दीवार पत्रिका से
कवि-शिक्षक चितांमणि जोशी उन साथियों में से हैं जिनका दीवार पत्रिका अभियान को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने न केवल अपने विद्यालय में दीवार पत्रिका प्रारम्भ की बल्कि अन्य शिक्षक साथियों को भी इस अभियान से जोड़ा और आज भी इस दिशा में निरंतर प्रयासरत हैं। वह बच्चों की रचनात्मकता को दिशा देने का कोई भी अवसर हाथ से जाने नहीं देते हैं।हमेशा कुछ नया सोचते रहते हैं और बच्चों को कुछ नया करने के लिए निरंतर प्रोत्साहित करते रहते हैं।प्रस्तुत है उनके प्रोत्साहन का परिणाम-
मेरा बगीचा
मेरा बगीचा सबसे न्यारा
उसमें उगते पेड़ अनेक,
पेड़ों पर लगते मीठे फल
जी ललचाता उनको देख।
बाग में खिलते सुंदर फूल
पूरा बगीचा जगमगाता
फूलों पर तितली मंडराती
मेरा भैया खुश हो जाता।
रश्मि खेड़ा
कक्षा-7
राजकीय इण्टर कालेज, गौड़ीहाट
चिड़िया
मीठे-मीठे गीत सुनाती
चीं-चीं, चूं-चूं करती चिड़िया,
रोज सवेरे चहक-चहक कर
सबकी नींद उड़ाती चिड़िया।
भूख लगे या प्यास लगे
सबको गीत सुनाती चिड़िया,
रोज सवेरे रोज शाम को
इधर-उधर मंडराती चिड़िया।
मेहनत से तिनके चुन-चुन कर
घोंसला एक बनाती चिड़िया,
उस पर कोई पत्थर मारे
बहुत दुखी हो जााती चिड़िया।
दुंनियां को वह खूब हंसाती
कितनी भोली प्यारी चिड़िया,
जो भी उसको दाना देता
उसको गीत सुनाती चिड़िया।
आकांक्षा कापड़ी
कक्षा-8
राजकीय इण्टर कालेज, टोटानौला
नीला चली ससुराल
नीला एक छोटी लड़की थी। दो साल पूर्व घास काटते समय उसकी माँ की पहाड़ी चट्टान से फिसलकर मौत हो गई थी। नीला बहुत दुखी हुई। लेकिन उसके पिताजी के प्यार ने धीरे-धीरे उसके दुख को कम कर दिया। लेकेन इस फागुन में नीला के पिताजी ने फिर से अपना विवाह कर लिया। घर में सौतेली माँ आ गई। वह नीला को तरह-तरह से परेशान करती थी। एक दिन सौतेली माँ ने बेवजह उसको बहुत पीटा तो नीला रोते-रोते घर से जंगल की ओर चली गई। उसे वहाँ एक आदमी मिला। उसका नाम गणेश था। उसके कोई बेटा-बेटी नहीं थे। बच्चे की चाह में गणेश की पत्नी भी दुखी रहती थी। गणेश ने नीला से पूछा, ‘‘ तुम इस जंगल में क्या कर रही हो, बेटी ? जंगल में बाघ-भालू होते हैं। तुम छोटी बच्ची हो।’’ नीला ने अपनी दुख भरी कहानी सुनाई। गणेश को बहुत बुरा लगा। उसे बच्ची पर दया आई। उसने पूछा, ‘‘ बेटी! अब तुम क्या करोगी ? क्या मैं तुम्हें तुम्हारे घर पहुँचा दूँ ?’’ नीला फूट-फूट कर रोने लगी। उसने गणेश से कहा, ‘‘ क्या मैं आपके साथ चल सकती हूँ ? ’’ गणेश चाहता था कि उसकी भी एक बेटी हो। वह खुश होकर बोला,‘‘ हाँ,हाँ क्यों नहीं।’’
नीला गणेश के साथ उसके घर चली गई। नीला ने देखा कि वह एक सुन्दर गाँव में आ गई है। वह बहुत खुश थी। गणेश और उसकी पत्नी भी बहुत खुश थे। उन्होंने नीला को गाँव के स्कूल में पढ़ने भेजा।
नीला बड़ी हो गई। वह बहुत सुन्दर और सुशील थी। गणेश को अब उसके विवाह की चिन्ता सताने लगी। एक दिन पड़ोस के गाँव से हीरा सिंह अपने बेटे का रिश्ता लेकर गणेश के पास आया। लड़का सेना में सिपाही था। छुट्टी पर घर आया था। गणेश ने हाँ कर दी। दस दिन बाद धूम-धाम से नीला की शादी हो गई। नीला हंसी-खुशी अपनी ससुराल चली गई।
शैलजा कापड़ी
कक्षा- 8
राजकीय इण्टर कालेज, टोटानौला
