से हुई। जिस छात्र को आख्या लिखने के लिए कहा था वह आख्या घर पर ही भूल आया था इसलिए उसी समूह के अन्य साथी प्रेम प्रकाश पाण्डेय ने आख्या प्रस्तुत की। आख्या संक्षेप में ही थी। दूसरे समूह को दूसरे दिन की आख्या सौंपते हुए मैंने कुछ विस्तार से लिखने का सुझाव दिया। अच्छा यह लगा कि ‘निबंध समूह’ ने स्वेच्छा से यह काम ले लिया।
इसके पश्चात हर समूह को अपनी पसंद की किसी एक विधा की रचना प्रस्तुत करने के लिए कहा गया। तीन समूहों ने कविता ,तीन ने कहानी और एक समूह ने चुटकुले प्रस्तुत किए। प्रत्येक समूह की प्रस्तुति के बाद उन्हें कुछ आवश्यक सुझाव दिए गए ,जैसे किसी भी रचना को हाव-भाव से प्रस्तुत किया जाना चाहिए तथा रचना याद हो तो प्रस्तुति अधिक आकर्षक हो जाती है। साथ ही आत्मविश्वास भी बढ़ता है। ‘कहानी समूह’ और ‘निबंध समूह’ की प्रस्तुति इसी कारण आकर्षक रही क्योंकि उन्होंने जो कहानी प्रस्तुत की वह उन्हें कंठस्थ थी।
अगली गतिविधि से पहले प्रत्येक समूह को पाँच-पाँच बाल पत्रिकाएं दी गई। उन्हें इन पत्रिकाओं का गहन अवलोकन कर खोजना था कि इनमें कौन-कौन से स्थाई स्तम्भ और विधाएं हैं?पहले बच्चों के समझ में कुछ नहीं आया। मैंने प्रत्येक समूह में जाकर उनकी मदद की। किसी एक पत्रिका में छपी प्रत्येक सामग्री के बारे में पूछा कि वह किस विधा में है? बच्चों ने कुछ का नाम बता दिया। कुछ का नाम मैंने उन्हें बताया। ‘संपादकीय’ की पहचान केवल वही बच्चे कर पाए जो ‘दीवार पत्रिका’ के संपादक मंडल से जुड़े रहे हैं। अंततः सभी समूहों ने मिलकर विभिन्न पत्रिकाओं में से लगभग तीस से अधिक स्तम्भ खोज निकाले। जो इस प्रकार हैं-संपादकीय,पत्र,कहानी,कविता,लेख,निबंध,डायरी,लोककथा,लघुकथा,पहेली,चुटकुले,जानकारी,प्रश्नोत्तरी,माथापच्ची,बालकूची,रास्ताढूँढों,बिंदुसेबिंदुमिलाओ,रंगभरो,महत्वपूर्णतिथियां,अनमोलवचन,कार्टून,चित्रकथा,यात्रा वृत्तांत,गतिविधि(समाचार),बोधकथा,बड़ो का बचपन,खेल की दुनिया,शब्द चित्र,अंतर ढूँढो आदि।इस गतिविधि के पूरे होने-होने तक मैं भी थक गया और बच्चे भी। मैंने जल्दी-जल्दी बच्चों को गृह कार्य के रूप में उक्त स्तम्भों के लिए प्रत्येक समूह को एक-एक रचना खोज लाने को कहा जिसका कल प्रस्तुतीकरण किया जाएगा। आशंका है कल बच्चों की संख्या कम हो सकती है। वैसे मुझे सभी बच्चों से बेहतर कर पाने की उम्मीद नहीं है कुछ बच्चों में भी पढ़ने-लिखने की अभिरूचि पैदा हो पायी तो यह इस कार्यशाला की उपलब्धि होगी। आज कार्यशाला के दौरान कक्षा नौ में प्रवेश लेने वाले बच्चे और उनके अभिभावक भी आते रहे जिसके चलते कुछ व्यवधान भी पैदा होता रहा। आज भी कार्यशाला लगभग दो घंटे ही चल पायी।
घर लौटते हुए जीप में एक विचार आ रहा था कि इस सत्र में कक्षा-9 और 10 के बच्चों को सामाजिक विज्ञान के परियोजना कार्य के रूप में ‘दीवार पत्रिका’ निर्माण का कार्य दिया जाय। एक सप्ताह में एक बच्चे को एक अंक तैयार करने को कहा जा सकता है। इस पत्रिका में कोशिश की जाय कि जिस भी विधा की रचना सम्मलित की जाय उसका संबंध कहीं न कहीं सामाजिक विज्ञान विषय से हो। मुझे लगता है यह एक उपयोगी गतिविधि हो सकती है। देखिए,कैसे परिणाम रहते हैं।
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23-04-14
कार्यशाला का तीसरा दिन पिछले दो दिनों से बेहतर रहा। बच्चे खुश दिखे। लगा उन्हें कुछ आनंद आ रहा है। पर बीच-बीच मंे चुप कराने के लिए चिल्लाना पड़ा। पिछली दिन की आख्या से दिन की शुरूआत हुई। आख्या संक्षिप्त थी। मैंने विस्तार देने पर जोर दिया। साथ ही सभी प्रतिभागियों को सुझाव दिया कि अच्छा हो यदि सभी बच्चे घर जाकर रोज की आख्या लिखें। अच्छा लगा कल की आख्या लिखने के लिए दो समूहों ने हाथ खड़े किए। मैंने ‘कहानी समूह’ को यह दायित्व सौंपा।साथ ही प्रतिभागियों की इस बात के लिए प्रशंसा की कि वे स्वेच्छा से आगे आए। मैंने बच्चांे को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से कहा -ये अवसर हैं कुछ करने के । जीवन में सफलता के लिए अवसरों को पकड़ना जरूरी है। जीवन क्रिकेट है तो अवसर कैच हैं जिनको पकड़ने वाला सफल होता है और छोड़ने वाला असफल। ़इस तरह की कार्यशालाएं कुछ लिखने-बोलने का अवसर देती हैं जिनमें आगे आकर भाग लिया जाना चाहिए। बच्चों ने इस बात को बहुत ध्यान से सुना। मुझे अच्छा लगा।
इसके बाद ‘पहेली बूझो’गतिविधि करवायी गई। जिसके तहत कार्यशाला कक्ष के भीतर दिख रही किसी भी चीज पर उसका नाम लिए बिना पाँच-पाँच वाक्य लिखने के लिए कहा गया। ये पाँच वाक्य ऐसे होने चाहिए जो उस वस्तु की विशेषताओं को बताते हों। जिनको सुनकर कोई भी उस वस्तु का नाम बता दे। प्रत्येक समूह ने एक-एक वस्तु को लेकर पाँच वाक्य लिखे जिसके लिए दस मिनट का समय दिया गया। पहेली तैयार होनेे के बाद उसे पूरे सदन के सामने प्रस्तुत किया गया। एक वाक्य सुनकर उत्तर देने वाले को पाँच, दो वाक्यों पर चार ,तीन वाक्यों पर तीन,चार वाक्यों पर दो ,पाँच वाक्यों के बाद उत्तर देने वाले को एक अंक प्रदान किया गया। किसी के द्वारा उत्तर न देने पर पूरे पाँच अंक पूछने वाले समूह के खाते में जोड़े गए। बच्चों ने इस गतिविधि में बहुत उत्साह से भाग लिया। भले इसमें कारण जो भी रहे हों। बच्चे ऐसी गतिविधियों में अधिक रूचि लेते हैं जिनमें ‘हार-जीत’ शामिल होती है। बच्चे हमेशा जीतना चाहते हैं। उन्हें चुनौती पसंद होती है।
कल घर से हर प्रतिभागी को अपनी पसंद की एक-एक रचना चुन कर लाने को कहा गया था । लगभग प्रत्येक बच्चा रचना लेकर आया था। पहले चरण में प्रत्येक समूह से एक-एक रचना प्रस्तुत करने के लिए बुलाया गया। तीन समूहों ने कहानी ,दो ने कविता,एक ने सामान्य ज्ञान के तथ्य और एक ने चुटकुले प्रस्तुत किए। चुटकुलों को छोड़कर अन्य रचनाओं को चयन अच्छा था। कहानियों का चयन और प्रस्तुतीकरण दोनों बेहतरीन कहा जा सकता है। कहानी कंठस्थ होने केे कारण ऐसा रहा हो। सुनाई गई तीनों कहानियां लोककथाएं थी। इससे पता चलता है कि लोककथा का शिल्प शायद बच्चों को अधिक सहज-सरल प्रतीत होता है।कथ्य की दृष्टि से भी इन कहानियों का चयन बहुत अच्छा था। ‘संस्मरण समूह’ के जीवन सिंह विष्ट की लोककथा अंधविश्वास पर करारी चोट करने वाली थी।
अगली गतिविधि के रूप में प्रत्येक बच्चे को अपने द्वारा चुनी गई रचना पर लिखने के लिए कहा गया। रचना कहाँ से चुनी गई और क्यों चुनी गई ? इस पर सभी बच्चों ने अपनी राय लिखी। इस गतिविधि को करते हुए थोड़ी देर के लिए कक्ष में सन्नाटा छा गया। इसी गतिविधि के साथ आज के दिवस का समापन हुआ। इसी बीच बच्चोें को यह भी सूचना दी गई कि इस वर्ष सामजिक विज्ञान के परियोजना कार्य के रूप में प्रत्येक बच्चे को दीवार पत्रिका के एक-एक अंक का संपादन करना होगा। एक सप्ताह में एक अंक तैयार किया जाएगा। इस पत्रिका में अधिकाधिक सामग्री सामाजिक विज्ञान से संबंधित होगी। आज के दिवस के समापन होते-होते मध्य प्रदेश से कवि मित्र मोहन नागर का फोन आया। उन्होंने कार्यशाला के बारे में फेसबुक से जाना। आयोजन पर खुशी व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि बच्चों में रचनात्मकता के विकास में इस तरह के कार्यशालाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसी अधिक से अधिक कार्यशालाएं आयोजित की जानी चाहिए। आज सुबह फेसबुक पर मैंने बच्चों में बिंबों और रूपकों की समझ विकसित करने के उद्देश्य से कौनसी गतिविधि विकसित की जानी चाहिए? इस आशय की पोस्ट लगाई जिस पर कमेंट करते हुए उन्होंने अपनी एक कविता भी भेजी है। जो इस प्रकार है-
ऐसे नहीं बेटा-
धीरे-धीरे पंख फैलाओ
खुद को भारमुक्त करो
अब पांव सिकोड़ो .....
थोड़े और ....शाबाश!
अब कूद जाओ
डरो नहीं....मैं हूँ ना
गिरे तो थाम लूंगी....
-चिड़िया अपने बच्चों को उड़ना सिखा रही है!
ऐसा करते समय खुश है-
कि उसका बेटा भी
एक दिन दूर
बहुत दूर तक उड़ पाएगा.....
