यूनिट टेस्ट चल रहे थे। पाँचवे वादन में कक्षा नौ में हिंदी का टेस्ट था। मैंने पहले से कोई पेपर तैयार नहीं किया था । कक्ष में प्रवेश करने के बाद ही इस पर सोचा। खयाल आया क्यों न कुछ ऐसा किया जाय जिसमें बच्चों को भी आनंद आए और मुझे भी । साथ ही बच्चों के भीतर झाँकने का अवसर भी मिले । बच्चों को मैंने कहा कि आज उन्हें अपने जीवन के एक ऐसे प्रसंग के बारे में लिखना है जब उन्हें बहुत खुशी हुई या फिर बहुत रोना आया। इस विषय को सुनकर पहले तो बच्चे मेरे मुँह की ओर ही देखते रहे शायद उनको विश्वास ही नहीं हुआ कि टेस्ट में ऐसा भी कोई प्रश्न पूछा जा सकता है । मेरे द्वारा प्रश्न को दोहराने के बाद उन्होंने जब लिखना शुरू किया कि वे घंटी की आवाज भी नहीं सुन पाए। किसी विषय पर मुश्किल से भी एक पेज नहीं लिख पाने वाले बच्चों ने दो-दो , तीन-तीन पेज लिख डाले । समय समाप्त होने के बाद भी लिखने के लिए कुछ और समय की माँग करने लगे। आश्चर्य कि उस पूरे समय में अगल-बगल झाँकना तो दूर किसी ने सिर तक नहीं उठाया । ऐसी एकाग्रता और निस्तब्धता मुझे अपनी उस कक्षा में पहली बार दिखाई दी। बच्चों द्वारा लिखी इन उत्तर पुस्तिकाओं को जाँचते हुए ऐसी ही कुछ स्थिति मेरी भी थी । उत्तर पुस्तिकाओं को जाँचते हुए इतना आनंद मुझे शायद ही पहले कभी आया हो मुझे याद नहीं पड़ता। बच्चों ने अपने गुजरे दिनों के इतने रोचक एवं मार्मिक संस्मरण लिखे थे कि मुझे किसी बाल उपन्यास को पढ़ने का सा आनंद आता रहा। बच्चे अपने आसपास की दुनिया को किस तरह से देखते-समझते हैं ? बड़ों का कौनसा व्यवहार उन्हें किस तरह से प्रभावित करता है ? आदि बातों को जानने-समझने का अवसर मिला। प्रस्तुत है एक संस्मरण जिसे विद्यालय की दीवार पत्रिका के एक अंक में भी प्रकशित किया गया-
जब मुझे बहुत रोना आया
-संदीप कुमार कक्षा-9
तब मैं कक्षा दो में पढ़ता था।मेरा दोेस्त पंकज हुआ करता था। वह मुझसे दुगना शरारती था। एक दिन मेरे साथ एक लड़के की लड़ाई हुई। मैंने उसे खूब पीटा।जब मैं घर पहुंचा तो मम्मी को पहले ही पता चल गया था कि मंैने लड़ाई की है। मम्मी ने हाथ में छड़ी पकड़ी हुई थी और आग बबूला हो रही थी। मैंने आव देखा न ताव और बैग फंेककर भाग गया। तभी रास्ते में मुझे पंकज मिल गया। हम दोनों सड़क पर ही खेलने लग गए। तभी कहीं से बैंड-बाजे की आवाज सुनाई दी। हम नाचने लगे। उसी समय पटवारी स्कूटर से हमारे गांव को जा रहा था। जहां पर हम नाच रहे थे ,उसने वहीं पर अपना स्कूटर खड़ा कर दिया।वह चला गया। हम दोनों नाचतेे-नाचते स्कूटर में चढ़ गए। पता नहीं क्या हुआ,स्कूटर गिर गया।पंकज भाग गया लेकिन मेरा पांव वहां फंस गया। जैसे-तैसे मैंने पांव तो निकाल लिया लेकिन मेेरा चप्पल वहीं फंस गया। उसी समय पटवारी वहां पहुंच गया। मैं घर की ओर भागा। वहां मम्मी और यहां पटवारी। मैं क्या करता। मम्मी ने ज्यूंही मुझे पकड़ा ,पटवारी वहां पहंुच गया। उसने सारी बात मम्मी को बता दी। मम्मी ने मुझे बहुत मारा। खाना-पीना भी कुछ नहीं दिया।दस दिन तक बातें सुनाती रही। मुझे इतना रोना आया कि मैं बीमार पड़ गया। मुझे अस्पताल एडमिट करना पड़ा। जब मैं ठीक हुआ तो बहुत सुस्त हो गया लेकिन मेेरी आदत नहीं सुधरी। स्कूल जाते ही मैंन पंकज की पिटाई कर दी। उसे एडमिट करना पड़ा।मम्मी ने मुझे भी एडमिट कर दिया। परंतु जब हम दोनांे ठीक हुए तो हम दोनों की आदत सुधर गई।मैंने शरारत छोड़ दी। मुझे सब अच्छा लड़का कहने लगे। मैं होशियार होने लगा। मैं पंकज का साथ छोड़ सूरज के साथ रहनेे लगा क्योंकि वह बहुत होशियार और अच्छा लड़का था।
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