Thursday, 30 October 2014

बाल सृजन : बच्चों की रचनात्मकता को मंच प्रदान करने का एक प्रयास



घनश्याम भट्ट जी के नवाचारों से हम सोशियल मीडिया के माध्यम से परिचित होते रहते हैं . वह संस्कृत भाषा के शिक्षक हैं . बच्चों में रचनात्मकता के विकास के लिए नए –नए अवसर उन्हें उपलब्ध कराते रहते हैं . पिछले दिनों ‘दीवार पत्रिका एक अभियान’ समूह में उनकी यह पोस्ट पढ़ी जिसमें उन्होंने अपने विद्यालय से प्रारम्भ की गयी दीवार पत्रिका के फोटोग्राफ्स लगाये थे -
बाल सृजन -दीवार पत्रिका,प्रथम अंक, रा.उ.मा.वि.,दुदुली,नैनीताल, दीवार पत्रिका जिसे मेरे विद्यार्थियों ने कक्षा-6 से 10 तक के बच्चों की मेहनत का परिणाम है | इसमें सभी बच्चों ने बहुत उत्साह से भाग लिया ,यहाँ तक कि बच्चों की रचनाएँ इतनी आई संपादक मुकेश शर्मा कक्षा-10 व उप संपादक नीरज शर्मा कक्षा-10 भी परेशान हो गए कि किसे छोड़ा जाय किसे रखा जाय | बच्चों ने अपने काव्य-कौशल व बिम्ब निर्माण की कला की प्रतिभा के अपने अन्दर होने का अहसास तो कराया ही साथ ही कला कौशल का भी अद्भुत प्रदर्शन किया| संपादक मण्डल ने पत्रिका का कलेवर यथा अपेक्षित कृतियों को स्थान देकर,सुन्दर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी | विद्यार्थियों के इस उत्साह से यह तो सिद्ध हो ही जाता है कि बच्चों को उनके अन्दर छिपी प्रतिभा को प्रकट करने का सक्रिय अवसर उपलब्ध होने चाहिए बस, उनके अन्दर न जाने क्या-क्या आविष्कार छुपा हुआ है | केवल किताबी ज्ञान से हम न तो अच्छी शिक्षा दे सकते है न ही अच्छे इन्सान का निर्माण |एक शायरी याद आ रही है - धूप में आ के देखो घटाओं में नहा के देखो, जिन्दगी क्या है किताबों को हटाके देखो | पुनेठा जी, दीक्षित जी जैसे शिक्षक साथियों का यह अभियान निश्चित ही क्रन्तिकारी व सामयिक आवश्यकता है | बच्चों में छोटी अवस्था से ही यदि साहित्यिक अभिरुचि के बीज बोए जाएँ तो उनकी संवेदनशीलता व भावनात्मक विकास होगा जोकि आज ह्रास हो रहे नैतिक व्यक्तित्व के उत्थान के लिए बहुत ही आवश्यक है| बच्चे कहानियां भी लिखना चाहते थे , वे लिखते भी है पर हमने पहला अंक कविताओं को ही समर्पित किया है | अगले अंकों में सभी विधाओं को स्थान देने का प्रयास किया जाएगा | इस कार्य में दिशानिर्देशन व वित्तीय सहायता मैंने की परन्तु पूरा कार्य बच्चों ने ही मिलकर किया | आपका मार्गदर्शन एवं सुझाव सदैव आमंत्रित हैं.






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बहुत अच्छा लगा कि अपने विद्यालय में दीवार पत्रिका प्रारम्भ कर वह भी इस अभियान में शामिल हुए .  हमने घनश्याम भट्ट जी से दीवार पत्रिका शुरू करने सम्बन्धी अनुभव को ब्लॉग के लिए लिखने का अनुरोध किया .उन्होंने हमारे अनुरोध को स्वीकार करते हुए हमारे पाठकों के साथ अपने विचार शेयर किये हैं ,हम उनका आभार व्यक्त करते हैं . आशा करते हैं कि दीवार पत्रिका उनके विद्यालय की एक स्थायी गतिविधि बनकर बच्चों की रचनात्मकता को मंच प्रदान करती रहेगी .

