Saturday, 25 October 2014

जब दीवार पत्रिका बनाने की प्रक्रिया बच्चों की प्रिय और नियमित गतिविधि बन गई

  पिथौरागढ़ जनपद का सबसे दुर्गम विकासखंड है मुनस्यारी।राजीव जोशी अपनी पहली नियुक्ति से ही इसी विकासखंड में कार्यरत हैं। उनकी खासियत है कि दुर्गम में होने के बावजूद भी उनके कार्य करने के उत्साह में कभी शिथिलता नहीं आई।नित नए प्रयोगों के द्वारा उन्होने खुद को हमेशा नया रखा और बच्चों के साथ मित्रवत व्यवहार किया। स्कूल के साथ-साथ वह शिक्षक संगठनों में बराबर सक्रिय रहे हैं लेकिन अपने काम से  ‘शिक्षक नेता काम नहीं करते।’ की धारणा को उन्होंने गलत साबित किया है। उन्होंने अपने स्कूल में ही नहीं बल्कि स्कूल से बाहर भी अपने ‘नएपन’ का परिचय दिया है। उत्तराखंड स्कूली शिक्षा की प्राथमिक कक्षाओं की गणित की पाठ्यपुस्तकों में इसकी छाप देखी जा सकती है।
  अप्रैल 2010 मंे राजीव ने अपने वर्तमान विद्यालय  कन्या पूर्व माध्यमिक विद्यालय नाचनी में  बच्चों के लिए  पांच दिवसीय ‘आनन्दोत्सव’ का आयोजन किया। मुझे भी इसमें भागीदारी करने का सुअवसर मिला। ‘आनन्दोत्सव’ दरअसल बच्चों के लिए आयोजित पांच दिवसीय रचनात्मक कार्यशाला को दिया गया नाम है। इसके पीछे यह मंशा थी कि बच्चे इन पांच दिनों में पूरे आनंद के साथ साहित्य,कला और संगीत के बारे में कुछ ऐसा जानें जो उनकी रचनात्मकता को नया आयाम प्रदान करे।  यह प्रयोग बहुत सफल रहा। इन पांच दिनों में बच्चे न केवल आनंदित रहे बल्कि उन्होंने बहुत कुछ नया निर्मित किया। उनके आनंद का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चे प्रातः आठ बजे कार्यशाला स्थल में आ जाते थे और पांच बजे तक कार्यशाला चलती थी, इस दौरान बच्चों के चेहरों पर न किसी तरह की ऊब दिखाई देती थी और न थकान  । पांच बजे जब दिवस का समापन किया जाता था ,उसके बाद भी बच्चे घर जाने को तैयार नहीं होते थे। दूसरे दिन समय से पहले कार्यशाला स्थल पर पहुुंच जाते थे। बच्चों के भीतर ऐसा उत्साह और आनंद मेरे लिए अभूतपूर्व था। बच्चों के साथ काम करते हुए इस कार्यशाला में हमें भी बहुत कुछ सीखने को मिला।
  उक्त कार्यशाला में बच्चों ने दीवार पत्रिका का निर्माण किया जो अभी भी निरंतर निकल रही है । बीच मंे इसमें कुछ ठहराव भी आया लेकिन राजीव ने पुनः एक कार्यशाला के द्वारा इसको गति प्रदान की है। मेरे अनुरोध पर उन्होंने दीवार पत्रिका से संबंधित अपने अनुभव भेजे हैं जिन्हें यहां प्रस्तुत करते हुए बहुत खुशी हो रही है ।        

 जब दीवार पत्रिका बनाने की प्रक्रिया बच्चों की प्रिय और नियमित गतिविधि बन गई
 -राजीव जोशी

     मैंने पढ़ा था कि लेनिन एक बाल अखबार का प्रकाशन किया करते थे। उनके पिता फील्ड की नौकर में थे, जो पत्रिका के लिए अपने अनुभव यात्रा वृतान्त के रूप में लिखते थे। माँ शिक्षा विभाग में थी, जो अपने कक्षा के अनुभवों को बाँटती थी। बड़े भाई चित्र बनाने सजाने का और बहिन भी पत्रिका के लिए काम करती थी। लेनिन पत्रिका का संपादन करते और प्रत्येक रविवार को नाश्ते की मेज पर इसे सबके सामने पढ़ा जाता था। यह वृतान्त मुझे एक शिक्षक के रूप में बड़ा प्रेरणादाई लगता था। लेनिन के माता-पिता की शैक्षिक सूझ दाद देने लायक है।