और दुखी यह सोचकर -
कि पंख ऊग जाने पर यही बेटा
एक दिन उसे छोड़कर
दूर.....बहुत दूर उड़ जाएगा।
इस पर देखना है कल बच्चों की क्या प्रतिक्रिया होती है।
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24-04-2014
आज बच्चांे के मूड को देखकर लगा उन्हें कार्यशाला में आनंद आया। गतिविधियां दो ही हो पाई पर बच्चों ने उसमें पूरी रूचि दिखाई। पहली गतिविधि थी-कहानी बनाओ। मैंने एक वाक्य बोला -एक समय की बात है। जिस पर आगे हर समूह एक-एक वाक्य जोड़ता गया।साथ ही अपनी कापी में लिखता भी रहा।दो चरण तक कहानी विधिवत आगे बढ़ती रही। बच्चों ने बहुत रोचक वाक्य जोड़े।तीसरे चरण में जोड़े गए वाक्य पर समूहों के बीच मतभेद पैदा हो गया। कुछ समूहों को लगा इनकी जगह अन्य वाक्य जोड़े जाते तो कहानी और बेहतर बन सकती थी।मैं मन ही मन खुश हुआ।यह टकराव इस बात का प्रतीक था कि बच्चे चिंतन-मनन कर रहे हैं। उनकी कल्पना हिलोरे मारने लगी है।सृजन की शुरुआत इसी बिंदु से तो होती है।मैंने जरूरत के अनुसार गतिविधि में परिवर्तन करते हुए प्रत्येक समूह को अपनी-अपनी तरह से कहानी आगे बढ़ाने को कहा। बच्चे पूरे मनोयोग से कहानी को आगे बढ़ाने लगे।
इस गतिविधि के दौरान बीच-बीच में वाक्य निर्माण और कहानी के तत्वों पर बात होती रही। जैसे-कहानी में छोटे-छोटे वाक्य होने चाहिए।एक शब्द के बार-बार उपयोग से बचना चाहिए। कहानी सीधी सपाट लाइन में न चलती जाए ,उसमें उतार-चढ़ाव आने चाहिए। इससे रोचकता बनी रहती है। किसी भी नए वाक्य की शुरुआत ‘और’ से नहीं की जानी चाहिए।आवश्यकता से अधिक शब्दों का प्रयोग नहीं होना चाहिए। किसी भी रचना में कल्पनाशीलता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है पर कल्पना कोरी या कपोलकल्पित नहीं होनी चाहिए उसका संबंध यथार्थ से होना चाहिए। समान ध्वनि के वर्णों के बीच बारीक अंतरों को भी बच्चों को बताया गया जैसे-ढ़ और ड़।
इसी दौरान कक्षा नौ के बच्चे भी आ गए। उन्हें भी इस गतिविधि से जोड़ा गया। कहानी आगे बढ़ाने को कहा गया।
अगली गतिविधि थी-बिंब रचो।बच्चों ने इसमें बहुत रूचि ली। सामने कक्षा नौ के कुछ बच्चे खड़े किए गए। प्रत्येक समूह से कहा गया कि उनमें से किसी एक बच्चे के रूप-रंग तथा हाव-भाव पर पाँच वाक्य लिखिए जिससे बिना नाम लिए या संकेत किए पता चल जाय कि वह बिंब किस बच्चे का है?वाक्य तैयार करने के बाद क्रमशः हर समूह ने अपने वाक्य सामने आकर प्रस्तुत किए, जिसके उत्तर वहाँ बैठे कक्षा नौ के बच्चों ने दिए। जिस समूह के वाक्यों को सुनकर बच्चे की सही पहचान बता दी गई ,उन्हें पाँच अंक प्रदान किए गए। जिस समूह के बिंब को बच्चे सही-सही नहीं पकड़ पाए उन्हें शून्य अंक मिला।केवल दो समूहों के बिंबों की पहचान सही तरह से नहीं हो पायी। इस गतिविधि को करते हुए मुझे एक गलती का अहसास भी हुआ। जिन बच्चों को सामने खड़ा किया गया था अपने बारे में सुनते हुए वे कुछ असहज हो रहे थे।शायद उन्हें बुरा लग रहा
गृह कार्य के रूप में भी आज एक बिंब रचने के लिए ही दिया गया, जिसका कल सदन में प्रस्तुतीकरण किया जाएगा।कल पहले सभी बच्चे अपने द्वारा रचे बिंब को अपने समूह में सुनाएंगे।समूह में जो बिंब सबसे अधिक पसंद आएगा उसे पूरे सदन के सामने रखा जाएगा।
गत दिनों की तरह ही आज भी दिवस की शुरुआत आख्या प्रस्तुतीकरण से हुई। आख्या बहुत विस्तार से लिखी गई थी। पिछले दो दिनों की अपेक्षा आज की आख्या बहुत बेहतर बन पड़ी थी। इससे पता चलता है कि बच्चों के समझ में धीरे-धीरे आ रहा है कि आख्या कैसे लिखी जानी चाहिए।इस आख्या को तैयार करने से पहले मैंने इस समूह को बाल पत्रिका ‘अनुराग’के एक अंक में प्रकाशित बाल रचनात्मक शिविर की रिपोर्ट पढ़ने का सुझाव दिया।मुझे हमेशा से लगता आया है कि बच्चों को किसी रचना को तैयार करने के बारे में सैद्धांतिक रूप से बताने की अपेक्षा यदि उस विधा से संबंधित कोई अच्छी रचना पढ़ने को दी जाय तो बच्चे अधिक जल्दी समझते हैं। आज की आख्या के बारे में बोलते हुए बच्चों को यह भी बताया कि जिस तरह से आख्या लिखी जाती है लगभग उसी तरह से समाचार भी लिखे जाते हैं। बस उसमें इस बात का ध्यान रखने की आवश्यकता होती है कि ‘मैं’ या ‘हम’ जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं करना है। तटस्थ होकर लिखना है। एक अच्छे समाचार की विशेषता होती है कि वह क्यों,कहाँ,कैसे,कब,क्या,कौन? इन छः ककार का उत्तर देता है। आख्या से भी इनके उत्तर मिलने चाहिए। बच्चे मेरी बात को बड़े ध्यान से सुनते रहे।
घर लौटते हुए प्रधानाचार्य श्री ए0के0 श्रीवास्तव ने कार्यशाला की प्रशंसा करते हुए कहा कि बच्चे के बहुमुखी विकास के लिए गणित या साइंस जैसे विषयों को पढ़कर ही नहीं चलेगा। बच्चों का बाल पत्रिकाओं और साहित्य से भी जुड़ना जरूरी है। रोज एक से रूटीन वर्क से बच्चे ऊब जाते हैं इसलिए कभी-कभी विद्यालय में कुछ हटकर भी होना चाहिए जिससे बच्चों में रचनात्मकता पैदा हो। इस तरह की गतिविधियां मोनोटोनस वातावरण को तोड़ कर बच्चों में ताजगी पैदा करती हैं।बच्चों मंे पढ़ने-लिखने के प्रति लगन पैदा करती हैं।किसी भी संस्थाध्यक्ष की इस तरह की प्रतिक्रिया संस्था में काम करने वालों के मन में एक नया उत्साह पैदा कर देती हैं। मेरा मानना है कि संस्थाध्यक्ष भले खुद बहुत कुछ न कर पाए यदि काम करने वालों की पीठ थपथपाता रहे और उन पर विश्वास करे तो इतने से ही विद्यालय का वातावरण बदलने लगता है।
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25-04-14
पहला वादन खाली होने के कारण आज पिछले दिनों की अपेक्षा कुछ समय पहले कार्यशाला प्रारम्भ हो गई।बच्चों ने अपने-अपने रचे बिंब समूह में सुनाए और एक बिंब का चयन किया जिसे बाद में पूरे सदन के सामने प्रस्तुत किया गया जिनमें से अधिकांश बिंबों की पहचान वहाँ उपस्थित बच्चों ने कर ली लेकिन कुछ बिंब, बिंब की अपेक्षा पहेली के नजदीक चले गए थे। पहेली मूर्त को अधिक अमूर्त कर देती है जबकि बिंब अमूर्त को अधिक मूर्त बनाते हैं।
इससे पहले आख्या प्रस्तुत की गई जिसे आज और अधिक विस्तार दिया गया था।छोटे-छोटे विवरणों को भी आख्या में प्रस्तुत करने की सफल कोशिश की गई थी। जब आख्या प्रस्तुत की जा रही थी अचानक सूझा कि क्यों न इसको भी एक गतिविधि से जोड़ लिया जाय। इसके तहत बच्चों से कहा कि सभी बच्चे आख्या को ध्यान से सुनते हुए इस बात को नोट करेंगे कि इसमें कल की कार्यवाही में से कौनसी बात छूट गई है? यह भी तय किया गया कि जो समूह इस आख्या में जितने वाक्य जोड़ेगा उसे उतने अंक प्रदान किए जाएंगे। ‘उपन्यास समूह’ को छोड़कर सभी समूहों ने कुछ न कुछ जोड़ा। ‘व्यंग्य समूह’ ने तो एक पूरा अनुच्छेद जोड़ दिया। कल वाक्य संरचना और कहानी के बारे में जो बातें कही गई थी उन्होंने लगभग सभी बातें जोड़ दी।यह जानकर अच्छा लगा कि बच्चे छोटी-छोटी बातों को भी ध्यान में रख रहे हैं।
आज ‘कविता बनाने’ की गतिविधि भी करवाई गई जिसमें प्रत्येक समूह को एक पंक्ति दी गई जिसे आगे बढ़ाते हुए कविता बनाने के लिए कहा गया।कविता के विषय बच्चों के आसपास के अनुभवों से जुड़े थे। जैसे- बोटल ब्रश , हमारा स्कूल, कैंटीन, पुस्तकालय,घंटी। कहानी समूह को कोई विषय न देकर अपने पसंद के किसी भी विषय पर कविता बनाने को कहा गया। बोटल ब्रुश पर कविता लिखने के लिए संबंधित समूह को बोटल ब्रुश के पेड़ के नीचे बैठकर कविता बनाने को कहा।इन दिनों हमारे विद्यालय में बोटल ब्रुश खिला हुआ है पूरे पेड़ लाल-लाल फूलों से लदे-फदे हुए हैं। बच्चों ने अपने-अपने समूह में कविताएं पूरी की लेकिन समय के अभाव के चलते पाठ नहीं हो पाया। कल इनका पाठ कराया जाएगा। आज बच्चों को घर से भी एक-एक कविता बना लाने को कहा गया है। साथ ही दीवार पत्रिका के लिए सामग्री एकत्र करते रहने का सुझाव दिया गया। ताकि सोमवार को सभी समूह अपनी-अपनी एक दीवार पत्रिका तैयार कर सकें।
कविता मंे बिंबों और रूपकों का बहुत महत्व होता है। रूपक बिंब को और अधिक प्रभावकारी और जीवंत बना देते हैं।रूपकों की समझ विकसित करने के उद्देश्य से एक गतिविधि करायी गई-रूपक गढ़ो। इसके अतंर्गत बच्चों को अधूरे वाक्यों को पूरा करने के लिए कहा गया जैसे-घंटी ऐसे बोली जैसे...........। पेड़ ऐसा लग रहा है जैसे........। हवा चल रही है जैसे.....। उसका हंसना जैसे......। जंगल ऐसा लग रहा है जैसे .........। बच्चों ने अपनी कल्पना से बहुत जीवंत वाक्य बनाए।मैं उन्हें पढ़कर गदगद हो उठा।मैंने इतनी ताजगी की अपेक्षा नहीं की थी। एक बच्चे ने लिखा -जंगल ऐसा लग रहा है जैसे हरियाली का सागर हो। एक अन्य ने-जंगल ऐसा लग रहा है जैसे गहरी लंबी गुफा। पेड़ ऐसा लग रहा हो जैस हवा से बोल रहा हो। आदि। वास्तव में हम बच्चों को उनकी क्षमता से कम आंकते हैं जो गलत है।
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27-4-20014
कल का दिन इस रूप में महत्वपूर्ण रहा कि एक भूतपूर्व छात्र कामेश कुमार कार्यशाला में उपस्थित रहे। सारी गतिविधियों को गौर से देखते रहे। अपनी डायरी से कुछ सामान्य ज्ञान के तथ्य बच्चों को नोट भी कराए। ‘कल्पना की उड़ान भरो’ गतिविधि में शामिल होते हुए उन्होंने भी एक कविता बनायी। इस गतिविधि के अंतर्गत बच्चों के सामने पाँच काल्पनिक स्थिति रखी जिस पर बच्चों को विस्तार से अपने विचार रखने थे।उनको छूट थी कि चाहें तो पाँचों स्थितियों में लिखें या किसी एक स्थिति पर। यह गतिविधि प्रत्येक प्रतिभागी को व्यक्तिगत रूप से करनी थी। कुछ बच्चों को छोड़कर अधिकांश बच्चों ने पाँचों स्थितियों पर अपने कल्पना की उड़ान भरते हुए लिखा। एक-दो बच्चों ने अपनी कल्पना को कविता के रूप में व्यक्त किया। पाँच स्थितियां इस प्रकार थी- पेड़ हवा से क्या बातें करते होंगे? घंटी हथौड़े से क्यों नाराज होती होगी?फूल चिड़िया को देखकर क्या सोचता होगा?नदी को दौड़ते हुए देखकर पत्थर क्या कहते होंगे?बकरी को कसाई कैसा लगता होगा?इन पर कुछ रोचक कल्पनाएं पढ़ने को मिली। कुछ उदाहरण देखिए-पंकज सिंह महर ने लिखा-
1-पेड़ हवा से बातें करते होंगे कि इस हवा को कोई काम नहीं होगा। ये तो दिन भर आवारों की तरह अपनी धुन में इधर-उधर घूमती रहती है। प्यारे-प्यारे हरे-हरे पत्ते गिरा देती है।
2-घंटी हथौड़े से क्यों नाराज होती होगी क्योंकि घंटी सोचती होगी कि यह हथौड़ा मुझे बिना कसूर के रोज-रोज मारता रहता है और मुझे रो-रो कर चिल्लाने पर मजबूर करता है।
3-फूल चिड़िया को देखकर सोचती होगी कि मेरा रस ले जाएगा, भरा कटोरा मेरा खाली कर जाएगा।
4-नदी को दौड़ते हुए पत्थर कहते होंगे काश! हमारे भी हाथ-पैर होते हम भी इधर-उधर जाते।
5-बकरी को कसाई ऐसा लगता होगा जैसे हाथ में तलवार लेकर यमदूत खड़ा हो। काट दे मुझे कमा ले पैसा।
इससे पूर्व कार्यशाला का प्रारम्भ रोज की तरह आख्या से हुआ। काफी विस्तृत और बारीक विवरण। सभी ने उसकी सराहना की।मुझे भी बहुत अच्छा लगा कि बच्चे छोटी-छोटी बातों को भी पकड़ रहे हैं। पहले मुझे डर था कि मेरी बातें कहीं बच्चों के लिए अधिक भारी तो नहीं हो रही हैं लेकिन बच्चे समझ रहे हैं। कल कार्यशाला पिछले दिनों से कुछ विलंब से प्रारम्भ हुई।
कल संक्षेप में बच्चों को साक्षात्कार के बारे में बताते हुए अपने आसपास रहने वाले किसी ऐसे व्यक्ति का साक्षात्कार लेने के लिए कहा जो अपने किसी काम के लिए विशेषरूप से जाना जाता है। साथ ही दीवार पत्रिका के लिए रचनाएं तैयार करते रहने के लिए कहा ताकि अगले दिन दीवार पत्रिका का निर्माण किया जा सके। आज रविवार होने और कल चुनाव प्रशिक्षण में ड्यूटी होने के कारण कार्यशाला नहीं चल पाएगी। अवकाश के चलते बच्चों का रचना तैयार करने के लिए अधिक समय मिल पाएगा।
कल एक बात और हुई भले ही उसका संबंध इस कार्यशाला से नहीं है लेकिन बच्चों की रचनात्मकता से जुड़ी है इसलिए यहाँ उल्लेख करना प्रासंगिक लग रहा है। कक्षा बारह के विद्यार्थियों की राजनीति विज्ञान की कक्षा ली। इन दिनों देश में लोकसभा के लिए आम चुनाव चल रहे हैं। मुझे लगा भारत के राजनैतिक दलों और चुनाव प्रणाली के बारे में जानने-समझने का इससे अच्छा मौका क्या हो सकता है। इस विषय पर एक प्रोजेक्ट कार्य दिया जिसके तहत निम्न प्रश्नों के उत्तर खोजने को कहा गया-
1-वर्तमान में देश में किस स्तर की सरकार के गठन के लिए चुनाव चल रहे हैं?