   मैं अक्सर अपने विद्यार्थियों को कहानी, तुकबन्दी, लयात्मक भावाभिव्यक्ति, डायरी आदि लिखने को कहता था | बच्चे लिखते भी थे, पर उनकी बाल कृति मेरे अथवा कक्षा के बच्चों तक ही सीमित रह जाती थी | पुनेठा जी, जो हिन्दी साहित्य की सेवा में समर्पित हैं उनकी सद्प्रेरणा से दीवार पत्रिका का विचार मुझे बहुत अच्छा लगा | वास्तव में हमारी शिक्षा व्यवस्था तभी सार्थक व निर्णायक सिद्ध होगी जब यह अधिक उपयोगी होगी | बच्चों को दूसरों की लिखी कविता, कहानियां आदि पढ़ाना व परीक्षा पास कर लेना भर पर्याप्त नहीं है आवश्यकता इस बात की है कि हम बच्चों में ज्ञान-पिपासा, साहित्य-प्रेम भी पैदा कर सके | आज के संक्रमित समाज-व्यवस्था में हमारी शिक्षा का उद्देश्य भी परिवर्तित हो गया है | आज शिक्षा केवल मानव संशाधन निर्माण के लिए रह गयी है हम शिक्षा को रोजगार की सांकल खोलने का जरिया मानते हैं | पाठ्यक्रम में सम्मिलित विभिन्न मन-लुभावन विषय डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, व्यवसायी, राजनैतिक आदि का निर्माण तो करते हैं पर मानवता, नैतिकता से बहुत दूर हैं | आज के कोई भी विषय दया, करुणा, प्रेम, सत्य, परोपकार जैसे नैतिक अवधारणाओं को नहीं सिखाते है | इस सन्दर्भ में थोडा-बहुत योगदान साहित्य करता है | बच्चे यदि छोटी अवस्था से ही अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति देने का प्रयास करते हैं तो निश्चित ही उनमें साहित्य प्रेम जागेगा और उनका भावनात्मक विकास हो सकेगा | इन्हीं सब उद्देश्यों के साथ शुरू हुई हमारी दीवार पत्रिका | बच्चों की कल्पना, बच्चों के शब्द, बच्चों के भाव, बच्चों के विचार हैं इस पत्रिका में इसलिए इसका नाम रखा बाल-सृजन | प्रथम अंक है इसलिए इस बार बच्चों को पेपर का माप देकर व कुछ निर्देशों के साथ ८--९ दिन में अपनी कृति को संपादक के पास जमा करने को कहा गया | बच्चों ने तीव्र उत्साह के साथ कार्य किया और समय से पहले अपनी रचनाएँ सौपनी शुरू कर दी | रचनाओं में इस बार केवल काव्यात्मक अभिव्यक्ति ही निर्धारित थी | बच्चों ने अधिकतर कविताएँ अपने आप बनाई और कुछ इधर-उधर की तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत कर दी | बच्चों की भाषा व कविता के स्वरूप पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया क्योंकि बच्चों के मन में रूचि उत्पन्न हो रही थी वे कविता लिखने के लिए दूसरों की कविता पढ़ रहे थे | एक बच्चे को मैंने देखा कि वह कबीर दोहावली जैसी गंभीर पुस्तक पुस्कालय से लेकर गया था | बच्चों ने अपनी रचनाएँ पूर्ण रूप से सुसज्जित करके जमा किया उन्हें चार्ट में बस चिपकाना भर था | संपादक द्वय नीरज शर्मा व मुकेश कुमार ने रचनाओं को पत्रिका में यथास्थान योजित किया और पत्रिका को लगभग एक  दिन में तैयार कर दिया | पत्रिका तैयार होने के बाद भी -- रचनाएँ और आई बच्चों की. उन्हें अगली पत्रिका के लिए रख दिया गया | बच्चे बहुत उत्साहित थे उनकी इच्छा है कि कहानी आदि भी सम्मिलित की जाए| अगली पत्रिका में कहानी,डायरी, व सामान्य ज्ञान की रोचक बाते भी शामिल की जाएंगी |

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