    सरकारी सेवा में आने के बाद मैने जब ’बाल अखबार’ का नाम सुना तो बनाने की कोशिश की। यह विद्यालय आठ माह से बंद पड़ा था। बच्चों को पढ़ना लिखना सिखाना ही चुनौती थी। प्रयास करने के बावजूद कुछ किया नहीं जा सका। इस बीच मैं दूसरे विद्यालय में स्थानान्तरित होकर पहुँच गया। अप्रैल 2010 में हमने पाँच दिन की एक कार्यशाला का आयोजन किया। जिसमें कविता, कहानी, संस्मरण, डायरी लेखन, पुतली कला के साथ ही कार्यशाला के दौरान बच्चों की रचनाओं का उपयोग कर बाल अखबार ’गुलदस्ता’ का भी प्रकाशन भी आरंभ किया गया। कार्यशाला बहुत सफल रही और बहुत कुछ सीखने को मिला। विषयांतर के कारण कार्यशाला के अनुभवों को समेटते हुए दीवार पत्रिका की ओर बढ़ना ठीक रहेगा।
        कार्यशाला में बच्चों को बाल पत्रिकाएँ भी बाँटी गई थी, जिन्हें बच्चों ने खूब पढ़ा। कार्यशाला के बाद बच्चे फिर से किताबें माँगने लगे।  पुस्तकालय रहित हमारे विद्यालयों में बाल साहित्य का सर्वथा अभाव होता है। लेकिन मैंने अपने प्रयासों से चकमक, बाल-हंस, बाल-प्रहरी, नन्हे सम्राट, आदि  बाल पत्रिकाओं की वार्षिक सदस्यता ली। बच्चों को पुस्तकालय संचालन का काम सौंपकर पुस्तक बाँटने और जमा करने की जिम्मेदारी सौंप दी। जो अनवरत जारी है। आज तक एक भी किताब नहीं खोई। कुछ मेरी गलती से कम हुई, हमने बिना पुस्तकालयाध्यक्ष से पूछे टी0सी0 दे दी तो बच्चों के पास किताबें रह गईं। इससे ये लाभ हुआ कि मेरे प्रशिक्षण, बी0एल0ओ0 आदि में जाने पर भी काम चलता रहा। पुस्तकालय प्रभारी दोनों लड़कियाँ किताब आने पर उसमें पुस्तक संख्या लिखने, जिल्द चढ़ाने, और सबसे पहले खुद पढ़कर औरों को बाँटने का काम स्वयं कर लेती हैं। पढ़ना और लिखना दोनों साथ-साथ चलने वाले काम हैं इसलिए एक समृद्ध पुस्तकालय का होना जरूरी है, प्राथमिक शालाओं में जिसकी अभी भी कमी है। बिना पुस्तकालय के विद्यालय संचालित करने की नीति बनाने वालों का मैं भी दर्शनाभिलाषी हूँ।
      विद्यालय में 56 बच्चे थे, जो तीन सदनों में बँटे थे। अधिक से अधिक बच्चों को प़ित्रका से जोड़ने के उद्देश्य से तीनों सदनों की अलग-अलग दीवार पत्रिका का प्रकाशित करना आरंभ किया। शुरू में तो बच्चों के साथ मेहनत भी करनी पड़ी किंतु बाद में बच्चे खुद यह काम करने लगे। प्रत्येक शनिवार को मध्यावकाश के बाद आयोजित बाल-सभाओं में अन्य गतिविधियों के साथ इन्ही पहले प्रकाशितं अंकों को पढना और चर्चा करना तथा अन्तिम शनिवार को नए अंक का निर्माण का कार्य किया जाता था। इन तीन सालों में बच्चों की काफी स्वरचित रचनाएँ प्रकाशित हुईं। उस समय अध्ययनरत बच्चे अब अन्यत्र जा चुके हैं किंतु किताब लेने आते रहते हैं।