2-इस चुनाव में कौन-कौन से राजनीतिक दल भाग ले रहे हैं ?उनके चुनाव चिह्न और अध्यक्षों के नाम पता कीजिए।
3-इन राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के रूप मंे वर्गीकृत कीजिए।
4-क्षेत्रीय दलों में कौनसा दल किस राज्य में सक्रिय है?
5-आपके संसदीय क्षेत्र में किस-किस राजनीतिक दल ने अपने उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे हैं?उनके नाम भी लिखो।
6-सभी राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणा पत्र एकत्र करो और उनका अध्ययन करते हुए ज्ञात करो कि उनमें क्या-क्या अंतर हैं?
7-देश में चुनाव संपन्न कराने का कार्य किसकी देखरेख में होता है? उससे जुड़े प्रमुख पदाधिकारियों का नाम पता कीजिए।
8-आपके क्षेत्र में आने वाली चुनाव टीम के बारे में पता कीजिएगा कि उसमें कितने सदस्य हैं और उनके पद नाम क्या हैं?
9-देश में कौन-कौन से मुख्य गठबंधन हैं और उनमें कौन-कौन से राजनीतिक दल शामिल हैं?
10-सरकार बनाने को किसी दल को कम से कम कितनी सीटों की आवश्यकता होती है? पता कीजिए इन चुनावों में किस राजनीतिक दल को कितनी सीटें प्राप्त हुई?
मेरा मानना है कि यदि बच्चे इस प्रोजेक्ट पर काम करते हैं तो उन्हें भारतीय राजनीति से संबंधित राजनीति विज्ञान की विषयवस्तु को समझने में आसानी होगी। गतवर्ष पाया कि कक्षा 12 के अधिकांश बच्चों को यह भी पता नहीं कि सरकार कैसे बनती है और वर्तमान में उनके देश में किस गंठबंधन की सरकार है? मेरा मानना है यदि बच्चे उक्त प्रोजेक्ट को ध्यान से करते हैं तो आने वाले साल में ऐसी स्थिति नहीं रहेगी। यह एक शिक्षक के रूप में मेरे लिए अध्ययन का विषय भी होगा। देखिए क्या परिणाम होते हैं।
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29-04-2014
आज तो आख्या ने पिछले दिनों के सारे रिकार्ड तोड़ दिए। इतनी लंबी आख्या कि पढ़ते हुए स्वंय लिखने वाले का मुँह सूख गया। छोटी सी छोटी बात को भी उसका हिस्सा बनाया गया था। पर गजब तो तब हुआ जब बच्चों से मैंने पूछा कि इसमें क्या छूट गया है? तो उन्होंने बहुत सारी बातें और जोड़ दी। इससे पता चलता है कि बच्चों का अवलोकन कितना गहरा होता है। यदि विषय पर उनकी रुचि हो तो वह छोटी से छोटी बात भी भूलते नहीं। लिखने में दो दिन भी लगा सकते हैं। जब मैंने ‘संस्मरण’ समूह के छात्र जीवन सिंह बिष्ट से पूछा कि उन्हें इसको लिखने में कितना समय लगा तो उन्होंने बताया कि दो दिन। लगता है छुट्टी वाले पिछले दो दिन वह इसी में लगे रहे।इतनी तन्मयता के पीछे कौनसी प्रेरणा रही यह अध्ययन का विषय है। वैसे मैंने पाया कि जीवन इस कार्यशाला में काफी सक्रिय रहे। वह बिना कहे भी रोज आख्या लिखकर ला रहे थे। अपने समूह में हर गतिविधि में सबसे अधिक भूमिका निभा रहे थे।
बहरहाल इससे पहले बच्चों को दीवार पत्रिका बनाने के लिए आवश्यक सुझाव दिए गए। पिछले दो दिनों में तैयार की गई रचनाओं में से अपने-अपने समूह में बैठकर चयन करने के लिए कहा गया जिसमें इस बात का ध्यान रखा जाय कि अधिक से अधिक विधाएं सम्मलित हों तथा अधिक से अधिक स्तम्भ बनाए जाय। रचनाएं स्वरचित हों।रोचकता का विशेष ध्यान रखा जाय। सुंदर व पठनीय लेख में लिखी हुई हों। वर्तनी की शु़द्धता पर ध्यान दिया जाय। विषयवस्तु के अनुकूल चित्र हों।पत्रिका को आकर्षक बनाने के लिए विविध चित्रों का उपयोग किया जाय।आदि-आदि।
सभी समूहों को चार्ट ,गोंद और लेखन सामग्री उपलब्ध कराई गई। अपनी-अपनी दीवार पत्रिका का शीर्षक तय करने के लिए कहा गया। कुछ समूहों ने एक से ही नाम रख लिए जैसे-‘उड़ान’ नाम तीन समूहों ने रख लिया मेरे हस्तक्षेप के बाद फिर परिवर्तन किया। सभी पूरी कलात्मकता से एक चार्ट पट्टी पर शीर्षक लिखने लगे। शीर्षक लिखने के लिए एक अलग से चार्ट की पट्टी का उपयोग किया गया जो मुख्य चार्ट से अलग रंग का था। थोड़ी देर बाद चिपकाने का काम भी प्रारम्भ हो गया। सभी बच्चे अपने-अपने कामों में लग गये। लेकिन आपस में बातचीत भी होती रही। जिससे हाॅल में काफी शोर हो रहा था। जहाँ लगभग 80-90 बच्चे बैठे हों मौन की कल्पना भी कैसे की जा सकती है। कक्षा नौ के बच्चों को कार्यशाला के बारे में अपने विचार लिखने के लिए कहा गया। लेकिन शोर थम नहीं रहा था। दीवार पत्रिका तैयार कर रहे समूह कभी गोंद,कभी चार्ट ,कभी कैंची मांगने के लिए इधर-उधर जा रहे थे। ऐसे में शोर का होना स्वाभाविक था। मुझे बार-बार चुप कराने के लिए चिल्लाना पड़ रहा था। मुझे लगा कक्षा नौ को कुछ ऐसा काम दिया जाय जिसे वे बाहर प्रांगण में जाकर करें। उसी समय एक गतिविधि तैयार की-अपने स्कूल को जानो। इसके अंतर्गत सात समूह बनाए प्रत्येक समूह में आठ-आठ बच्चे शामिल किए गए जिन्हें निम्न बिंदुओं पर सर्वे करने को कहा गया-
1- अपने विद्यालय में नियुक्त शिक्षकों के नाम और उनके द्वारा पढ़ाए जाने वाले विषयों की सूची तैयार कीजिए।
2-विद्यालय भवन और परिसर में कुल कितने कमरे हैं ?उनकी संख्या और उपयोग का पता कीजिए।
3-विद्यालय परिसर में पाए जाने वाले वृक्षों के नाम और उनकी संख्या पता कीजिए और उसकी तालिका तैयार कीजिए।
4-विद्यालय में उपलब्ध सुविधाओं की सूची तैयार कीजिए।
5- आपके विद्यालय में किस-किस गाँव से बच्चे पढ़ने आते हैं?सूची तैयार कीजिए।
6-इस विद्यालय में हाईस्कूल और इंटमिडियेट में विशेष स्थान प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों का नाम और गाँव पता कीजिए।
7-विद्यालय परिसर की सीमा में किस दिशा में कौनसे गाँव या अन्य स्थान स्थित हैं ?पता कीजिए।
इस गतिविधि के लिए बच्चे हाॅल से बाहर गए तो हाॅल में काफी शांति हो गई। कक्षा दस के बच्चे अपने काम में लगे रहे। आज तीन घंटे कब गुजर गए पता ही नहीं चला। अभी दीवार पत्रिका में रचनाएं चिपकाने का काम पूरा नहीं हुआ है कल जारी रहेगा। उसके पश्चात बच्चे प्रत्येक दीवार पत्रिका की समीक्षा करेंगे। अलग-अलग बिंदुवार समीक्षा का कार्य दो-दो के समूह में सौंपा जाएगा।इस तरह बच्चों के द्वारा ही सर्वश्रेष्ठ पत्रिका का निर्धारण किया जाएगा।
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01-05-2014
कल अन्य दिनों की अपेक्षा कार्यशाला कम समय तक चल पाई। पूरा समय बच्चे अपनी-अपनी दीवार पत्रिका को अंतिम रूप देने में लग रहे। छुट्टी की घंटी बज गई थी लेकिन अब भी कुछ समूह अपने काम में तल्लीन थे।सभी इस कोशिश में लगे थे कि उनकी पत्रिका सबसे बेहतरीन हो।
जब तक कक्षा दस वाले अपना गणित का वादन पढ़ कर आते कक्षा नौ के विद्यार्थियों से पिछले दिन दिए गए कार्य को अंतिम रूप देकर जमा करने को कहा। फिर एक और प्रोजेक्ट पर काम करने को प्रश्न लिखाए। प्रत्येक बच्चे को विद्यालय में गत वर्ष तक पढ़ रहे पाँच बच्चों से बातचीत करने के लिए कहा गया। प्रश्नावली इस प्रकार थी-
सर्वे करने के बाद समूहवार उसका सार-संक्षेप तैयार किया।पर इस दौरान अफरा-तफरी बन रही। कक्षा नौ के बच्चे बाहर-भीतर ही करते रहे। कुछ ने काम जल्दी कर लिया तो कुछ अभी कर ही रहे थे।जल्दबाजी के चलते सार के लिए कोई निश्चित प्रारूप तैयार नहीं हो पाया।
उपन्यास समूह द्वारा प्रस्तुत आख्या में वर्तनी और वाक्य विन्यास की बहुत सारी गलतियां थी।अनावश्यक विवरण भी आए थे। कल को की जाने वाली समीक्षा के लिए हर समूह से दो-दो बच्चों के नाम मांगे गए। इसको लेकर बच्चांे में कुछ हिचक थी क्योंकि उन्होंने समीक्षा शब्द पहली बार सुना था। कुछ बच्चे इससे बचना चाह रहे थे। समापन के समारोह में क्या-क्या होगा इसको लेकर भी कुछ बच्चों से बात हुई। मोटी-मोटी योजना बना ली गई है।यह तय किया गया है कि प्रत्येक समूह अपनी-अपनी दीवार पत्रिका में से कम से कम एक-एक रचना समापन के अवसर पर प्रस्तुत करेगा।साथ ही समापन समारोह की रिपोर्टिंग करने की जिम्मेदारी कुछ बच्चों को सौंपी गई। रिपोर्टिंग कैसे करनी है? उन्हें इस बारे में आवश्यक सुझाव दिए गए। प्रत्येक समूह से सबसे अधिक सक्रिय एक बच्चे को इस कार्य के लिए चुना गया है।मेरा विचार है कि इन बच्चांे द्वारा तैयार सबसे अच्छी रिपोर्ट को समाचार पत्रों में प्रकाशनार्थ भेजा जाएगा।
