राजकीय इंटर कालेज देवलथल की दीवार पत्रिका ‘कल्पना’ के संपादक हिमांशु बसेड़ा से बातचीत
प्रश्न- दीवार पत्रिका मंे संपादक के रूप में काम करना आपको कैसा लगाता है?
हिमांशु- दीवार पत्रिका के संपादक के रूप में काम करना मुझे बहुत अच्छा लगता है।
प्रश्न-एक संपादक के रूप में आपकी क्या भूमिका रहती है?
हिमांशु- मैं अपने आप को एक अच्छा लीडर साबित करना चाहता हूूं। जिस प्रकार क्रिकेट की टीम में एक कप्तान पूरी टीम को अपने नियंत्रण में रखता है,उसी प्रकार में भी संपादक के रूप में अपने पूरे संपादक मंडल को एकत्रित करना चाहता हूं जिससे दीवार पत्रिका और उभर कर आए।
प्रश्न-संपादन का कार्य करते हुए क्या आपकी पढ़ाई बाधित नहीं होती है?
हिमांशु-इस कार्य को करते हुए मेरी बहुत कम (पांच प्रतिशत) पढ़ाई बाधित होती है क्योंकि इसे हम खाली वादन व हाफटाइम में बनाते हैं।
प्रश्न-क्या आपको यह नहीं लगता है कि यदि यह समय आप अपनी स्कूली पढ़ाई को देते तो आपको अधिक लाभ हो सकता था?
हिमांशु- हां मुझे थोड़ा ज्यादा लाभ हो सकता था लेकिन मैं उस लाभ से कई ज्यादा चीजें इस दीवार पत्रिका से सीख रहा हूं जो मेरे भविष्य के लिए आवश्यक हैं।
प्रश्न-आखिर इससे आपको ऐसे क्या लाभ हुए हैं?
हिमांशु-दीवार पत्रिका के संपादन से मेरे व्यक्तित्व को अनेक लाभ हुए। पहले मैं किसी बात को बढ़ा-चढ़ाकर एक पन्ना भी नहीं लिख पाता था लेकिन आज मैं किसी भी विषय पर लिख सकता हूं। मुझे संपादन हेतु अनेक रचनाएं प्राप्त होती हैं जिन्हें पढ़कर प्रकाशित करना होता है जिससे मुझे अलग-अलग बातें पढ़ने को मिलती हैं जो मेरे ज्ञान को बढ़ातेे हैं।दीवार पत्रिका में स्कूली शिक्षा के विषय आने के कारण मुझे अपनी स्कूली शिक्षा में दिक्कत नहीं होती है। आज दीवार पत्रिका के कारण मेरे आत्मविश्वास में वृद्धि हुई है। पहले में किसी से भी कुछ पूछने में हिचकिचाता था लेकिन आज मैं किसी का भी इंटव्यू लूं ,मैं नहीं हिचकिचाता हूं। पहले मैं बाजार जाता था तो कोई भी किताब या बाल पत्रिकाएं नहीं लाता था। आज मुझे बिना पढ़े मन नहीं लगता। मुझे लगता है कि ज्यादा से ज्यादा किताब पढंू और अपने ज्ञान को बढ़ाऊं।
प्रश्न-दीवार पत्रिका के संपादन में आपको क्या-क्या कठिनाइयां आती हैं?
हिमांशु-किसी भी पत्रिका का कोई भी संपादक हो उसे अपनी पत्रिका में एक न एक कठिनाई आती है। उसी प्रकार दीवार पत्रिका में मुझे भी आई। पहली,दीवार पत्रिका में कम रचनाएं आती हैं जिससे उन्हीं रचनाओं का प्रकाशित करना पड़ता है।दूसरी, मुझे समय कम मिलता है जिससे इसे बनाने में बिलंब हो जाता है। तीसरी, कुछ रचनाएं खराब लेखों में होने के कारण उन्हें दुबारा लिखवाना पड़ता है जिससे अधिक समय खर्च होता है। चैथा, पूरे संपादक मंडल का सहयोग न मिल पाने के कारण पत्रिका तैयार करने में अधिक समय लगता है।
प्रश्न-अन्य बच्चों को इससे क्या लाभ होता है?
हिमांशु-बच्चे इसे हंसी-मजाक में पढ़तेे हैं जिससे रचनाएं उन्हें जल्दी याद हो जाती हैं। इससे बच्चों में प्रतिस्पर्धा भी होती है कि मेरा भी नाम आए।इसमें अनेक प्रतियोगिताओं के होने के कारण बच्चे इसमें भाग लेते हैं और उन्हें प्रतियोगिता कैसे देते हैं ?यह भी पता चलता है। प्रतियोगिता को जीतने के लिए वे किताब भी पढ़ते हैं जिससे ज्ञान बढ़ता है व दिमाग का इस्तेमाल होता है।
प्रश्न-दीवार पत्रिका के प्रति सहपाठियों की प्रतिक्रिया कैसी रहती है?
हिमांशु- दीवार पत्रिका के प्रति सहपाठियों की अच्छी प्रतिक्रिया है। वे भी इसमें बढ़चढ़ कर भाग लेते हैं। इसका सदस्य बनना चाहते हैं। उनका कहना है कि जिस प्रकार लोगों की प्रिंटिंग पत्रिका होती है ,उसी प्रकार दीवार पत्रिका हस्त लिखित पत्रिका है।
प्रश्न- क्या आपके घर वालों को भी दीवार पत्रिका के बारे में पता है तथा उनकी क्या प्रतिक्रिया है?
हिमांशु-हां। मेरे घर वालों को इस दीवार पत्रिका के कार्य के बारे में पता है। उनका कहना है कि पहले स्कूली पढ़ाई होती है फिर अन्य पढ़ाई। तुम इसके साथ-साथ स्कूली पढ़ाई पर भी ध्यान देना।
प्रश्न- दीवार पत्रिका को लेकर आपकी भविष्य की क्या योजनाएं हैं?
हिमांशु- भविष्य में दीवार पत्रिका ऐसी हो जिसमें कोई भी गलती न हो व उसकी सभी रचनाएं कंप्यूटराइज्ड हों। बनेगी वह चार्टों में ही लेकिन रचनाएं कंप्यूटराइज्ड हो और मेरे पास मेहनती संपादक मंडल हो।
No comments:
Post a Comment