Monday, 27 October 2014

दीवार पत्रिका के संपादक से एक साक्षात्कार

हमारी योजना है कि इस ब्लॉग में विभिन्न स्कूलों से निकल रही दीवार पत्रिकाओं में प्रकाशित चुनिन्दा रचनाओं को भी स्थान देंगे . इस कड़ी में प्रस्तुत है आज राजकीय इंटर कालेज देवलथल से निकलने वाली  दीवार पत्रिका ‘उमंग’ की पहली संपादक रश्मि बसेड़ा से वर्तमान में निकलने वाली दीवार पत्रिका ‘कल्पना’ के संपादक मंडल की बातचीत-
कल्पना- आपके मन में दीवार पत्रिका बनाने का विचार  कैसे आया?
रश्मि बसेड़ा- यह विचार मेरा नहीं था। एक दिन कक्षा में पढ़ाते हुए पुनेठा सर ने दीवार पत्रिका की बात हमारे सामने रखी और इस दिशा में कोशिश करने को कहा।
कल्पना- आपको दीवार पत्रिका बनाना कैसा लगा?
रश्मि बसेड़ा-मुझे बहुत अच्छा लगा। तरह-तरह की जानकारियां एकत्र करना, पत्रिका में लगाई जाने वाली हर विषयवस्तु का बारीकी से निरीक्षण करना। सबसे बड़ी बात इससे स्वयं मेरी लेखनी में बहुत सुधार आया।
कल्पना-अगर आपको और मौका मिला तो आप और दीवार पत्रिका निकालना चाहेंगी?
रश्मि बसेड़ा-अवश्य निकालना चाहुंगी।
कल्पना-दीवार पत्रिका बनाने में ही पूरा ध्यान दिया या अन्य कार्यों में भी?
रश्मि बसेड़ा-मैंने दीवार पत्रिका बनाने के साथ-साथ अन्य कार्यों में भी ध्यान दिया। यह जरूरी भी था क्योंकि उस वक्त मैं एक संपादक होने के साथ-साथ में एक विद्यार्थी भी थी।
कल्पना- आपका दीवार पत्रिका बनाने का रूटीन क्या था?
रश्मि बसेड़ा-सच कहंू तो हमारा दीवार पत्रिका बनाने का कोई रूटीन नहीं था। जिस समय भी हमें समय मिलता ,हम उस खाली समय का प्रयोग दीवार पत्रिका बनाने में करते थे।
कल्पना-दीवार पत्रिका बनाने के पीछे आपके घर वालों की क्या राय थी?
रश्मि बसेड़ा-जब मैंने दीवार पत्रिका के बारे में अपने घर वालों को बताया था तो उन्होंने मुझसे कहा यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन पढ़ाई का मुख्य रूप से ध्यान रखना। मेरा छोटा भाई भी मेरी मदद करता था।

कल्पना-आपने दीवार पत्रिका की तैयारी के लिए क्या तरीका अपनाया?
रश्मि बसेड़ा-जब दीवार पत्रिका बनाने का विचार पुनेठा सर ने पूरी कक्षा के सामने रखा तब एक टीम के रूप में कार्य करने का विचार किसी के मन में नहीं था। सर ,ने कहा यदि इस पत्रिका का पहला अंक स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर निकले तो बहुत अच्छा रहेगा।
कल्पना- दीवार पत्रिका बनाने के पीछे अभ्यास कितना जरूरी है?
रश्मि बसेड़ा- इसके लिए अभ्यास बहुत जरूरी है।पर दीवार पत्रिका पर कार्य करते समय धीमे-धीमे यह कार्यकुशलता  स्वयं ही आ जाती है।
कल्पना- आपको दीवार पत्रिका बनाने में क्या-क्या कठिनाइयां आई तथा उनका सामना कैसे किया?
रश्मि बसेड़ा-जब भी कोई अच्छा काम करने निकलता है तो मुश्किलें आएंगी ही यह निश्चित है। जब दीवार पत्रिका बनाने का काम शुरू हुआ तो आए दिन कुछ न कुछ लगा रहता था।फिर भी  हमने  यह कार्य करना बंद नहीं किया। यही तो जीवन है। डरने के बजाय क्यों न चुप रहकर अपना काम किया जाय।
कल्पना-आपके अनुसार दीवार पत्रिका में क्या-क्या सामग्री होनी चाहिए?
रश्मि बसेड़ा-चुटकुले,विज्ञान से संबंधित प्रश्न,पहेलियां,कविता ,कहानी ,सामान्य ज्ञान के प्रश्न आदि दीवार पत्रिका को आकर्षक बनाने के लिए थोड़े बहुत चित्र।
कल्पना-दीवार पत्रिका बनाने में बच्चों का क्या योगदान रहा?
रश्मि बसेड़ा-बच्चों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। जिस समय भी उन्हें वक्त मिलता वे उस पत्रिका के बारे में आपस में चर्चा करते तथा दीवार पत्रिका के लिए कई सामग्री भी देते।
कल्पना-अगर आप किसी पत्रिका की संपादक होती तो पुरानी दीवार पत्रिका की तरह ही बनाती या उसमें कोई बदलाव करती?
रश्मि बसेड़ा-वक्त के साथ -साथ बदलाव जरूरी है। उदाहरणतया ,अगर आपको बर्तनों की चमक बरकरार रखनी है तो लगातार मांजना पड़ता है। उसी प्रकार अगर में किसी पत्रिका की संपादक होती तो उस पत्रिका को और भी आकर्षक बनाने के लिए उसमें कई तरह के बदलाव करती।
प्रस्तुति -हिमांशु ,अभय ,प्रेम प्रकाश कक्षा -१०

1 comment:

  1. बडी सार्थक बातचीत हुई। प्रश्नों में पैनापन है तो उत्तरों में भी स्पष्टता और पक्का इरादा झलकता है ।
    बधाई

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