रा0इ0का0 देवलथल में कक्षा दस में अध्ययनरत छात्रा रंजना सामंत का अनुभव
हमारी लेखन कौशल विकास कार्यशाला 21 अप्रैल से 2 मई तक चली। हमारी कार्यशाला में सात ग्रुप बनाए गए थे जिसमें हम प्रतिदिन नई-नई गतिविधियाँ करते थे।जैसे-कविता बनाओ गतिविधि,कहानी निर्माण गतिविधि,वाक्य अन्त्याक्षरी, बिंब चित्र,उड़ान भरो गतिविधि आदि। प्रतिदिन अख्या भी सुनाई जाती थी। कार्यशाला के अंतिम दिनों में सभी ने समूहवार दीवार पत्रिका भी बनाई।
मैं सोचती हूँ कार्यशाला शुरू करने का पहला कारण विद्यालय में अध्यापकों की कमी रही होगी। अधिकतर अध्यापाकों की बोर्ड परीक्षाओं की कापी चैक करने में ड्यूटी लगी थी। वि़द्यालय में केवल तीन-चार शिक्षक ही रह गए थे तो उन्होंने सोचा होगा कि बच्चे खाली विद्यालय आएंगे क्योंकि उनकी पढ़ाई तो हो नहीं पाएगी। इसलिए समय का सदुपयोग करने के लिए कार्यशाला लगाई होगी।
आज तक इससे पहले न तो मैंने कोई कार्यशाला की थी और न दीवार पत्रिका बनाई थी। यह मेरा पहला अनुभव था। वैसे तो कार्यशाल में सभी गतिविधियां अच्छी थी। मुझे इसमंे सबसे अच्छा लगा आगे जाकर बोलना। इससे पहले स्कूल की जिन प्रतियोगिताओं मंे मैंने भाग लिया था। मुझे सबके सामने प्रस्तुत करने में झिझक होती थी लेकिन इस कार्यशाल में सभी 10वीं के बच्चे थे,इस कारण मुझे इस बार आगे जाकर बोलने में झिझक नहीं हुई। दूसरी बात यह अच्छी लगी कि इसमें किसी एक के ऊपर ही सारा काम नहीं था बल्कि सभी लोग समूह में मिलजुलकर काम करते थे।यदि इसमें एक ही वि़द्यार्थी के ऊपर सारा काम होता तो मुझे नहीं लगता कि सभी बच्चे स्कूल आते।इस कार्यशाला में सभी एक दूसरे की गलतियों को सामने बताते थे तो मैंने इससे भी सीखा कि अपनी गलतियों पर ज्यादा गौर करने की बजाय उन्हें सुधारने का प्रयत्न करना चाहिए।
‘यदि कभी कार्यशाल लगेगी तो मैं इसमें भाग नहीं लूँगी।’ यह मेरी इससे पहले की सोच थी। मैंने कभी खुद को ऐसी गतिविधियों में शामिल नहीं किया था। यह मेरी पहली कार्यशाल थी। जब हमें हाॅल में लाकर बताया गया कि हम कार्यशाला लगाने वाले हैं तब भी मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा लेकिन जब धीरे-धीरे दिन बढ़ते गए और हम रोज-रोज नई गतिविधियां करते गए तो मुझे इसमें रूचि आने लगी।फिर मैं अपने ग्रुप में अच्छी तरह घुलमिल गई। तब मुझे महसूस हुआ कि ऐसी गतिविधियों में भाग लेना चाहिए क्योंकि हर किसी में कुछ न कुछ कला छिपी रहती है और ऐसी कार्यशाला ही उन्हें ढूँढने का अवसर प्रदान करती हैं।
मैं प्रतिदिन घर जाकर इस कार्यशाला के बारे में बताती थी। पहले एक-दो दिन तो मैंने घर में कहा कि पढ़ाई तो हो नहीं रही है। हमारा समय बर्बाद कर रहे हैं लेकिन जब मुझे इस कार्यशाला का उद्देश्य पता चला और गतिविधियां अच्छी लगी तो फिर मैंने अपने घर में भी बताया।शायद उन्हें ऐसा लगा कि बच्चे खाली तो नहीं जा रहे हैं स्कूल में कुछ न कुछ तो सीख रहे हैं।
जहाँ तक परेशानी का सवाल है जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि यह मेरी पहली दीवार पत्रिका थी तो मुझे अच्छे से पता नहीं था कि दीवार पत्रिका कैसे बनाई जाती है? इसलिए हमारे समूह ने गलती से प्रत्येक रचना के बाद थोड़ी-थोड़ी जगह छोड़ दी ,जिस कारण से हमारी पत्रिका में सबसे म रचनाएं थी क्योंकि अन्य रचनाओं के लिए उसमें जगह नहीं रही थी।
कार्यशाला के बारे में मेरे कुछ सुझाव हैं-
1- जो हम प्रतिदिन आख्या बोलते थे वो सही तो थी लेकिन अभी तक के सारे बच्चों न आख्या पढ़कर सुनाई उनकी नजर केवल कागज पर थी ,वहाँ पर बैठे विद्यार्थियों में नहीं। यदि आज के बाद कार्यशाला लगाई जाए तो उसमें कोशिश रहनी चाहिए कि आख्या मौखिक हो ,क्योंकि आख्या तो वही होती है जो पिछले दिन हम गतिविधयां करते हैं। मौखिक अभिव्यक्ति द्वारा पहले तो झिझक होती है पर बार-बार प्रयत्न करने से वह झिझक दूर हो जाती है।
2-ग्रुपों का चुनाव करते समय ध्यान रखना चाहिए कि सभी ग्रुप बराबरी हों,इससे उन सभी में आगे निकलने के लिए प्रतियोगिता होगी।