आज समीक्षा करने के साथ-साथ बच्चों के सहयोग से आमंत्रण पत्र तैयार किए जाएंगे।कक्षा नौ के बच्चों से क्या करवाया जाएगा अभी कुछ तय नहीं किया है।
6 बजे सायं
दो-दो बच्चों के समूह में समीक्षा का काम शुरू किया गया। सात समूह बनाए गए। प्रत्येक समूह को अलग बिंदु पर यह काम दिया गया जो इस प्रकार था-रचना की मौलिकता, स्तभ्मांे की संख्या,चित्र और विषयवस्तु के बीच संबंध, शीर्षक की नवीनता और संक्षिप्तता, रचनाकारों की संख्या, बच्चों के लिए करने के अवसर, सुलेख व वर्तनी की शुद्धता ,रोचकता आदि। इन बिंदुओं के आधार पर प्रत्येक दीवार पत्रिका की ग्रेडिंग की गई। जिस समय कुछ बच्चे समीक्षा का काम कर रहे थे उसी समय अन्य बच्चों को निम्न बातों का ध्यान रखते हुए कार्यशाला पर अपने अनुभव लिखने के लिए कहा गया-1-कार्यशाला कब से कब तक आयोजित की गई?2-कार्यशाला के दौरान क्या-क्या हुआ?3-कार्यशाला का आयोजन क्यों किया गया?4-आपको सबसे अच्छा क्या लगा?5-क्या पसंद नहीं आया?6-क्या भविष्य में भी इस तरह की कार्यशाल में प्रतिभाग करना चाहोगे और क्यों?7-कार्यशाला के दौरान आपको क्या परेशानी हुई?8-कार्यशाला को लेकर आपके सुझाव क्या हैं?9-कार्यशाला को लेकर आपके मित्रों की क्या प्रतिक्रिया रही?10-क्या इस कार्यशाला के बारे में आपके घर वालों को भी पता है?यदि हाँ तो उनकी क्या प्रतिक्रिया है?
जो बच्चे समीक्षा का कार्य कर रहे थे उन्हें यह कार्य घर से कर लाने को कहा गया। इसके बाद कल के लिए प्रत्येक समूह से एक-एक बच्चे को रिपोर्टिंग का कार्य सौंपा गया। उन बच्चों के नाम और रचनाएं भी प्रत्येक समूह से मांग ली गई हैं जो कल अपनी रचना का पाठ करेंगे। कुछ समूहों से एक से अधिक बच्चों के नाम भी आए हैं। अधिकांश समूहों से कहानी पाठ के लिए नाम आए हैं। घर जाने से पहले प्रत्येक बच्चे से कल के आयोजन को लेकर आमंत्रण पत्र लिखने के लिए कहा गया। अवलोकन करने के बाद पाया गया कि प्रत्येक में आंशिक संसोधन की आवश्यकता है। फिर सभी प्रतिभागियों को आमंत्रण पत्र लिखाया गया और जिन बच्चों के सुलेख हैं उनसे घर से आमंत्रण पत्र बनाकर लाने को कहा गया। कल जिन्हें शिक्षकों को वितरित किया जाएगा। कल के कार्यक्रम को लेकर मन में काफी उत्साह है। आज एक अभिभावक अपने किसी कार्य से विद्यालय आए थे उन्होंने भी बच्चों द्वारा तैयार दीवार पत्रिकाओं को सरसरी नजर से देखा और इस प्रयास पर प्रसन्नता व्यक्त की।
इस कार्यशाला के अंतिम दिन प्रतिभागी बच्चों से कार्यशाला के बारे में अपने अनुभव लिखने के लिए कहा गया। सभी बच्चों ने अपने अनुभव लिखे। कुछ बच्चों ने अपने अनुभवों को विस्तार से व्यक्त किया, जिनसे हमें बच्चों की सोच के बारे में बहुत कुछ पता चलता है।साथ ही यह भी समझ में आता है कि बच्चे इस तरह की गतिविधियों को किस तरह से लेते हैं और क्या प्रभाव ग्रहण करते हैं।अगली पोस्ट में आप बच्चों के अनुभव पढेंगे .
21-4-2014।रा0इ0का0देवलथल
दीवार पत्रिका निर्माण कार्यशाला को लेकर मैं बहुत उत्साहित था लेकिन शुरूआत कुछ अच्छी नहीं रही। कल लगभग बीस बच्चों ने अपना नामंकन करवाया था उसमें से केवल सात बच्चे उपस्थित थे।मन बहुत खराब हुआ। पता किया बच्चे क्यों नहीं आए? बताया कि कुछ बच्चे नए सत्र के लिए कापी-किताब खरीदने पिथौरागढ़ गए हैं। कक्षा दस की बोर्ड परीक्षा दे चुके जिन बच्चों को कार्यशाला में प्रतिभाग करने के लिए संदेश भेजा था उनमें से भी कोई नहीं आया जबकि कल परीक्षित और वंदना ने आने का आश्वासन भी दिया था।दोनों की गिनती अच्छे विद्यार्थियों में होती है। एक समय विचार आया कि कार्यशाला कल से प्रारम्भ की जाय। फिर लगा कल की क्या गारंटी। कक्षा दस के जो बच्चे पुस्तकालय में उपस्थित थे उनसे अपनी पूरी कक्षा को बुला लाने को कहा। थोड़ी देर में पूरी कक्षा पुस्तकालय में उपस्थित हो गई। कुछ बच्चों को बैठने के लिए भी जगह नहीं मिली। निर्णय लिया कि हाॅल में चला जाय।
सारे बच्चे हाॅल में उपस्थित हो गए। मैंने कार्यशाला के उद्देश्य को लेकर अपनी बात रखी। कोशिश की कि बच्चे उसे गंभीरता से लें। बच्चों का मन नहीं लग रहा था। मुझे बार-बार चुप कराने के लिए चिल्लाना पड़ रहा था। लेकिन मैंने कोशिश जारी रखी।
सर्वप्रथम समूहीकरण की गतिविधि प्रारम्भ की। मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि बच्चों के भीतर सामूहिकता का विकास किया जाना चाहिए। बच्चों में अकेले नहीं बल्कि समूह में आगे बढ़ने की भावना का विकास हो। इसी मूल्य को विकसित करने के उद्देश्य से पूरी कार्यशाला में हर गतिविधि समूह में करने का निर्णय लिया गया। समूह में काम करने का दूसरा लाभ यह भी है कि बच्चे तनाव मुक्त होने के कारण आसानी से और जल्दी सीखते हैं।सीखने में साथियों की मदद महत्वपूर्ण होती है। बच्चों को ‘प’वर्ण से प्रारम्भ होने वाले शब्द लिखने के लिए कहा गया। तीन मिनट का समय दिया गया। बच्चों ने बिना नकल किए शब्द लिखने प्रारम्भ किए। एक बालिका ने सबसे अधिक 33 शब्द लिखे। सबसे कम 8 शब्द लिखे गए।अंकों के आधार पर बच्चों को पहले सात समूहों में बाँटा गया उसके पश्चात सबसे कम शब्द लिखने वाले 7 बच्चों को समूह प्रमुख बनाया गया।जिन्हें शेष 6 समूहों में से अपने साथियों को चुनने को कहा गया। ऐसा इसलिए किया गया ताकि प्रत्येक समूह में तेज गति सेे ,धीमी गति से और औसत गति से सीखने वाले सभी तरह के बच्चे शामिल हो जाएं।यह भी कोशिश की गई की हर समूह केवल एक ही लिंग के न बन जाएं।
समूह बनने के बाद समूहों का नामकरण किया गया। इसके लिए भी एक गतिविधि करवायी गई-कहानी,कविता,व्यंग्य,संस्मरण,निबंध तथा उपन्यास की एक-एक किताब मेज पर रख दी गई । सभी समूह प्रमुखों को एक-एक किताब उठाने के लिए कहा गया। अपने समूह में जाकर उस पुस्तक की विधा की पहचान करने के कहा गया। तीन समूहों ने विधा की सही-सही पहचान कर ली। अन्य समूहों को पहचान करने में मदद की गई। इस तरह जिस समूह के पास जिस विधा की पुस्तक गई उसे वही नाम दिया गया।सातवें समूह को कोई किताब नहीं दी गई और इन विधाओं से इतर किसी भी विधा को अपने समूह के नाम के रूप में चुन लेने को कहा गया। सातवें समूह ने अपना नाम ‘आत्मकथा समूह’ रखा। इस गतिविधि का उद्देश्य यह था कि बच्चे साहित्य की विभिन्न विधाओं से परिचित हो सकें।यह गतिविधि पुस्तक के स्थान पर पाठ्यपुस्तक से एक-एक रचना देकर उसको पहचानने के लिए कहते हुए भी करवाई जा सकती है।
अगली गतिविधि के रूप में प्रत्येक समूह को एक सादा कागज दिया गया जिस पर उन्होंने सबसे ऊपर अपने समूह का नाम और उसके नीचे समूह के सभी सदस्यों का नाम लिखते हुए उसके आगे अपनी अभिरूचि और सपने(क्या बनना चाहते हो)लिखे। इससे पहले भी कक्षा-शिक्षण के दौरान मैं बच्चों से उनके सपनों के बारे में पूछता रहा हूँ। अधिकांश बच्चे फौजी बनने की बात कहते थे। कुछ पुलिस तो कुछ डाॅक्टर,इंजीनियर बनने की , लेकिन आज बच्चों के सपनों के बारे में जानकर मुझे बहुत खुशी हुई।आई.ए.एस.,आई.पी.एस. और सेना में उच्च अधिकारी के साथ-साथ बच्चों ने डांसर,लेखक,कलाकार आदि बनने के सपने दर्ज किए।इस तरह हर समूह ने अपना परिचय पत्र तैयार किया जो इस पूरी कार्यशाला के दौरान उन्हें अपने मेज पर रखना है। कुछ समूहों ने अपने परिचय-पत्र को आकर्षक बनाने की कोशिश भी की। सुंदर लेखों में लिखने के साथ-साथ उसके चारों ओर फूल-पत्तियां भी बनाई।
समूह बनाने और उनका नामकरण करने के पश्चात ‘दीवार पत्रिका की उपयोगिता’ पर सभी समूहों को आपसी विचार-विमर्श से कम से कम आठ बिंदु लिखने के लिए कहा गया जिसमें शर्त रखी गई कि प्रत्येक प्रतिभागी कम से कम एक बिंदु अवश्य बताए।
