Tuesday, 4 November 2014

कौशाम्बी वॉल मैगजीन वर्कशॉप

दीवार पत्रिका का अभियान बहुत तेजी से फ़ैल रहा है . दिन प्रतिदिन उसे  नए -नए आयाम मिल रहे हैं . अनुभवों की श्रृंखला आगे बढती जा रही है . आज जैसे ही अपना मेल बॉक्स खोला आशुतोष उपाध्याय जी द्वारा भेजी यह रिपोर्ट मिली .पढ़कर मन प्रसन्नता से भर गया .आशुतोष जी लम्बे समय से अपनी टीम के साथ विज्ञान की अवधारनाओं को छोटे-छोटे प्रयोगों के माध्यम से बच्चों तक पहुंचाने का अद्भुत कार्य कर रहे हैं . पिछले वर्ष उनकी टीम द्वारा प्रस्तुत प्रयोगों को अपने बच्चों द्वारा करते हुए देखने का सुख मुझे भी मिला . उस पर फिर कभी अपने अनुभव शेयर करूँगा . अभी प्रस्तुत है वॉल मैगजीन की तीसरी पाइलट वर्कशॉप की रिपोर्ट -
बीते 1 से 3 नवंबर को कौशाम्बी (उत्तर प्रदेश) के आलमचंद गांव के हमारे बाल विज्ञान केंद्र में वॉल मैगजीन की तीसरी पाइलट वर्कशॉप संपन्न हुई. वर्कशॉप में गांव के ही एमपी इंटर कॉलेज के सातवीं और आठवीं कक्षा के 15 बच्चों ने हिस्सा लिया. ये बच्चे वॉल मैगजीन के संपादक मंडल के सदस्य हैं. इनके अलावा विज्ञान केंद्र के संचालक कमलेश त्रिपाठी और सुरेन्द्र सिंह के साथ-साथ नए विज्ञान मित्र ओमवीर सिंह ने भी वर्कशॉप में सक्रिय हिस्सेदारी की. वर्कशॉप के तीसरे दिन इलाहाबाद अर्बन प्रोग्राम के दोनों विज्ञान मित्र- पवन और राजकुमार भी वहां पहुंचे.
गौरतलब है कि ये बच्चे सुरेन्द्र और कमलेश की मदद से पहले भी एक ट्रायल मैगजीन बना चुके थे. नई वर्कशॉप इस लिहाज से अलग थी कि इस बार हमने बच्चों को मैगजीन के हार्डवेयर के साथ-साथ सॉफ्टवेयर का भी प्रशिक्षण दिया. यानी वॉल मैगजीन बनाने के अलावा उन्होंने मौलिक रचनाएं लिखने और उनका संपादन करने का भी प्रशिक्षण लिया. बच्चों के साथ पुरानी वॉल मैगजीन में प्रकशित लेखों पर चर्चा हुई और उन्हें इस बात की भी जानकारी दी गई कि कौन सी रचनाएं स्वीकार और कौन सी अस्वीकार करनी चाहिए. पुरानी वॉल मैगजीन में छपी एक कहानी पर खास तौर पर चर्चा हुई, जिसमें लेखक ने दो भाइयों के झगड़े के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि हमें किसी पर भरोसा नहीं करना चाहिए. संभवतः यह कहानी बच्चे ने अपने आस-पास के अनुभव के आधार पर लिखी हो, लेकिन एक बच्चे का ऐसे निष्कर्ष तक पहुंचना सचमुच चिंताजनक है.  

