एक दिन कक्षा 12 मंे हिंदी के वादन में शमशेर बहादुर सिंह की ‘उषा’ कविता पढ़ा रहा था ,उसके अभ्यास कार्य के अंतर्गत बच्चों से कविता बनाकर कक्षा में काव्य पाठ का आयोजन करने संबंधी एक गतिविधि थी।मुझे अच्छा अवसर मिल गया। प्रातःकालीन दृश्य पर एक कविता लिखनी थी। मैंने बच्चों से लिखने को कहा। कुछ बच्चों ने अच्छी कविताएं लिखी। मैंने उन्हें कुछ सुझाव देते हुए अगले दिन पुनः घर से लिख लाने को कहा। दूसरे दिन बहुत सारे बच्चे अच्छी-अच्छी कविताएं तैयार कर लाए। कक्षा में काव्य पाठ का आयोजन किया गया। मैंने सारी कविताएं जमा करवा ली। उन कविताओं से दीवार पत्रिका ‘नवांकुर’ का दूसरा अंक काव्य विशेषांक के रूप में निकाला गया।
‘विश्व कविता दिवस’ के दिन कुछ शिक्षकों और अभिभावकों की उपस्थिति में इन कविताओं का काव्यपाठ भी करवाया गया। बाल कवियों ने बहुत सुंदर ढंग से अपनी कविताओं का पाठ किया। प्रस्तुत हैं उनमें से कुछ कविताएं-
उमंग की एक किरण
- कल्पना बसेड़ा
प्रातः नभ में उमंग भर दे
अंधकार को त्याग जीवन में उजियारा कर दे ।
अपनी सुंदर जीवंत किरणों से
संसार में उजियारा कर दे।
अपनी किरणों को संसार में फैला कर
संसार को तू पावन कर दे।
सुबह-सवेरे
- दीपक सिंह सामंत
प्रातः अंबर होता सुनहरा निराला
धरती पर घटाओं ने ऐसा डेरा डाला
मानो हो गया है धरती के कण-2 में गीला
चारों ओर पवन का हो गया बसेरा।
हर पत्ती डाली झूम रही है
ऐसा लगता है जैसे हो समंदर का किनारा
मग्न हैं सभी इस सुनहरी पुरवाई में
झूम रहा हो जैसे जग सारा ।
पनघट आँखें खोल रहा हो
मानो जगमगाने को हो जग सारा
गगन अब बोल रहा हो
सूर्योदय होने को है
आया है एक नया सवेरा ।
मनमोहक सवेरा
- नीरज रावत
बीती रात हुआ सवेरा
सूरज देखो प्यार-प्यारा
हो तैयार मंजिल पाने को
ढूँढ रहे सब जाने को
है कठिन मंजिल को पाना
लेकिन तुमको है चलते जाना
हर सवेरा एक नया रंग लाता
जीवन का सुख हमें सिखाता।
नया सवेरा
- पूजा बसेड़ा
दूर हुआ सुनसान-सा अंधेरा
संसार-दर्पण में छा गया प्रकाश
मोती-सा दमकता
खिल-खिला रही हैं ओस की बूँदें
जल-थल सब सज-संवर कर
जैसे कर रहा पहली किसी का इंतजार
जिसे देखने को तरस गयी थी
आँखें सालो-साल ।
धरती ने कर लिया अपना साज-श्रंृगार
चिड़ियाँ गा रही है स्वागत गीत
फूलों ने बिखरा दी महकती खुशबू
तितलियाँ उड़ती-2 संदेश देती फिर रही
जागो नया सवेरा आ गया ।
उषा
- विनीता कोटिया
चाँद छुपा तारे डूबे
आया उमंग का एक नया सवेरा
सज-धज अपनी लालिमा संग।
ज्यों ही सूर्य की पहली किरण
पड़ती उस अटके जल पर
जो रात भर वही पड़ा
वह लगता मोती जैसा
जाएगा सूरज की लाली के संग
दूर आसमान में
जैसे मेरी नजर पड़ी उस पर
लगाता ऐसा
किसी हरी चादर पर
गिर पड़ा इक मोती का दाना
निकल गया देखो पूरा सूरज
चाँद छुपा तारे डूबे ।
राजकीय इंटर कालेज देवलथल जिला -पिथोरागढ़ .
‘विश्व कविता दिवस’ के दिन कुछ शिक्षकों और अभिभावकों की उपस्थिति में इन कविताओं का काव्यपाठ भी करवाया गया। बाल कवियों ने बहुत सुंदर ढंग से अपनी कविताओं का पाठ किया। प्रस्तुत हैं उनमें से कुछ कविताएं-
उमंग की एक किरण
- कल्पना बसेड़ा
प्रातः नभ में उमंग भर दे
अंधकार को त्याग जीवन में उजियारा कर दे ।
अपनी सुंदर जीवंत किरणों से
संसार में उजियारा कर दे।
अपनी किरणों को संसार में फैला कर
संसार को तू पावन कर दे।
सुबह-सवेरे
- दीपक सिंह सामंत
प्रातः अंबर होता सुनहरा निराला
धरती पर घटाओं ने ऐसा डेरा डाला
मानो हो गया है धरती के कण-2 में गीला
चारों ओर पवन का हो गया बसेरा।
हर पत्ती डाली झूम रही है
ऐसा लगता है जैसे हो समंदर का किनारा
मग्न हैं सभी इस सुनहरी पुरवाई में
झूम रहा हो जैसे जग सारा ।
पनघट आँखें खोल रहा हो
मानो जगमगाने को हो जग सारा
गगन अब बोल रहा हो
सूर्योदय होने को है
आया है एक नया सवेरा ।
मनमोहक सवेरा
- नीरज रावत
बीती रात हुआ सवेरा
सूरज देखो प्यार-प्यारा
हो तैयार मंजिल पाने को
ढूँढ रहे सब जाने को
है कठिन मंजिल को पाना
लेकिन तुमको है चलते जाना
हर सवेरा एक नया रंग लाता
जीवन का सुख हमें सिखाता।
नया सवेरा
- पूजा बसेड़ा
दूर हुआ सुनसान-सा अंधेरा
संसार-दर्पण में छा गया प्रकाश
मोती-सा दमकता
खिल-खिला रही हैं ओस की बूँदें
जल-थल सब सज-संवर कर
जैसे कर रहा पहली किसी का इंतजार
जिसे देखने को तरस गयी थी
आँखें सालो-साल ।
धरती ने कर लिया अपना साज-श्रंृगार
चिड़ियाँ गा रही है स्वागत गीत
फूलों ने बिखरा दी महकती खुशबू
तितलियाँ उड़ती-2 संदेश देती फिर रही
जागो नया सवेरा आ गया ।
उषा
- विनीता कोटिया
चाँद छुपा तारे डूबे
आया उमंग का एक नया सवेरा
सज-धज अपनी लालिमा संग।
ज्यों ही सूर्य की पहली किरण
पड़ती उस अटके जल पर
जो रात भर वही पड़ा
वह लगता मोती जैसा
जाएगा सूरज की लाली के संग
दूर आसमान में
जैसे मेरी नजर पड़ी उस पर
लगाता ऐसा
किसी हरी चादर पर
गिर पड़ा इक मोती का दाना
निकल गया देखो पूरा सूरज
चाँद छुपा तारे डूबे ।
राजकीय इंटर कालेज देवलथल जिला -पिथोरागढ़ .
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