इसी दौरान प्रत्येक समूह को तीन-तीन बाल पत्रिकाएं वितरित की गई।गृह कार्य के रूप में हर समूह को कहानी,कविता,चुटकुले या पहेली में से किसी एक विधा पर रचना तैयार कर लाने को कहा गया जिसे कल समूहवार पूरे सदन के सामने प्रस्तुत करना होगा। प्रत्येक समूह ने दीवार पत्रिका की उपयोगिता के बारे में लिख लिया था जिन्हें जमा कर लिया गया। घर लौटकर मैंने डायरी लिखते हुए उनका अध्ययन भी किया। ‘व्यंग्य समूह’ ने लिखा है कि दीवार पत्रिका के माध्यम से प्रत्येक विद्यार्थी अपने मन के विचारों को लिखित रूप से व्यक्त कर सकता है। इससे उसका ज्ञान बढ़ता है और लेखन में भी निपुण होता है। इस समूह ने एक महत्वपूर्ण बात और लिखी है कि विद्यार्थी को वर्तमान समय में केवल किताबी कीड़ा ही नहीं बनना चाहिए बल्कि उसे अन्य जानकारियां भी रखनी चाहिए। ‘संस्मरण समूह’ का कहना है कि दीवार पत्रिका में दूसरों का लिखा देखकर हमारा भी लिखने का मन करता है। ‘निबंध समूह’ मानता है कि इसके माध्यम से हम अपनी लिखने और सोचने की शक्ति बढ़ा सकते हैं तथा अपनी कला को और संुदर बना सकते हैं। ‘कविता समूह’ और ‘कहानी समूह’ दोनों का कहना है कि दीवार पत्रिका में छात्रों द्वारा की गई रचनाओं को देखकर अन्य छात्रों का आत्मविश्वास बढ़ता है। ‘कविता समूह’ ने एक सुझाव भी दिया है कि यदि दीवार पत्रिका में अच्छी रचनाओं को पुरस्कृत भी किया जाय तो छात्र उसकी ओर अधिक आकर्षित होंगे।
आज कार्यशाला लगभग दो घंटे चली। कार्यशाला के अंत में साथी शिक्षक सुभाष चंद्र वर्मा भी हाॅल में आए उन्होंने स्वीकार किया कि बच्चों के लिए इस तरह की कार्यशाला की बहुत आवश्यकता है ताकि बच्चे अपनी मौलिक अभिव्यक्ति कर सकें। चलते-चलते ही हिमांशु बसेड़ा जो दीवार पत्रिका के संपादक भी हैं उनसे आज के दिवस की आख्या लिखने के लिए कहा। दिन की शुरुआत भले निराशाजनक रही लेकिन अंत अच्छा ही रहा। मन को संतोष पहुँचा कि चलो एक शुरुआत तो हो गई।
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22-04-14
कार्यशाला को लेकर बच्चों में कोई खास उत्साह नहीं देखा। बहुत कम बच्चे समय पर कार्यशाला स्थल पर पहुँचे। शायद इसका कारण यह हो कि उन बच्चों को भी कार्यशाला में बैठा दिया जिनकी पढ़ने-लिखने में कोई खास रूचि नहीं है। बाल पत्रिकाएं जिन्होंने कभी देखी तक नहीं। पहले चयनित बच्चों के साथ ही कार्यशाला करने का मन था लेकिन संख्या कम होने के चलते लगा सभी को शामिल कर लिया जाय। कुछ तो सीखेंगे। पता नहीं यह निर्णय कितन सही है यह कार्यशाला पूरी होने के बाद ही पता चल पाएगा। कार्यशाला को रोचक बनाना अपने आप में एक चुनौती है। आज कुछ बच्चे अनुपस्थित भी थे तो कुछ वे बच्चे आए जो कल उपस्थित नहीं हो पाए। इस तरह कल के बराबर लगभग चार दर्जन बच्चों ने आज भी प्रतिभाग किया। अनुपस्थित रहने वालों में दो समूहों के समूह प्रमुख भी थे। कुछ बच्चों को शायद जिम्मेदारी भी नहीं बांध पाती है।
अकेले इनते बच्चों के साथ कार्यशाला करना आसान नहीं है। मुझे लगा यदि प्रत्येक समूह या फिर दो समूहों के साथ भी एक और अध्यापक होते तो काम आसान भी होता और प्रभावशाली भी। बच्चों के साथ लगातार लगे रहना पड़ता है अन्यथा वे आपस में बातें करने लग जाते हैं। कभी -कभी झगड़ने भी। जब प्राथमिक विद्यालय में पाँच कक्षाओं को अकेले पढ़ाना होता था तब भी इसी मनोदशा से गुजरना होता था।एक समय में एक साथ एक से अधिक कक्षाओं को पढ़ाना बहुत चुनौती पूर्ण कार्य है। बहुकक्षा शिक्षण या बहुस्तरीय शिक्षण मुझे आज भी सैद्धांतिक अवधारणा ही लगती है, कम से कम परम्परागत स्कूल व्यवस्था में तो। खैर यहाँ विषयांतर हो रहा है।
आज कार्यशाला की शुरुआत पिछले दिन की आख्या के वाचन से हुई। जिस छात्र को आख्या लिखने के लिए कहा था वह आख्या घर पर ही भूल आया था इसलिए उसी समूह के अन्य साथी प्रेम प्रकाश पाण्डेय ने आख्या प्रस्तुत की। आख्या संक्षेप में ही थी। दूसरे समूह को दूसरे दिन की आख्या सौंपते हुए मैंने कुछ विस्तार से लिखने का सुझाव दिया। अच्छा यह लगा कि ‘निबंध समूह’ ने स्वेच्छा से यह काम ले लिया।
इसके पश्चात हर समूह को अपनी पसंद की किसी एक विधा की रचना प्रस्तुत करने के लिए कहा गया। तीन समूहों ने कविता ,तीन ने कहानी और एक समूह ने चुटकुले प्रस्तुत किए। प्रत्येक समूह की प्रस्तुति के बाद उन्हें कुछ आवश्यक सुझाव दिए गए ,जैसे किसी भी रचना को हाव-भाव से प्रस्तुत किया जाना चाहिए तथा रचना याद हो तो प्रस्तुति अधिक आकर्षक हो जाती है। साथ ही आत्मविश्वास भी बढ़ता है। ‘कहानी समूह’ और ‘निबंध समूह’ की प्रस्तुति इसी कारण आकर्षक रही क्योंकि उन्होंने जो कहानी प्रस्तुत की वह उन्हें कंठस्थ थी।
अगली गतिविधि से पहले प्रत्येक समूह को पाँच-पाँच बाल पत्रिकाएं दी गई। उन्हें इन पत्रिकाओं का गहन अवलोकन कर खोजना था कि इनमें कौन-कौन से स्थाई स्तम्भ और विधाएं हैं?पहले बच्चों के समझ में कुछ नहीं आया। मैंने प्रत्येक समूह में जाकर उनकी मदद की। किसी एक पत्रिका में छपी प्रत्येक सामग्री के बारे में पूछा कि वह किस विधा में है? बच्चों ने कुछ का नाम बता दिया। कुछ का नाम मैंने उन्हें बताया। ‘संपादकीय’ की पहचान केवल वही बच्चे कर पाए जो ‘दीवार पत्रिका’ के संपादक मंडल से जुड़े रहे हैं। अंततः सभी समूहों ने मिलकर विभिन्न पत्रिकाओं में से लगभग तीस से अधिक स्तम्भ खोज निकाले। जो इस प्रकार हैं-संपादकीय,पत्र,कहानी,कविता,लेख,निबंध,डायरी,लोककथा,लघुकथा,पहेली,चुटकुले,जानकारी,प्रश्नोत्तरी,माथापच्ची,बालकूची,रास्ताढूँढों,बिंदुसेबिंदुमिलाओ,रंगभरो,महत्वपूर्णतिथियां,अनमोलवचन,कार्टून,चित्रकथा,यात्रा वृत्तांत,गतिविधि(समाचार),बोधकथा,बड़ो का बचपन,खेल की दुनिया,शब्द चित्र,अंतर ढूँढो आदि।इस गतिविधि के पूरे होने-होने तक मैं भी थक गया और बच्चे भी। मैंने जल्दी-जल्दी बच्चों को गृह कार्य के रूप में उक्त स्तम्भों के लिए प्रत्येक समूह को एक-एक रचना खोज लाने को कहा जिसका कल प्रस्तुतीकरण किया जाएगा। आशंका है कल बच्चों की संख्या कम हो सकती है। वैसे मुझे सभी बच्चों से बेहतर कर पाने की उम्मीद नहीं है कुछ बच्चों में भी पढ़ने-लिखने की अभिरूचि पैदा हो पायी तो यह इस कार्यशाला की उपलब्धि होगी। आज कार्यशाला के दौरान कक्षा नौ में प्रवेश लेने वाले बच्चे और उनके अभिभावक भी आते रहे जिसके चलते कुछ व्यवधान भी पैदा होता रहा। आज भी कार्यशाला लगभग दो घंटे ही चल पायी।
घर लौटते हुए जीप में एक विचार आ रहा था कि इस सत्र में कक्षा-9 और 10 के बच्चों को सामाजिक विज्ञान के परियोजना कार्य के रूप में ‘दीवार पत्रिका’ निर्माण का कार्य दिया जाय। एक सप्ताह में एक बच्चे को एक अंक तैयार करने को कहा जा सकता है। इस पत्रिका में कोशिश की जाय कि जिस भी विधा की रचना सम्मलित की जाय उसका संबंध कहीं न कहीं सामाजिक विज्ञान विषय से हो। मुझे लगता है यह एक उपयोगी गतिविधि हो सकती है। देखिए,कैसे परिणाम रहते हैं।
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23-04-14
कार्यशाला का तीसरा दिन पिछले दो दिनों से बेहतर रहा। बच्चे खुश दिखे। लगा उन्हें कुछ आनंद आ रहा है। पर बीच-बीच मंे चुप कराने के लिए चिल्लाना पड़ा। पिछली दिन की आख्या से दिन की शुरूआत हुई। आख्या संक्षिप्त थी। मैंने विस्तार देने पर जोर दिया। साथ ही सभी प्रतिभागियों को सुझाव दिया कि अच्छा हो यदि सभी बच्चे घर जाकर रोज की आख्या लिखें। अच्छा लगा कल की आख्या लिखने के लिए दो समूहों ने हाथ खड़े किए। मैंने ‘कहानी समूह’ को यह दायित्व सौंपा।साथ ही प्रतिभागियों की इस बात के लिए प्रशंसा की कि वे स्वेच्छा से आगे आए। मैंने बच्चांे को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से कहा -ये अवसर हैं कुछ करने के । जीवन में सफलता के लिए अवसरों को पकड़ना जरूरी है। जीवन क्रिकेट है तो अवसर कैच हैं जिनको पकड़ने वाला सफल होता है और छोड़ने वाला असफल। ़इस तरह की कार्यशालाएं कुछ लिखने-बोलने का अवसर देती हैं जिनमें आगे आकर भाग लिया जाना चाहिए। बच्चों ने इस बात को बहुत ध्यान से सुना। मुझे अच्छा लगा।
इसके बाद ‘पहेली बूझो’गतिविधि करवायी गई। जिसके तहत कार्यशाला कक्ष के भीतर दिख रही किसी भी चीज पर उसका नाम लिए बिना पाँच-पाँच वाक्य लिखने के लिए कहा गया। ये पाँच वाक्य ऐसे होने चाहिए जो उस वस्तु की विशेषताओं को बताते हों। जिनको सुनकर कोई भी उस वस्तु का नाम बता दे। प्रत्येक समूह ने एक-एक वस्तु को लेकर पाँच वाक्य लिखे जिसके लिए दस मिनट का समय दिया गया। पहेली तैयार होनेे के बाद उसे पूरे सदन के सामने प्रस्तुत किया गया। एक वाक्य सुनकर उत्तर देने वाले को पाँच, दो वाक्यों पर चार ,तीन वाक्यों पर तीन,चार वाक्यों पर दो ,पाँच वाक्यों के बाद उत्तर देने वाले को एक अंक प्रदान किया गया। किसी के द्वारा उत्तर न देने पर पूरे पाँच अंक पूछने वाले समूह के खाते में जोड़े गए। बच्चों ने इस गतिविधि में बहुत उत्साह से भाग लिया। भले इसमें कारण जो भी रहे हों। बच्चे ऐसी गतिविधियों में अधिक रूचि लेते हैं जिनमें ‘हार-जीत’ शामिल होती है। बच्चे हमेशा जीतना चाहते हैं। उन्हें चुनौती पसंद होती है।
