Friday, 7 November 2014

रचनात्मकता की एक और 'उड़ान' धुर्चू से

योगेश पाण्डेय पिथौरागढ़ जनपद के एक ऐसे विद्यालय( रा0प्रा0वि0 धुर्चू ) में कार्यरत हैं जहां पहुंचने के लिए लगभग दस किमी की कठिन चढ़ाई पैदल पार करनी पड़ती है। लेकिन वह इस कठिनाई को कभी अपने काम के रास्ते में बाधक नहीं बनने देते हैं। उपलब्ध संसाधनों में ही जितना संभव है  उसी में बेहतर से बेहतर करने पर विश्वास रखते हैं। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां  उनकी रचनात्मकता को कम नहीं करती बल्कि चुनौती देती हैं। पिछले दिनों उन्होंने अपने पूरे संकुल क्षेत्र के शिक्षकों को एकजुट कर ‘उपवन’ नाम से एक स्कूली पत्रिका का प्रकाशन-संपादन किया जिसमें उन्हें संकुल क्षेत्र के सभी शिक्षकों का भरपूर  आर्थिक एवं रचनात्मक सहयोग प्राप्त हुआ। सृजनात्मकता विरोधी समय में इस तरह के रचनात्मक कार्यों में एक बड़े समूह का सहयोग ले लेना कोई आसान काम नहीं रह गया है, लेकिन उनकी  नवाचारी और कर्मठ शिक्षक की छवि ने उनके लिए इस काम को आसान कर दिया। केवल इतना ही नहंीं दीवार पत्रिका के अभियान को आगे बढ़ाने में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने न केवल अपने विद्यालय से दीवार पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया बल्कि पड़ोसी विद्यालयों को भी इसके लिए प्रेरित किया।उनकी प्रेरणा से संकुल क्षेत्र के कुछ और विद्यालयों से यह प्रयोग शुरू हुआ है .  आज प्रस्तुत है दीवार पत्रिका से जुड़ा उनका यह अनुभव -   

                              

        जब मंैने शैक्षिक दखल पत्रिका में दीवार पत्रिका के बारे में पढ़ा तथा कि दीवार पत्रिका के माध्यम से अपने विद्यालय के विद्यार्थियों में रचनात्मक चिंतन विकसित करने के सृजन कार्य में लगे पत्रिका में काम कर रहे महेश पुनेठा जी, राजीव जोशी जी, चिन्तामणि जोशी जी से दीवार पत्रिका के बारे में बातचीत हुई तथा  जानकारी प्राप्त की, उनसे मेें बड़ा प्रभावित हुआ। मुझे भी कुछ न कुछ नया करने का फितूर सवार रहता है कभी सफल होता हूं और कभी असफल लेकिन कोशिश जारी रहती है । मैने सोचा दीवार पत्रिका के कांस्पेस्ट को अपने विद्यालय में भी ट्राई किया जाय, लेकिन मन में शंका भी थी कि क्या प्राथमिक स्तर के बच्चे दीवार पत्रिका का निर्माण कर पायंेगे ?

खैर 15 अगस्त 2014 के बाद इस कार्य को करने का मन बनाया । सोचा था कि यदि यह पत्रिका बन गई तो 5 सितम्बर शिक्षक दिवस को इसका विमोचन कर दिया जायेगा । बच्चों से कोई भी चित्र बना लाने को तथा अपने घर, जंगल घास लकड़ी डोका, अपने मम्मी पापा भाई आमा बूबू किसी के भी बारे में लिखने तथा चुटकुलों पहाडी पहेलियां (ऐन)  कुछ भी लिख कर लाने को कहा। अगस्त का महीना पूरा होने तक ढेर सारी सामग्री जमा हो गई , सामग्री को देखा गया तो उनमें अधिकतर रंग भरे चित्र थे लिखित सामग्री बहुत कम थी । कुछ बच्चों ने चित्र बहुत अच्छे बनाये थे उन्हें चयनित करके रख लिया गया। लिखित सामग्री हेतु बच्चों को थोड़े आईडिसाज दिये व प्रोत्साहित किया तो बच्चे लिखने लगे तथा 3 सितम्बर तक हमारी पत्रिका ष्उड़ानष्
तैयार हो गई । 5सितम्बर शिक्षक दिवस को इसका विमोचन कर दिया गया । दीवार पर पत्रिका टांग दी गयी । बच्चे उसे देखते व आनंदित होते हैं कि हमारे बनाये चयनित चित्र व लेख हमारे कक्ष का शोभा बढ़ा रहे हैं ।

अक्टूबर माह में दक्षिण भारत में आये समुद्री तूफान ष्हुदहुदष् का असर पूरे उत्तराखंड में हुआ । बारिश हुई, कक्षा कक्षों की दीवार सीलन से भर गई । हमारी पत्रिका में बच्चों लेख व चित्रों की स्याही व रंग बुरी तरह फैल गये । अक्षर पढ़ने में मुश्किल से आ रहे हैं । बड़ा बुरा लगा कि  बच्चों की मेहनत बेकार हो गई ।

खैर हमने व बच्चांे ने हार नहीं मानी है  अब अगला अंक बाल दिवस में निकालने की तैयारी की है तथा इस अंक को सुरक्षित दीवार में लगाने की भी....

                                                           
                               

 

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