पू0 मा0 वि0 आऊ की ‘बाल झंकार’
शैक्षिक संवाद मंच के संयोजक प्रमोद दीक्षित ‘मलय’ ‘दीवार पत्रिकाः एक अभियान’ के एक सशक्त एवं समर्पित साथी हैं जो इस अभियान को बांदा जिले में स्कूल-स्कूल तक ले जाने के लिए पूरी कटिबद्धता से लगे हुए हैं। पहली बार वहां दीक्षित जी ने ही अपने मंच के माध्यम से शिक्षकों को दीवार पत्रिका से परिचित कराया।इस उद्देश्य से उन्होंने शिक्षकों के साथ कार्यशाला भी आयोजित कीं। अभी तक वह बीस से अधिक विद्यालयों में दीवार पत्रिका शुरू करवाने में सफल रहे हैं। विद्यालय-विद्यालय जाकर वह शिक्षकों को प्रेरित और उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं।समय-समय पर दीवार पत्रिका से जुड़ी गतिविधियों के बारे में उनसे फेसबुक और दूरभाष से बातचीत होती रहती है।उनके उत्साह को देखकर एक नई ऊर्जा मिलती है।इतना ही नहीं शिक्षा से जुड़े साहित्य और पत्रिकाओं को भी शिक्षकों तक पहुंचाने में अपनी भूमिका का निर्वहन करते हैं। आज उन्होंने पू0 मा0 वि0 आऊ क्षेत्र नरैनी (बाँदा) की दीवार पत्रिका ‘बाल झंकार’ के नए अंक की समीक्षा हमें लिख भेजी है। हम उनके बहुत आभारी हैं। दीवार पत्रिका अभियान से जुड़े अन्य साथियों से हमारा विनम्र अनुरोध रहेगा कि आप भी अपने विद्यालय या अन्य विद्यालयों से निकल रही दीवार पत्रिकाओं के बारे में इसी तरह विस्तार से लिख भेजें ताकि इस अभियान से जुड़ने वाले नए साथियों को पता चल सके कि दीवार पत्रिका में क्या-क्या सामग्री दी जा सकती है? इससे बाल संपादकों को भी नई दिशा मिलेगी।
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शैक्षिक संवाद मंच, अतर्रा (बाँदा) से जुड़े शिक्षक साथी श्री चन्द्रशेखर सेन, स0 अ0, अपने पू0 मा0 वि0 आऊ क्षेत्र नरैनी (बाँदा) में पिछले 6 महीने से दीवार पत्रिका पर बच्चों के साथ काम कर रहे हैं। वह ‘बाल झंकार‘ नाम से मासिक दीवार पत्रिका निकाल रहे हैं। अभी 21.12. 2014 को दिसम्बर अंक का विमोचन हुआ। प्रधान संपादक खुशबू कक्षा 8 ने संपादकीय में पाकिस्तान के स्कूल में आतंकवादियों द्वारा की गई बच्चों की हत्या की निन्दा करते हुए दुख व्यक्त किया है। गुड़िया कक्षा 7 दीवार पत्रिका पर अपने अनुभव में लिखा है कि पत्रिका बनाना बहुत अच्छा लगता है। इससे लिखने का अभ्यास होता है और नई-नई चीजें सीखते हैं। ‘सब पढे़ं-सब बढ़ें’ लिखते हुए बीच में एक फूल बनाया गया है। वहीं एक जगह रेडियो सुनते हुए माँ द्वारा लड़की को पढ़ते हुए दिखाया गया है जो बालिका शिक्षा के महत्व को उभारने की एक कोशिश है। नया ासाल आने वाला है, इसीलिए रीता ने happy new year लिखकर सबको नववर्ष की बधाई दी है। क्रिसमस के अवसर का ध्यान रखते हुए सेंटाक्लाज को भी स्थान मिला है। एक सुखी घर की कल्पना का मनोहारी चित्र है। सोना,नीता और ममता ने कविताएं लिखीं हैं। मोना कक्षा 6 ने एक चुटकुला लिख हंसाने प्रयास किया है। सोनी कक्षा 7 ने ‘समाचार‘ के अन्तर्गत गाँव की समस्याओं को उठाते हुए साफ सफाई की ओर संकेत किया है। इनके साथ साथ पहेलियाँ हैं और मीना मंच की मजेदार बातें भी। कुल मिलाकर इस दीवार पत्रिका में काफी कुछ समेटने का प्रयास किया गया है। चन्दशेखर जी अपना अनुभव बाँटते हुए कहते हैं कि अब बच्चों में एक समझ पैदा हो गई है। इस काम से स्कूल में अनुशासन भी आया है। बच्चों में जिम्मेदारी और उत्साह दिखता है। उनमें आत्मविश्वास का भाव आया है कि वे कुछ नया कर सकते हैं। एक बात वह और जोड़ते हैं कि इस काम से मैं बच्चों को समझने लगा हूॅं। आगे जनवरी 15 से दीवार पत्रिका का प्रकाशन पाक्षिक करने वाले हैं।
शैक्षिक संवाद मंच के संयोजक प्रमोद दीक्षित ‘मलय’ ‘दीवार पत्रिकाः एक अभियान’ के एक सशक्त एवं समर्पित साथी हैं जो इस अभियान को बांदा जिले में स्कूल-स्कूल तक ले जाने के लिए पूरी कटिबद्धता से लगे हुए हैं। पहली बार वहां दीक्षित जी ने ही अपने मंच के माध्यम से शिक्षकों को दीवार पत्रिका से परिचित कराया।इस उद्देश्य से उन्होंने शिक्षकों के साथ कार्यशाला भी आयोजित कीं। अभी तक वह बीस से अधिक विद्यालयों में दीवार पत्रिका शुरू करवाने में सफल रहे हैं। विद्यालय-विद्यालय जाकर वह शिक्षकों को प्रेरित और उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं।समय-समय पर दीवार पत्रिका से जुड़ी गतिविधियों के बारे में उनसे फेसबुक और दूरभाष से बातचीत होती रहती है।उनके उत्साह को देखकर एक नई ऊर्जा मिलती है।इतना ही नहीं शिक्षा से जुड़े साहित्य और पत्रिकाओं को भी शिक्षकों तक पहुंचाने में अपनी भूमिका का निर्वहन करते हैं। आज उन्होंने पू0 मा0 वि0 आऊ क्षेत्र नरैनी (बाँदा) की दीवार पत्रिका ‘बाल झंकार’ के नए अंक की समीक्षा हमें लिख भेजी है। हम उनके बहुत आभारी हैं। दीवार पत्रिका अभियान से जुड़े अन्य साथियों से हमारा विनम्र अनुरोध रहेगा कि आप भी अपने विद्यालय या अन्य विद्यालयों से निकल रही दीवार पत्रिकाओं के बारे में इसी तरह विस्तार से लिख भेजें ताकि इस अभियान से जुड़ने वाले नए साथियों को पता चल सके कि दीवार पत्रिका में क्या-क्या सामग्री दी जा सकती है? इससे बाल संपादकों को भी नई दिशा मिलेगी।
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