कल घर से हर प्रतिभागी को अपनी पसंद की एक-एक रचना चुन कर लाने को कहा गया था । लगभग प्रत्येक बच्चा रचना लेकर आया था। पहले चरण में प्रत्येक समूह से एक-एक रचना प्रस्तुत करने के लिए बुलाया गया। तीन समूहों ने कहानी ,दो ने कविता,एक ने सामान्य ज्ञान के तथ्य और एक ने चुटकुले प्रस्तुत किए। चुटकुलों को छोड़कर अन्य रचनाओं को चयन अच्छा था। कहानियों का चयन और प्रस्तुतीकरण दोनों बेहतरीन कहा जा सकता है। कहानी कंठस्थ होने केे कारण ऐसा रहा हो। सुनाई गई तीनों कहानियां लोककथाएं थी। इससे पता चलता है कि लोककथा का शिल्प शायद बच्चों को अधिक सहज-सरल प्रतीत होता है।कथ्य की दृष्टि से भी इन कहानियों का चयन बहुत अच्छा था। ‘संस्मरण समूह’ के जीवन सिंह विष्ट की लोककथा अंधविश्वास पर करारी चोट करने वाली थी।
अगली गतिविधि के रूप में प्रत्येक बच्चे को अपने द्वारा चुनी गई रचना पर लिखने के लिए कहा गया। रचना कहाँ से चुनी गई और क्यों चुनी गई ? इस पर सभी बच्चों ने अपनी राय लिखी। इस गतिविधि को करते हुए थोड़ी देर के लिए कक्ष में सन्नाटा छा गया। इसी गतिविधि के साथ आज के दिवस का समापन हुआ। इसी बीच बच्चोें को यह भी सूचना दी गई कि इस वर्ष सामजिक विज्ञान के परियोजना कार्य के रूप में प्रत्येक बच्चे को दीवार पत्रिका के एक-एक अंक का संपादन करना होगा। एक सप्ताह में एक अंक तैयार किया जाएगा। इस पत्रिका में अधिकाधिक सामग्री सामाजिक विज्ञान से संबंधित होगी। आज के दिवस के समापन होते-होते मध्य प्रदेश से कवि मित्र मोहन नागर का फोन आया। उन्होंने कार्यशाला के बारे में फेसबुक से जाना। आयोजन पर खुशी व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि बच्चों में रचनात्मकता के विकास में इस तरह के कार्यशालाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसी अधिक से अधिक कार्यशालाएं आयोजित की जानी चाहिए। आज सुबह फेसबुक पर मैंने बच्चों में बिंबों और रूपकों की समझ विकसित करने के उद्देश्य से कौनसी गतिविधि विकसित की जानी चाहिए? इस आशय की पोस्ट लगाई जिस पर कमेंट करते हुए उन्होंने अपनी एक कविता भी भेजी है। जो इस प्रकार है-
ऐसे नहीं बेटा-
धीरे-धीरे पंख फैलाओ
खुद को भारमुक्त करो
अब पांव सिकोड़ो .....
थोड़े और ....शाबाश!
अब कूद जाओ
डरो नहीं....मैं हूँ ना
गिरे तो थाम लूंगी....
-चिड़िया अपने बच्चों को उड़ना सिखा रही है!
ऐसा करते समय खुश है-
कि उसका बेटा भी
एक दिन दूर
बहुत दूर तक उड़ पाएगा.....
और दुखी यह सोचकर -
कि पंख ऊग जाने पर यही बेटा
एक दिन उसे छोड़कर
दूर.....बहुत दूर उड़ जाएगा।
इस पर देखना है कल बच्चों की क्या प्रतिक्रिया होती है।
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24-04-2014
आज बच्चांे के मूड को देखकर लगा उन्हें कार्यशाला में आनंद आया। गतिविधियां दो ही हो पाई पर बच्चों ने उसमें पूरी रूचि दिखाई। पहली गतिविधि थी-कहानी बनाओ। मैंने एक वाक्य बोला -एक समय की बात है। जिस पर आगे हर समूह एक-एक वाक्य जोड़ता गया।साथ ही अपनी कापी में लिखता भी रहा।दो चरण तक कहानी विधिवत आगे बढ़ती रही। बच्चों ने बहुत रोचक वाक्य जोड़े।तीसरे चरण में जोड़े गए वाक्य पर समूहों के बीच मतभेद पैदा हो गया। कुछ समूहों को लगा इनकी जगह अन्य वाक्य जोड़े जाते तो कहानी और बेहतर बन सकती थी।मैं मन ही मन खुश हुआ।यह टकराव इस बात का प्रतीक था कि बच्चे चिंतन-मनन कर रहे हैं। उनकी कल्पना हिलोरे मारने लगी है।सृजन की शुरुआत इसी बिंदु से तो होती है।मैंने जरूरत के अनुसार गतिविधि में परिवर्तन करते हुए प्रत्येक समूह को अपनी-अपनी तरह से कहानी आगे बढ़ाने को कहा। बच्चे पूरे मनोयोग से कहानी को आगे बढ़ाने लगे।
इस गतिविधि के दौरान बीच-बीच में वाक्य निर्माण और कहानी के तत्वों पर बात होती रही। जैसे-कहानी में छोटे-छोटे वाक्य होने चाहिए।एक शब्द के बार-बार उपयोग से बचना चाहिए। कहानी सीधी सपाट लाइन में न चलती जाए ,उसमें उतार-चढ़ाव आने चाहिए। इससे रोचकता बनी रहती है। किसी भी नए वाक्य की शुरुआत ‘और’ से नहीं की जानी चाहिए।आवश्यकता से अधिक शब्दों का प्रयोग नहीं होना चाहिए। किसी भी रचना में कल्पनाशीलता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है पर कल्पना कोरी या कपोलकल्पित नहीं होनी चाहिए उसका संबंध यथार्थ से होना चाहिए। समान ध्वनि के वर्णों के बीच बारीक अंतरों को भी बच्चों को बताया गया जैसे-ढ़ और ड़।
इसी दौरान कक्षा नौ के बच्चे भी आ गए। उन्हें भी इस गतिविधि से जोड़ा गया। कहानी आगे बढ़ाने को कहा गया।
अगली गतिविधि थी-बिंब रचो।बच्चों ने इसमें बहुत रूचि ली। सामने कक्षा नौ के कुछ बच्चे खड़े किए गए। प्रत्येक समूह से कहा गया कि उनमें से किसी एक बच्चे के रूप-रंग तथा हाव-भाव पर पाँच वाक्य लिखिए जिससे बिना नाम लिए या संकेत किए पता चल जाय कि वह बिंब किस बच्चे का है?वाक्य तैयार करने के बाद क्रमशः हर समूह ने अपने वाक्य सामने आकर प्रस्तुत किए, जिसके उत्तर वहाँ बैठे कक्षा नौ के बच्चों ने दिए। जिस समूह के वाक्यों को सुनकर बच्चे की सही पहचान बता दी गई ,उन्हें पाँच अंक प्रदान किए गए। जिस समूह के बिंब को बच्चे सही-सही नहीं पकड़ पाए उन्हें शून्य अंक मिला।केवल दो समूहों के बिंबों की पहचान सही तरह से नहीं हो पायी। इस गतिविधि को करते हुए मुझे एक गलती का अहसास भी हुआ। जिन बच्चों को सामने खड़ा किया गया था अपने बारे में सुनते हुए वे कुछ असहज हो रहे थे।शायद उन्हें बुरा लग रहा
गृह कार्य के रूप में भी आज एक बिंब रचने के लिए ही दिया गया, जिसका कल सदन में प्रस्तुतीकरण किया जाएगा।कल पहले सभी बच्चे अपने द्वारा रचे बिंब को अपने समूह में सुनाएंगे।समूह में जो बिंब सबसे अधिक पसंद आएगा उसे पूरे सदन के सामने रखा जाएगा।
गत दिनों की तरह ही आज भी दिवस की शुरुआत आख्या प्रस्तुतीकरण से हुई। आख्या बहुत विस्तार से लिखी गई थी। पिछले दो दिनों की अपेक्षा आज की आख्या बहुत बेहतर बन पड़ी थी। इससे पता चलता है कि बच्चों के समझ में धीरे-धीरे आ रहा है कि आख्या कैसे लिखी जानी चाहिए।इस आख्या को तैयार करने से पहले मैंने इस समूह को बाल पत्रिका ‘अनुराग’के एक अंक में प्रकाशित बाल रचनात्मक शिविर की रिपोर्ट पढ़ने का सुझाव दिया।मुझे हमेशा से लगता आया है कि बच्चों को किसी रचना को तैयार करने के बारे में सैद्धांतिक रूप से बताने की अपेक्षा यदि उस विधा से संबंधित कोई अच्छी रचना पढ़ने को दी जाय तो बच्चे अधिक जल्दी समझते हैं। आज की आख्या के बारे में बोलते हुए बच्चों को यह भी बताया कि जिस तरह से आख्या लिखी जाती है लगभग उसी तरह से समाचार भी लिखे जाते हैं। बस उसमें इस बात का ध्यान रखने की आवश्यकता होती है कि ‘मैं’ या ‘हम’ जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं करना है। तटस्थ होकर लिखना है। एक अच्छे समाचार की विशेषता होती है कि वह क्यों,कहाँ,कैसे,कब,क्या,कौन? इन छः ककार का उत्तर देता है। आख्या से भी इनके उत्तर मिलने चाहिए। बच्चे मेरी बात को बड़े ध्यान से सुनते रहे।
घर लौटते हुए प्रधानाचार्य श्री ए0के0 श्रीवास्तव ने कार्यशाला की प्रशंसा करते हुए कहा कि बच्चे के बहुमुखी विकास के लिए गणित या साइंस जैसे विषयों को पढ़कर ही नहीं चलेगा। बच्चों का बाल पत्रिकाओं और साहित्य से भी जुड़ना जरूरी है। रोज एक से रूटीन वर्क से बच्चे ऊब जाते हैं इसलिए कभी-कभी विद्यालय में कुछ हटकर भी होना चाहिए जिससे बच्चों में रचनात्मकता पैदा हो। इस तरह की गतिविधियां मोनोटोनस वातावरण को तोड़ कर बच्चों में ताजगी पैदा करती हैं।बच्चों मंे पढ़ने-लिखने के प्रति लगन पैदा करती हैं।किसी भी संस्थाध्यक्ष की इस तरह की प्रतिक्रिया संस्था में काम करने वालों के मन में एक नया उत्साह पैदा कर देती हैं। मेरा मानना है कि संस्थाध्यक्ष भले खुद बहुत कुछ न कर पाए यदि काम करने वालों की पीठ थपथपाता रहे और उन पर विश्वास करे तो इतने से ही विद्यालय का वातावरण बदलने लगता है।