हमारी लेखन कौशल विकास कार्यशाला 21 अप्रैल से 2 मई तक चली। हमारी कार्यशाला में सात ग्रुप बनाए गए थे जिसमें हम प्रतिदिन नई-नई गतिविधियाँ करते थे।जैसे-कविता बनाओ गतिविधि,कहानी निर्माण गतिविधि,वाक्य अन्त्याक्षरी, बिंब चित्र,उड़ान भरो गतिविधि आदि। प्रतिदिन अख्या भी सुनाई जाती थी। कार्यशाला के अंतिम दिनों में सभी ने समूहवार दीवार पत्रिका भी बनाई।
मैं सोचती हूँ कार्यशाला शुरू करने का पहला कारण विद्यालय में अध्यापकों की कमी रही होगी। अधिकतर अध्यापाकों की बोर्ड परीक्षाओं की कापी चैक करने में ड्यूटी लगी थी। वि़द्यालय में केवल तीन-चार शिक्षक ही रह गए थे तो उन्होंने सोचा होगा कि बच्चे खाली विद्यालय आएंगे क्योंकि उनकी पढ़ाई तो हो नहीं पाएगी। इसलिए समय का सदुपयोग करने के लिए कार्यशाला लगाई होगी।
आज तक इससे पहले न तो मैंने कोई कार्यशाला की थी और न दीवार पत्रिका बनाई थी। यह मेरा पहला अनुभव था। वैसे तो कार्यशाल में सभी गतिविधियां अच्छी थी। मुझे इसमंे सबसे अच्छा लगा आगे जाकर बोलना। इससे पहले स्कूल की जिन प्रतियोगिताओं मंे मैंने भाग लिया था। मुझे सबके सामने प्रस्तुत करने में झिझक होती थी लेकिन इस कार्यशाल में सभी 10वीं के बच्चे थे,इस कारण मुझे इस बार आगे जाकर बोलने में झिझक नहीं हुई। दूसरी बात यह अच्छी लगी कि इसमें किसी एक के ऊपर ही सारा काम नहीं था बल्कि सभी लोग समूह में मिलजुलकर काम करते थे।यदि इसमें एक ही वि़द्यार्थी के ऊपर सारा काम होता तो मुझे नहीं लगता कि सभी बच्चे स्कूल आते।इस कार्यशाला में सभी एक दूसरे की गलतियों को सामने बताते थे तो मैंने इससे भी सीखा कि अपनी गलतियों पर ज्यादा गौर करने की बजाय उन्हें सुधारने का प्रयत्न करना चाहिए।
‘यदि कभी कार्यशाल लगेगी तो मैं इसमें भाग नहीं लूँगी।’ यह मेरी इससे पहले की सोच थी। मैंने कभी खुद को ऐसी गतिविधियों में शामिल नहीं किया था। यह मेरी पहली कार्यशाल थी। जब हमें हाॅल में लाकर बताया गया कि हम कार्यशाला लगाने वाले हैं तब भी मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा लेकिन जब धीरे-धीरे दिन बढ़ते गए और हम रोज-रोज नई गतिविधियां करते गए तो मुझे इसमें रूचि आने लगी।फिर मैं अपने ग्रुप में अच्छी तरह घुलमिल गई। तब मुझे महसूस हुआ कि ऐसी गतिविधियों में भाग लेना चाहिए क्योंकि हर किसी में कुछ न कुछ कला छिपी रहती है और ऐसी कार्यशाला ही उन्हें ढूँढने का अवसर प्रदान करती हैं।
मैं प्रतिदिन घर जाकर इस कार्यशाला के बारे में बताती थी। पहले एक-दो दिन तो मैंने घर में कहा कि पढ़ाई तो हो नहीं रही है। हमारा समय बर्बाद कर रहे हैं लेकिन जब मुझे इस कार्यशाला का उद्देश्य पता चला और गतिविधियां अच्छी लगी तो फिर मैंने अपने घर में भी बताया।शायद उन्हें ऐसा लगा कि बच्चे खाली तो नहीं जा रहे हैं स्कूल में कुछ न कुछ तो सीख रहे हैं।
जहाँ तक परेशानी का सवाल है जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि यह मेरी पहली दीवार पत्रिका थी तो मुझे अच्छे से पता नहीं था कि दीवार पत्रिका कैसे बनाई जाती है? इसलिए हमारे समूह ने गलती से प्रत्येक रचना के बाद थोड़ी-थोड़ी जगह छोड़ दी ,जिस कारण से हमारी पत्रिका में सबसे म रचनाएं थी क्योंकि अन्य रचनाओं के लिए उसमें जगह नहीं रही थी।
कार्यशाला के बारे में मेरे कुछ सुझाव हैं-
1- जो हम प्रतिदिन आख्या बोलते थे वो सही तो थी लेकिन अभी तक के सारे बच्चों न आख्या पढ़कर सुनाई उनकी नजर केवल कागज पर थी ,वहाँ पर बैठे विद्यार्थियों में नहीं। यदि आज के बाद कार्यशाला लगाई जाए तो उसमें कोशिश रहनी चाहिए कि आख्या मौखिक हो ,क्योंकि आख्या तो वही होती है जो पिछले दिन हम गतिविधयां करते हैं। मौखिक अभिव्यक्ति द्वारा पहले तो झिझक होती है पर बार-बार प्रयत्न करने से वह झिझक दूर हो जाती है।
2-ग्रुपों का चुनाव करते समय ध्यान रखना चाहिए कि सभी ग्रुप बराबरी हों,इससे उन सभी में आगे निकलने के लिए प्रतियोगिता होगी।
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