कवि-शिक्षक चितांमणि जोशी उन साथियों में से हैं जिनका दीवार पत्रिका अभियान को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने न केवल अपने विद्यालय में दीवार पत्रिका प्रारम्भ की बल्कि अन्य शिक्षक साथियों को भी इस अभियान से जोड़ा और आज भी इस दिशा में निरंतर प्रयासरत हैं। वह बच्चों की रचनात्मकता को दिशा देने का कोई भी अवसर हाथ से जाने नहीं देते हैं।हमेशा कुछ नया सोचते रहते हैं और बच्चों को कुछ नया करने के लिए निरंतर प्रोत्साहित करते रहते हैं।प्रस्तुत है उनके प्रोत्साहन का परिणाम-
मेरा बगीचा
मेरा बगीचा सबसे न्यारा
उसमें उगते पेड़ अनेक,
पेड़ों पर लगते मीठे फल
जी ललचाता उनको देख।
बाग में खिलते सुंदर फूल
पूरा बगीचा जगमगाता
फूलों पर तितली मंडराती
मेरा भैया खुश हो जाता।
रश्मि खेड़ा
कक्षा-7
राजकीय इण्टर कालेज, गौड़ीहाट
चिड़िया
मीठे-मीठे गीत सुनाती
चीं-चीं, चूं-चूं करती चिड़िया,
रोज सवेरे चहक-चहक कर
सबकी नींद उड़ाती चिड़िया।
भूख लगे या प्यास लगे
सबको गीत सुनाती चिड़िया,
रोज सवेरे रोज शाम को
इधर-उधर मंडराती चिड़िया।
मेहनत से तिनके चुन-चुन कर
घोंसला एक बनाती चिड़िया,
उस पर कोई पत्थर मारे
बहुत दुखी हो जााती चिड़िया।
दुंनियां को वह खूब हंसाती
कितनी भोली प्यारी चिड़िया,
जो भी उसको दाना देता
उसको गीत सुनाती चिड़िया।
आकांक्षा कापड़ी
कक्षा-8
राजकीय इण्टर कालेज, टोटानौला
नीला चली ससुराल
नीला एक छोटी लड़की थी। दो साल पूर्व घास काटते समय उसकी माँ की पहाड़ी चट्टान से फिसलकर मौत हो गई थी। नीला बहुत दुखी हुई। लेकिन उसके पिताजी के प्यार ने धीरे-धीरे उसके दुख को कम कर दिया। लेकेन इस फागुन में नीला के पिताजी ने फिर से अपना विवाह कर लिया। घर में सौतेली माँ आ गई। वह नीला को तरह-तरह से परेशान करती थी। एक दिन सौतेली माँ ने बेवजह उसको बहुत पीटा तो नीला रोते-रोते घर से जंगल की ओर चली गई। उसे वहाँ एक आदमी मिला। उसका नाम गणेश था। उसके कोई बेटा-बेटी नहीं थे। बच्चे की चाह में गणेश की पत्नी भी दुखी रहती थी। गणेश ने नीला से पूछा, ‘‘ तुम इस जंगल में क्या कर रही हो, बेटी ? जंगल में बाघ-भालू होते हैं। तुम छोटी बच्ची हो।’’ नीला ने अपनी दुख भरी कहानी सुनाई। गणेश को बहुत बुरा लगा। उसे बच्ची पर दया आई। उसने पूछा, ‘‘ बेटी! अब तुम क्या करोगी ? क्या मैं तुम्हें तुम्हारे घर पहुँचा दूँ ?’’ नीला फूट-फूट कर रोने लगी। उसने गणेश से कहा, ‘‘ क्या मैं आपके साथ चल सकती हूँ ? ’’ गणेश चाहता था कि उसकी भी एक बेटी हो। वह खुश होकर बोला,‘‘ हाँ,हाँ क्यों नहीं।’’
नीला गणेश के साथ उसके घर चली गई। नीला ने देखा कि वह एक सुन्दर गाँव में आ गई है। वह बहुत खुश थी। गणेश और उसकी पत्नी भी बहुत खुश थे। उन्होंने नीला को गाँव के स्कूल में पढ़ने भेजा।
नीला बड़ी हो गई। वह बहुत सुन्दर और सुशील थी। गणेश को अब उसके विवाह की चिन्ता सताने लगी। एक दिन पड़ोस के गाँव से हीरा सिंह अपने बेटे का रिश्ता लेकर गणेश के पास आया। लड़का सेना में सिपाही था। छुट्टी पर घर आया था। गणेश ने हाँ कर दी। दस दिन बाद धूम-धाम से नीला की शादी हो गई। नीला हंसी-खुशी अपनी ससुराल चली गई।
शैलजा कापड़ी
कक्षा- 8
राजकीय इण्टर कालेज, टोटानौला
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