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25-04-14
पहला वादन खाली होने के कारण आज पिछले दिनों की अपेक्षा कुछ समय पहले कार्यशाला प्रारम्भ हो गई।बच्चों ने अपने-अपने रचे बिंब समूह में सुनाए और एक बिंब का चयन किया जिसे बाद में पूरे सदन के सामने प्रस्तुत किया गया जिनमें से अधिकांश बिंबों की पहचान वहाँ उपस्थित बच्चों ने कर ली लेकिन कुछ बिंब, बिंब की अपेक्षा पहेली के नजदीक चले गए थे। पहेली मूर्त को अधिक अमूर्त कर देती है जबकि बिंब अमूर्त को अधिक मूर्त बनाते हैं।
इससे पहले आख्या प्रस्तुत की गई जिसे आज और अधिक विस्तार दिया गया था।छोटे-छोटे विवरणों को भी आख्या में प्रस्तुत करने की सफल कोशिश की गई थी। जब आख्या प्रस्तुत की जा रही थी अचानक सूझा कि क्यों न इसको भी एक गतिविधि से जोड़ लिया जाय। इसके तहत बच्चों से कहा कि सभी बच्चे आख्या को ध्यान से सुनते हुए इस बात को नोट करेंगे कि इसमें कल की कार्यवाही में से कौनसी बात छूट गई है? यह भी तय किया गया कि जो समूह इस आख्या में जितने वाक्य जोड़ेगा उसे उतने अंक प्रदान किए जाएंगे। ‘उपन्यास समूह’ को छोड़कर सभी समूहों ने कुछ न कुछ जोड़ा। ‘व्यंग्य समूह’ ने तो एक पूरा अनुच्छेद जोड़ दिया। कल वाक्य संरचना और कहानी के बारे में जो बातें कही गई थी उन्होंने लगभग सभी बातें जोड़ दी।यह जानकर अच्छा लगा कि बच्चे छोटी-छोटी बातों को भी ध्यान में रख रहे हैं।
आज ‘कविता बनाने’ की गतिविधि भी करवाई गई जिसमें प्रत्येक समूह को एक पंक्ति दी गई जिसे आगे बढ़ाते हुए कविता बनाने के लिए कहा गया।कविता के विषय बच्चों के आसपास के अनुभवों से जुड़े थे। जैसे- बोटल ब्रश , हमारा स्कूल, कैंटीन, पुस्तकालय,घंटी। कहानी समूह को कोई विषय न देकर अपने पसंद के किसी भी विषय पर कविता बनाने को कहा गया। बोटल ब्रुश पर कविता लिखने के लिए संबंधित समूह को बोटल ब्रुश के पेड़ के नीचे बैठकर कविता बनाने को कहा।इन दिनों हमारे विद्यालय में बोटल ब्रुश खिला हुआ है पूरे पेड़ लाल-लाल फूलों से लदे-फदे हुए हैं। बच्चों ने अपने-अपने समूह में कविताएं पूरी की लेकिन समय के अभाव के चलते पाठ नहीं हो पाया। कल इनका पाठ कराया जाएगा। आज बच्चों को घर से भी एक-एक कविता बना लाने को कहा गया है। साथ ही दीवार पत्रिका के लिए सामग्री एकत्र करते रहने का सुझाव दिया गया। ताकि सोमवार को सभी समूह अपनी-अपनी एक दीवार पत्रिका तैयार कर सकें।
कविता मंे बिंबों और रूपकों का बहुत महत्व होता है। रूपक बिंब को और अधिक प्रभावकारी और जीवंत बना देते हैं।रूपकों की समझ विकसित करने के उद्देश्य से एक गतिविधि करायी गई-रूपक गढ़ो। इसके अतंर्गत बच्चों को अधूरे वाक्यों को पूरा करने के लिए कहा गया जैसे-घंटी ऐसे बोली जैसे...........। पेड़ ऐसा लग रहा है जैसे........। हवा चल रही है जैसे.....। उसका हंसना जैसे......। जंगल ऐसा लग रहा है जैसे .........। बच्चों ने अपनी कल्पना से बहुत जीवंत वाक्य बनाए।मैं उन्हें पढ़कर गदगद हो उठा।मैंने इतनी ताजगी की अपेक्षा नहीं की थी। एक बच्चे ने लिखा -जंगल ऐसा लग रहा है जैसे हरियाली का सागर हो। एक अन्य ने-जंगल ऐसा लग रहा है जैसे गहरी लंबी गुफा। पेड़ ऐसा लग रहा हो जैस हवा से बोल रहा हो। आदि। वास्तव में हम बच्चों को उनकी क्षमता से कम आंकते हैं जो गलत है।
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27-4-20014
कल का दिन इस रूप में महत्वपूर्ण रहा कि एक भूतपूर्व छात्र कामेश कुमार कार्यशाला में उपस्थित रहे। सारी गतिविधियों को गौर से देखते रहे। अपनी डायरी से कुछ सामान्य ज्ञान के तथ्य बच्चों को नोट भी कराए। ‘कल्पना की उड़ान भरो’ गतिविधि में शामिल होते हुए उन्होंने भी एक कविता बनायी। इस गतिविधि के अंतर्गत बच्चों के सामने पाँच काल्पनिक स्थिति रखी जिस पर बच्चों को विस्तार से अपने विचार रखने थे।उनको छूट थी कि चाहें तो पाँचों स्थितियों में लिखें या किसी एक स्थिति पर। यह गतिविधि प्रत्येक प्रतिभागी को व्यक्तिगत रूप से करनी थी। कुछ बच्चों को छोड़कर अधिकांश बच्चों ने पाँचों स्थितियों पर अपने कल्पना की उड़ान भरते हुए लिखा। एक-दो बच्चों ने अपनी कल्पना को कविता के रूप में व्यक्त किया। पाँच स्थितियां इस प्रकार थी- पेड़ हवा से क्या बातें करते होंगे? घंटी हथौड़े से क्यों नाराज होती होगी?फूल चिड़िया को देखकर क्या सोचता होगा?नदी को दौड़ते हुए देखकर पत्थर क्या कहते होंगे?बकरी को कसाई कैसा लगता होगा?इन पर कुछ रोचक कल्पनाएं पढ़ने को मिली। कुछ उदाहरण देखिए-पंकज सिंह महर ने लिखा-
1-पेड़ हवा से बातें करते होंगे कि इस हवा को कोई काम नहीं होगा। ये तो दिन भर आवारों की तरह अपनी धुन में इधर-उधर घूमती रहती है। प्यारे-प्यारे हरे-हरे पत्ते गिरा देती है।
2-घंटी हथौड़े से क्यों नाराज होती होगी क्योंकि घंटी सोचती होगी कि यह हथौड़ा मुझे बिना कसूर के रोज-रोज मारता रहता है और मुझे रो-रो कर चिल्लाने पर मजबूर करता है।
3-फूल चिड़िया को देखकर सोचती होगी कि मेरा रस ले जाएगा, भरा कटोरा मेरा खाली कर जाएगा।
4-नदी को दौड़ते हुए पत्थर कहते होंगे काश! हमारे भी हाथ-पैर होते हम भी इधर-उधर जाते।
5-बकरी को कसाई ऐसा लगता होगा जैसे हाथ में तलवार लेकर यमदूत खड़ा हो। काट दे मुझे कमा ले पैसा।
इससे पूर्व कार्यशाला का प्रारम्भ रोज की तरह आख्या से हुआ। काफी विस्तृत और बारीक विवरण। सभी ने उसकी सराहना की।मुझे भी बहुत अच्छा लगा कि बच्चे छोटी-छोटी बातों को भी पकड़ रहे हैं। पहले मुझे डर था कि मेरी बातें कहीं बच्चों के लिए अधिक भारी तो नहीं हो रही हैं लेकिन बच्चे समझ रहे हैं। कल कार्यशाला पिछले दिनों से कुछ विलंब से प्रारम्भ हुई।
कल संक्षेप में बच्चों को साक्षात्कार के बारे में बताते हुए अपने आसपास रहने वाले किसी ऐसे व्यक्ति का साक्षात्कार लेने के लिए कहा जो अपने किसी काम के लिए विशेषरूप से जाना जाता है। साथ ही दीवार पत्रिका के लिए रचनाएं तैयार करते रहने के लिए कहा ताकि अगले दिन दीवार पत्रिका का निर्माण किया जा सके। आज रविवार होने और कल चुनाव प्रशिक्षण में ड्यूटी होने के कारण कार्यशाला नहीं चल पाएगी। अवकाश के चलते बच्चों का रचना तैयार करने के लिए अधिक समय मिल पाएगा।
कल एक बात और हुई भले ही उसका संबंध इस कार्यशाला से नहीं है लेकिन बच्चों की रचनात्मकता से जुड़ी है इसलिए यहाँ उल्लेख करना प्रासंगिक लग रहा है। कक्षा बारह के विद्यार्थियों की राजनीति विज्ञान की कक्षा ली। इन दिनों देश में लोकसभा के लिए आम चुनाव चल रहे हैं। मुझे लगा भारत के राजनैतिक दलों और चुनाव प्रणाली के बारे में जानने-समझने का इससे अच्छा मौका क्या हो सकता है। इस विषय पर एक प्रोजेक्ट कार्य दिया जिसके तहत निम्न प्रश्नों के उत्तर खोजने को कहा गया-
1-वर्तमान में देश में किस स्तर की सरकार के गठन के लिए चुनाव चल रहे हैं?
2-इस चुनाव में कौन-कौन से राजनीतिक दल भाग ले रहे हैं ?उनके चुनाव चिह्न और अध्यक्षों के नाम पता कीजिए।
3-इन राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के रूप मंे वर्गीकृत कीजिए।
4-क्षेत्रीय दलों में कौनसा दल किस राज्य में सक्रिय है?
5-आपके संसदीय क्षेत्र में किस-किस राजनीतिक दल ने अपने उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे हैं?उनके नाम भी लिखो।
6-सभी राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणा पत्र एकत्र करो और उनका अध्ययन करते हुए ज्ञात करो कि उनमें क्या-क्या अंतर हैं?
7-देश में चुनाव संपन्न कराने का कार्य किसकी देखरेख में होता है? उससे जुड़े प्रमुख पदाधिकारियों का नाम पता कीजिए।
8-आपके क्षेत्र में आने वाली चुनाव टीम के बारे में पता कीजिएगा कि उसमें कितने सदस्य हैं और उनके पद नाम क्या हैं?
9-देश में कौन-कौन से मुख्य गठबंधन हैं और उनमें कौन-कौन से राजनीतिक दल शामिल हैं?
10-सरकार बनाने को किसी दल को कम से कम कितनी सीटों की आवश्यकता होती है? पता कीजिए इन चुनावों में किस राजनीतिक दल को कितनी सीटें प्राप्त हुई?