पहले दिन वर्कशॉप की शुरुआत वॉल मैगजीन की अवधारणा पर बातचीत के साथ हुई. संपादक मंडल से मैगजीन का नाम सुझाने को कहा गया. बहुत सारे नामों के बाद 'धमाका विज्ञान का' पर सबकी सहमति बनी. इसके बाद बच्चों के अलग-अलग समूह बनाए गए. एक समूह को संपादकीय लिखने की जिम्मेदारी दी गयी. अन्य सभी को उनकी पसंद के विषयों पर लिखने को कहा गया. कुछ बच्चों ने कहानियाँ, कुछ ने कविताएं, कुछ ने संस्मरण और कुछ ने इंटरव्यू का जिम्मा लिया. कुछ बच्चों ने चित्र बनाना पसंद किया. अगले दिन बच्चे अपनी-अपनी रचनाओं के साथ समय पर हाजिर थे. दो बच्चों ने कमलेश और सुरेन्द्र का इंटरव्यू लिया. इस दिन सभी रचनाओं और उनमें मौजूद गलतियों पर चर्चा की गयी. दूसरे दिन वर्कशॉप जल्दी खत्म की गयी क्योंकि दोपहर बाद कमलेश जी ने एक कम्युनिटी वर्कशॉप तय की थी. 'मानव शरीर' पर हो रही इस कम्युनिटी वर्कशॉप में हम सब शामिल हुए.

तीसरे और अंतिम दिन वॉल मैगजीन को तैयार किया जाना था. बच्चों के एक समूह ने अखबार से मैगजीन का आधार तैयार किया और दूसरा मास्ट की कटिंग में जुट गया. कुछ समूहों ने मैगजीन के शीर्षक के डिजाइन के नमूने तैयार किये. चुने गए नमूने से बच्चों ने मास्ट को अंतिम रूप दिया. इसके बाद रचनाओं को पेस्ट करने की बारी आई. अंत में साथी विनोद ने बच्चों की ओर से तैयार की गई वॉल मैगजीन में कलाकारी दिखाई और इसमें टांगने वाली डोरी बाँधी. वॉल मैगजीन देखकर बच्चों का खुशी का ठिकाना न रहा. उन्होंने सुझाव दिया कि वॉल मैगजीन का विमोचन आगामी 15 नवम्बर को उनके स्कूल में होने वाले समारोह में किया जाना चाहिए. उम्मीद है स्कूल वालों को भी बच्चों की यह कारगुजारी ज़रूर पसंद आएगी.

------------------------------------------------------------------------------------------------

इस वर्कशॉप की वजह से हमें उत्तर प्रदेश के एक गांव में तीन दिन रहने और यहां के जीवन को जानने का मौका मिला. 3000 से ज्यादा आबादी वाले इस अपेक्षाकृत बड़े गांव के लगभग 90 प्रतिशत घरों में लोग शान या सुरक्षा की खातिर गैर-कानूनी असलहे रखते हैं. इस प्रवास के दौरान मुझे भी जीवन में पहली बार तमंचे को नजदीक से देखने का सौभाग्य मिला. आप यह जानकर हैरान हो सकते हैं कि हाल ही खुले हमारे साइंस सेंटर के आंगन से हमारे साथी सुरेन्द्र ने राइफल के आठ-दस खाली खोखे जमा किये हैं. यहां कोई लड़ाई नहीं हुई बल्कि कुछ दबंग ग्रामीणों ने मौज-मजे के लिए धमाके कर डाले. बात-बात पर कनपटी पर तमंचा सटा देना आम चलन है- जैसे, कुछ दिन पहले एक स्थानीय नेता और उसके दोस्त के बीच इस इस बात के लिए बंदूकें तन गयीं कि नौटंकी में बुलाई गई डांसर को कौन अपनी साली कहे. यहां स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई नहीं होती और परीक्षाओं में खुलेआम नकल होती है. आप यहां बिना पढ़े या कॉलेज का मुंह देखे एम.एससी. की डिग्री हासिल कर सकते हैं. दहशत और निराशा पैदा करने वाली इन सब बातों के बीच ग्रामीण जीवन की सरलता-और सहजता को भी पूरी धज के साथ आप यहां देख सकते हैं.

भ्रष्टाचार और अपराध के आगोश में फंसे इस गाँव में हम विज्ञान का विचार ले कर पहुंचे हैं. इस पसमंजर के बीच अपने साइंस सेंटर और उसके आगे कूदते-फांदते बच्चों को देखकर मुझे बेहद खुशी हुई. उम्मीद है कि सुरेन्द्र और कमलेश अपनी लगन से इस सेंटर की सार्थकता को अंजाम तक पहुंचाने में कामयाब होंगे.

No comments:

Post a Comment