     दीवार पत्रिका प्रकाशन के बाद और पहले के बच्चों में स्पष्ट अंतर दिखता है। बच्चों ने मंहगाई, भ्रष्टाचार, कन्या भ्रूण-हत्या, पर्यावरण आदि विषयों पर कविताएँ लिखीं। दीवार पत्रिका के माध्यम से आत्मविश्वास और लिखने-पढ़ने की संस्कृति का विकास बेहद सहजता से किया जा सकता है।     दीवार पत्रिका बनाने में बच्चे इतनी तन्मयता के साथ लगे रहते थे कि हमारे साथी शिक्षक जिस दिन अकेले होते थे तो वे इसे बनाने का काम अतिंम शनिवार के स्थान पर एक-दो दिन आगे-पीछे कर लेते थे। दीवार पत्रिका बनाने की प्रक्रिया बच्चों की प्रिय और नियमित गतिविधि बन गई थी। पढ़ना, संकलित करना और अपेक्षाकृत कम ही सही मौलिक लेखन का काम बच्चे स्वंय कर लेते थे। हम उसे कभी होली, कभी दिवाली, कभी आजादी विशेषांक बनाकर दिशा देते थे ताकि बच्चों को लिखने के लिए विषय मिल जाएँ। पढ़ना, लिखना, चिपकाना, सजाना और उसे दीवार में लटकाना इन सारे कामों में रचनात्मकता के पर्याप्त अवसर हैं। एक बार बच्चों के पास जब सामग्री अधिक हो गई तो दीवार पत्रिका दीवार में बहुत लम्बी हो गई। तब मैंने इसे किताब का रूप देने का निश्चय किया। तब तक तीनों सदनों के मिलकर 74 अंक निकल गए थे। प्रेमचन्द जयंती के अवसर पर पिचहत्तरवाँ अंक किताब रूप में निकाला। जिस अवसर पर सभी प्रकाशित अंकों की प्रदर्शनी भी लगाई। अभिभावकों ने ही इसका विमोचन किया।
     बच्चों ने यह सिद्ध कर दिखाया कि उन्हें अवसर दिए जाँय तो वे हमसे भी अच्छा करते हैं। मेरे यह सोचने के बावजूद कि छोटे बच्चे जो लिखना-पढ़ना सीख  रहे हैं, वे यह काम बहुत अच्छा नहीं कर पाएंगे, उन्होंने न सिर्फ किया बल्कि लगातार सुधार भी किया। उसे नया आयाम दिया। सजाने-सवाँरने के उपाय खोजे और कर दिखाया।
    यह काम अपनी रफ्तार से चल रहा था कि विभाग ने बाॅक्स प्रोफाइल का काम शुरू करवाया। प्रत्येक बच्चे के नाम एक फाइल बनी जिसमें बच्चे की रचनाएँ रखी जानी थी। बच्चे लिखते रहे। फाइल में भरते रहे। बच्चे इस काम में व्यस्त हो गए। विभाग नेे धनराशि दी है तो उपभोग प्रमाण-पत्र भी लिया जाएगा और अधिकारी देखने भी आ सकते हैं, यह विभागीय भय वह सब भी करवाता है जिसके शैक्षिक निहितार्थ कुछ भी हों। फाइल एक पेटी में आज भी रखी हैं। बच्चों को लाभ कितना हुआ ये तो नहीं कहा जा सकता। पर इस सब के बीच दीवार पत्रिका निर्माण का कार्य छूट गया। ऐसे ही पलों में शिक्षक की स्वायत्तता का सवाल प्रासंगिक हो जाता है। शिक्षक को पूर्ण स्वायत्तता देने और या नियं़़त्रण में रखने के अंतर से पूरी शिक्षा की प्रक्रिया में अंतर आ जाएगा।
    दीवार पत्रिका के संदर्भ में एक और गलती उसे किताब का रूप देकर भी हुई। यह सोचकर कि किताब की शक्ल में इसे पढ़ना बच्चों को सुविधाजनक लगेगा, इसे किताब का रूप तो दे दिया किंतु इससे सामग्री न सिर्फ बंद-सी हो गई, बल्कि अब यह एक-एक कर पढ़ी जा सकने वाली किताब के रूप में भी आ गई। इससे पहले बच्चे साथ खड़े होकर, उँगली लगाकर पढ़ते थे। एक दूसरे को दिखा-दिखाकर पढ़ने-लिखने में होने वाली गलतियांे पर खिलखिलाकर हँसते थे, गलतियों को हमें दिखाते थे और उन पर बात-चीत भी हो जाया करती थी। किताब के शक्ल में आने के बाद यह सब तो बंद हुआ ही साथ ही अब दीवार पत्रिका के पास लगने वाली बच्चों की झुमटी भी बंद हो गई। दीवार पत्रिका के पास बच्चों के बीच लिखे हुए पर अनौपचारिक बात-चीत, खींच-तान, हँसी-ठिठोली तो मजेदार होती ही थी, पत्रिका के उद्देश्यों की ओर ले जाने के लिए भी कामगार होती थी। अपने इन अनुभवों से मैं यह कहने की स्थिति में हूँ कि अपने नाम के अनुरूप दीवार पत्रिका को दीवार पर ही टँगने दिया जाय तो ही उसका असली मजा है।