मेरा मानना है कि यदि बच्चे इस प्रोजेक्ट पर काम करते हैं तो उन्हें भारतीय राजनीति से संबंधित राजनीति विज्ञान की विषयवस्तु को समझने में आसानी होगी। गतवर्ष पाया कि कक्षा 12 के अधिकांश बच्चों को यह भी पता नहीं कि सरकार कैसे बनती है और वर्तमान में उनके देश में किस गंठबंधन की सरकार है? मेरा मानना है यदि बच्चे उक्त प्रोजेक्ट को ध्यान से करते हैं तो आने वाले साल में ऐसी स्थिति नहीं रहेगी। यह एक शिक्षक के रूप में मेरे लिए अध्ययन का विषय भी होगा। देखिए क्या परिणाम होते हैं।
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29-04-2014
आज तो आख्या ने पिछले दिनों के सारे रिकार्ड तोड़ दिए। इतनी लंबी आख्या कि पढ़ते हुए स्वंय लिखने वाले का मुँह सूख गया। छोटी सी छोटी बात को भी उसका हिस्सा बनाया गया था। पर गजब तो तब हुआ जब बच्चों से मैंने पूछा कि इसमें क्या छूट गया है? तो उन्होंने बहुत सारी बातें और जोड़ दी। इससे पता चलता है कि बच्चों का अवलोकन कितना गहरा होता है। यदि विषय पर उनकी रुचि हो तो वह छोटी से छोटी बात भी भूलते नहीं। लिखने में दो दिन भी लगा सकते हैं। जब मैंने ‘संस्मरण’ समूह के छात्र जीवन सिंह बिष्ट से पूछा कि उन्हें इसको लिखने में कितना समय लगा तो उन्होंने बताया कि दो दिन। लगता है छुट्टी वाले पिछले दो दिन वह इसी में लगे रहे।इतनी तन्मयता के पीछे कौनसी प्रेरणा रही यह अध्ययन का विषय है। वैसे मैंने पाया कि जीवन इस कार्यशाला में काफी सक्रिय रहे। वह बिना कहे भी रोज आख्या लिखकर ला रहे थे। अपने समूह में हर गतिविधि में सबसे अधिक भूमिका निभा रहे थे।
बहरहाल इससे पहले बच्चों को दीवार पत्रिका बनाने के लिए आवश्यक सुझाव दिए गए। पिछले दो दिनों में तैयार की गई रचनाओं में से अपने-अपने समूह में बैठकर चयन करने के लिए कहा गया जिसमें इस बात का ध्यान रखा जाय कि अधिक से अधिक विधाएं सम्मलित हों तथा अधिक से अधिक स्तम्भ बनाए जाय। रचनाएं स्वरचित हों।रोचकता का विशेष ध्यान रखा जाय। सुंदर व पठनीय लेख में लिखी हुई हों। वर्तनी की शु़द्धता पर ध्यान दिया जाय। विषयवस्तु के अनुकूल चित्र हों।पत्रिका को आकर्षक बनाने के लिए विविध चित्रों का उपयोग किया जाय।आदि-आदि।
सभी समूहों को चार्ट ,गोंद और लेखन सामग्री उपलब्ध कराई गई। अपनी-अपनी दीवार पत्रिका का शीर्षक तय करने के लिए कहा गया। कुछ समूहों ने एक से ही नाम रख लिए जैसे-‘उड़ान’ नाम तीन समूहों ने रख लिया मेरे हस्तक्षेप के बाद फिर परिवर्तन किया। सभी पूरी कलात्मकता से एक चार्ट पट्टी पर शीर्षक लिखने लगे। शीर्षक लिखने के लिए एक अलग से चार्ट की पट्टी का उपयोग किया गया जो मुख्य चार्ट से अलग रंग का था। थोड़ी देर बाद चिपकाने का काम भी प्रारम्भ हो गया। सभी बच्चे अपने-अपने कामों में लग गये। लेकिन आपस में बातचीत भी होती रही। जिससे हाॅल में काफी शोर हो रहा था। जहाँ लगभग 80-90 बच्चे बैठे हों मौन की कल्पना भी कैसे की जा सकती है। कक्षा नौ के बच्चों को कार्यशाला के बारे में अपने विचार लिखने के लिए कहा गया। लेकिन शोर थम नहीं रहा था। दीवार पत्रिका तैयार कर रहे समूह कभी गोंद,कभी चार्ट ,कभी कैंची मांगने के लिए इधर-उधर जा रहे थे। ऐसे में शोर का होना स्वाभाविक था। मुझे बार-बार चुप कराने के लिए चिल्लाना पड़ रहा था। मुझे लगा कक्षा नौ को कुछ ऐसा काम दिया जाय जिसे वे बाहर प्रांगण में जाकर करें। उसी समय एक गतिविधि तैयार की-अपने स्कूल को जानो। इसके अंतर्गत सात समूह बनाए प्रत्येक समूह में आठ-आठ बच्चे शामिल किए गए जिन्हें निम्न बिंदुओं पर सर्वे करने को कहा गया-
1- अपने विद्यालय में नियुक्त शिक्षकों के नाम और उनके द्वारा पढ़ाए जाने वाले विषयों की सूची तैयार कीजिए।
2-विद्यालय भवन और परिसर में कुल कितने कमरे हैं ?उनकी संख्या और उपयोग का पता कीजिए।
3-विद्यालय परिसर में पाए जाने वाले वृक्षों के नाम और उनकी संख्या पता कीजिए और उसकी तालिका तैयार कीजिए।
4-विद्यालय में उपलब्ध सुविधाओं की सूची तैयार कीजिए।
5- आपके विद्यालय में किस-किस गाँव से बच्चे पढ़ने आते हैं?सूची तैयार कीजिए।
6-इस विद्यालय में हाईस्कूल और इंटमिडियेट में विशेष स्थान प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों का नाम और गाँव पता कीजिए।
7-विद्यालय परिसर की सीमा में किस दिशा में कौनसे गाँव या अन्य स्थान स्थित हैं ?पता कीजिए।
इस गतिविधि के लिए बच्चे हाॅल से बाहर गए तो हाॅल में काफी शांति हो गई। कक्षा दस के बच्चे अपने काम में लगे रहे। आज तीन घंटे कब गुजर गए पता ही नहीं चला। अभी दीवार पत्रिका में रचनाएं चिपकाने का काम पूरा नहीं हुआ है कल जारी रहेगा। उसके पश्चात बच्चे प्रत्येक दीवार पत्रिका की समीक्षा करेंगे। अलग-अलग बिंदुवार समीक्षा का कार्य दो-दो के समूह में सौंपा जाएगा।इस तरह बच्चों के द्वारा ही सर्वश्रेष्ठ पत्रिका का निर्धारण किया जाएगा।
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01-05-2014
कल अन्य दिनों की अपेक्षा कार्यशाला कम समय तक चल पाई। पूरा समय बच्चे अपनी-अपनी दीवार पत्रिका को अंतिम रूप देने में लग रहे। छुट्टी की घंटी बज गई थी लेकिन अब भी कुछ समूह अपने काम में तल्लीन थे।सभी इस कोशिश में लगे थे कि उनकी पत्रिका सबसे बेहतरीन हो।
जब तक कक्षा दस वाले अपना गणित का वादन पढ़ कर आते कक्षा नौ के विद्यार्थियों से पिछले दिन दिए गए कार्य को अंतिम रूप देकर जमा करने को कहा। फिर एक और प्रोजेक्ट पर काम करने को प्रश्न लिखाए। प्रत्येक बच्चे को विद्यालय में गत वर्ष तक पढ़ रहे पाँच बच्चों से बातचीत करने के लिए कहा गया। प्रश्नावली इस प्रकार थी-
सर्वे करने के बाद समूहवार उसका सार-संक्षेप तैयार किया।पर इस दौरान अफरा-तफरी बन रही। कक्षा नौ के बच्चे बाहर-भीतर ही करते रहे। कुछ ने काम जल्दी कर लिया तो कुछ अभी कर ही रहे थे।जल्दबाजी के चलते सार के लिए कोई निश्चित प्रारूप तैयार नहीं हो पाया।
उपन्यास समूह द्वारा प्रस्तुत आख्या में वर्तनी और वाक्य विन्यास की बहुत सारी गलतियां थी।अनावश्यक विवरण भी आए थे। कल को की जाने वाली समीक्षा के लिए हर समूह से दो-दो बच्चों के नाम मांगे गए। इसको लेकर बच्चांे में कुछ हिचक थी क्योंकि उन्होंने समीक्षा शब्द पहली बार सुना था। कुछ बच्चे इससे बचना चाह रहे थे। समापन के समारोह में क्या-क्या होगा इसको लेकर भी कुछ बच्चों से बात हुई। मोटी-मोटी योजना बना ली गई है।यह तय किया गया है कि प्रत्येक समूह अपनी-अपनी दीवार पत्रिका में से कम से कम एक-एक रचना समापन के अवसर पर प्रस्तुत करेगा।साथ ही समापन समारोह की रिपोर्टिंग करने की जिम्मेदारी कुछ बच्चों को सौंपी गई। रिपोर्टिंग कैसे करनी है? उन्हें इस बारे में आवश्यक सुझाव दिए गए। प्रत्येक समूह से सबसे अधिक सक्रिय एक बच्चे को इस कार्य के लिए चुना गया है।मेरा विचार है कि इन बच्चांे द्वारा तैयार सबसे अच्छी रिपोर्ट को समाचार पत्रों में प्रकाशनार्थ भेजा जाएगा।
आज समीक्षा करने के साथ-साथ बच्चों के सहयोग से आमंत्रण पत्र तैयार किए जाएंगे।कक्षा नौ के बच्चों से क्या करवाया जाएगा अभी कुछ तय नहीं किया है।
6 बजे सायं
दो-दो बच्चों के समूह में समीक्षा का काम शुरू किया गया। सात समूह बनाए गए। प्रत्येक समूह को अलग बिंदु पर यह काम दिया गया जो इस प्रकार था-रचना की मौलिकता, स्तभ्मांे की संख्या,चित्र और विषयवस्तु के बीच संबंध, शीर्षक की नवीनता और संक्षिप्तता, रचनाकारों की संख्या, बच्चों के लिए करने के अवसर, सुलेख व वर्तनी की शुद्धता ,रोचकता आदि। इन बिंदुओं के आधार पर प्रत्येक दीवार पत्रिका की ग्रेडिंग की गई। जिस समय कुछ बच्चे समीक्षा का काम कर रहे थे उसी समय अन्य बच्चों को निम्न बातों का ध्यान रखते हुए कार्यशाला पर अपने अनुभव लिखने के लिए कहा गया-1-कार्यशाला कब से कब तक आयोजित की गई?2-कार्यशाला के दौरान क्या-क्या हुआ?3-कार्यशाला का आयोजन क्यों किया गया?4-आपको सबसे अच्छा क्या लगा?5-क्या पसंद नहीं आया?6-क्या भविष्य में भी इस तरह की कार्यशाल में प्रतिभाग करना चाहोगे और क्यों?7-कार्यशाला के दौरान आपको क्या परेशानी हुई?8-कार्यशाला को लेकर आपके सुझाव क्या हैं?9-कार्यशाला को लेकर आपके मित्रों की क्या प्रतिक्रिया रही?10-क्या इस कार्यशाला के बारे में आपके घर वालों को भी पता है?यदि हाँ तो उनकी क्या प्रतिक्रिया है?
जो बच्चे समीक्षा का कार्य कर रहे थे उन्हें यह कार्य घर से कर लाने को कहा गया। इसके बाद कल के लिए प्रत्येक समूह से एक-एक बच्चे को रिपोर्टिंग का कार्य सौंपा गया। उन बच्चों के नाम और रचनाएं भी प्रत्येक समूह से मांग ली गई हैं जो कल अपनी रचना का पाठ करेंगे। कुछ समूहों से एक से अधिक बच्चों के नाम भी आए हैं। अधिकांश समूहों से कहानी पाठ के लिए नाम आए हैं। घर जाने से पहले प्रत्येक बच्चे से कल के आयोजन को लेकर आमंत्रण पत्र लिखने के लिए कहा गया। अवलोकन करने के बाद पाया गया कि प्रत्येक में आंशिक संसोधन की आवश्यकता है। फिर सभी प्रतिभागियों को आमंत्रण पत्र लिखाया गया और जिन बच्चों के सुलेख हैं उनसे घर से आमंत्रण पत्र बनाकर लाने को कहा गया। कल जिन्हें शिक्षकों को वितरित किया जाएगा। कल के कार्यक्रम को लेकर मन में काफी उत्साह है। आज एक अभिभावक अपने किसी कार्य से विद्यालय आए थे उन्होंने भी बच्चों द्वारा तैयार दीवार पत्रिकाओं को सरसरी नजर से देखा और इस प्रयास पर प्रसन्नता व्यक्त की।
इस कार्यशाला के अंतिम दिन प्रतिभागी बच्चों से कार्यशाला के बारे में अपने अनुभव लिखने के लिए कहा गया। सभी बच्चों ने अपने अनुभव लिखे। कुछ बच्चों ने अपने अनुभवों को विस्तार से व्यक्त किया, जिनसे हमें बच्चों की सोच के बारे में बहुत कुछ पता चलता है।साथ ही यह भी समझ में आता है कि बच्चे इस तरह की गतिविधियों को किस तरह से लेते हैं और क्या प्रभाव ग्रहण करते हैं।अगली पोस्ट में आप बच्चों के अनुभव पढेंगे .
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