      अपनी एक और गलती का जिक्र्र कर लिया जाय। जब बच्चों ने काम अपने हाथ में ले लिया तो धीरे-धीरे मेरी भूमिका घटती गई। सरकारी कामों को बोझ तो था ही पत्रिका निकल ही रही थी तो हर अंक के साथ होती गड़बड़ियों को ठीक करने का काम जो काम मेरा था, उसमें कमी रह गई। बहुत दिनों से जब पत्रिका के पास बच्चे दिखने बंद हो गए तो पता लगाने की कोशिश की। कुछ बच्चे जो इसे बनाने में निपुण हो गए थे, वे चले गए। सरकारी नीतियों की मेहरबानी से छात्र संख्या भी घट गई। अब तीन सदन तो थे मगर बच्चे इतने कम थे कि वे पत्रिका निर्माण में ही सब पढ़ लेते थे। प्रकाशन के बाद इस सामग्री में उनके लिए कोई आकर्षण नहीं बच जाता था। यह भी महत्वपूर्ण है कि दीवार पत्रिका की प्रक्रिया में पूरे विद्यालय के शिक्षकों को संलग्न होना चाहिए तभी इसे ठीक से चलाया भी जा सकता है और यहाँ तक कि विद्यालयों की संपूर्ण गतिविधियों का केंद्र बनाया जा सकता है।
   दीवार पत्रिका निर्माण में आई शिथिलता के बाद इसे फिर शुरू करने के लिए दीवार पत्रिका निर्माण कार्यशाला का आयोजन किया। इसमें पहले दिन बच्चों को बाल पत्रिकाएँ बाँटी। बच्चों ने उसमें लिखे जा रहे स्थाई स्तंभों को छाँटकर सूचीबद्ध किया। पत्रिकाओं में से साहित्यक विधाओं को छाँटकर सूची बनाई गई। दूसरे दिन से अलग-अलग विधाओं में भी लेखन का अभ्यास कराया गया। सात दिन चली इस कार्यशाला में अभ्यास कराने के उद्देश्य से सबने एक-एक बाल अखबार बनाया। विद्यालय के बच्चों में से एक संपादक मंडल का चयन किया गया। अब पूरे विद्यालय की एक दीवार पत्रिका ’गुंजार’ प्रकाशित की जा रही है। काफी परिश्रम के बाद अब स्वरचित पहेलियाँ व कविताएँ देखने को मिलीं हैं। गीता दानू की एक कहानी ’चकमक’ के लिए प्रकाशनार्थ भेजी है।
     ’गुंजार’ में पहेली, कविता, कहानी, संपादकीय आदि स्थाई स्तंभ हैं। चित्र बनाकर रंग भरो, पहेली, सामान्य ज्ञान, कहानी पूरी करो आदि प्रतियोगिता वाले स्तंभ हैं। चयनित रचनाओं और विजेताओं को ’गुंजार’ के अगले अंक में प्रकाशित किया जाता है। हिंदी की किताब में दिए गए स्वतंत्र लेखन के अभ्यासों को परिवेशीय परिस्थितियों में परिवर्तित कर पत्रिका के माध्यम से करवाने का प्रयास किया जा रहा है।
    विद्यालय में पढ़ाए जा रहे विषयों को बाल पत्रिका के माध्यम से परोसने का काम करना एक चुनौती है, जिसके लिए एक-एक स्थाई स्तम्भ शिक्षकों के माध्यम से शुरू करने की योजना है। इस सब के बीच यह भी कहना जरूरी है कि कोल्हू का बैल रचनात्मक काम नहीं कर सकता, रचनात्मकता की अपनी रूचि और रफ्तार होती है।
                                                                                   

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