Wednesday, 15 October 2014

नन्हे-मुन्नों की कल्पनाशीलता का अनूठा दस्तावेज

  साहित्य हो या शिक्षा का क्षेत्र रेखा चमोली ने अपने काम से अपनी पहचान बनायी है। उनका काम ही था जिसके चलते आमिर खान के चर्चित शो ‘सत्यमेव जयते’ की टीम उत्तर काशी जैसे दूरस्थ जिले के प्राथमिक विद्यालय गणेशपुर पहुंची। मित्र बताते हैं कि उनके विद्यालय में आने वाला कोई भी व्यक्ति विद्यालय को देखकर ‘वाह’ कहे बिना नहीं रह सकता है। नवाचार और रेखा का चोली दामन का साथ है। नित नया सोचना और उसको धरातल पर उतारना जैसे उनकी आदत हो। उनके व्यक्तित्व की एक बड़ी बात है कि वह जिस काम को करने की ठान लेती हैं ,उसे पूरा करके ही दम लेती हैं। दीवार पत्रिका से जुड़ा उनका यह अनुभव इस बात को साबित करता है। प्राथमिक कक्षा के बच्चों के साथ दीवार पत्रिका निकालने का यह उपक्रम मेरी जानकारी में अकेला है। जिस सफलता से वह अपने विद्यालय में दीवार पत्रिका निकाल रही हैं वह उन तमाम लोगांे के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण है जो यह मानते हैं कि प्राथमिक कक्षा के बच्चों के साथ यह बहुत कठिन है। उनके विद्यालय में दीवार पत्रिका केवल निरंतर प्रकाशित ही नहीं हो रही है बल्कि उसकी गुणवत्ता भी प्रभावित करने वाली है। रेखा के इस प्रयास का ही परिणाम है कि उनके  विद्यार्थियों की रचनाएं ‘चकमक’ सहित अनेक स्तरीय बाल पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही हैं।उनकी इस सफलता के पीछे मैं उनके कविमन का भी योगदान देखता हूं। जो कल्पनाशीलता उनकी कविताओं में दिखाई देती है वही उनके शिक्षण में भी है। प्रस्तुत है दीवार पत्रिका से जुड़ा उनका यह महत्वपूर्ण अनुभव-   
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नन्हे-मुन्नों की कल्पनाशीलता का अनूठा दस्तावेज


*******************************************************                                              भाषा शिक्षण के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आवश्यक है कि बच्चों की पढने लिखने में रुची जगे।उन्हें पढना-लिखना बोझ ना लगे।पढने के समय बनी समझ का उपयोग वे लिखते समय कर रहे हों और स्वाभाविक रूप से पढने की ओर अग्रसर हों।बच्चे ऐसा तब कर पाते हैं जब उनके पढने लिखने की चीजें उनके स्तर ,रूचि व परिवेश की होती हैं।पाठ्य पुस्तक के अतिरिक्त अन्य सामाग्री व पुस्तकें भी इसमें मदद करती हैं।उदाहरण के लिए बच्चों की अपनी रचनाओं से बनी दीवार पत्र्ािका।
हमारे स्कूल में दीवार पत्र्ािका का जो स्वरूप आज है उसकी शुरूवात वर्ष 2009 में हुयी थी।अपनी एक लम्बी सृजनात्मक यात्र्ाा के बाद यह इस स्वरूप में आ पायी है।पहले हम इसे बाल पत्र्ािका के रूप में बनाते थे।इसे दीवार पत्र्ािका के रूप में बनाने का विचार तब मन में आया जब मैंने देखा कि दीवार पर लगी किसी पाठय सामाग्री की ओर स्वत ही बच्चों का ध्यान आकर्षित होता है। रोचक लगने पर वे उसे खुद तो पढते ही हैं अपने साथियों को भी पढाते-दिखाते हैं।इन पत्रिकाओं को बनवाने का मेरा उददेश्य यह था कि बच्चे अपने अनुभवोें व सीखी गयी बातों को लिख सकें , अपनी कल्पनाओं व तर्क क्षमता के आधार पर अपने अनुभवों व सीखी गयी बातों में नयी बात जोड सकें।बच्चे एक दूसरे की रचनाएं सुन-पढ सकें। उनकी अभिव्यक्ति ,अवलोकन ,कल्पना व तार्किक दक्षता का विकास हो।साथ ही उनमें आगे बढकर किसी काम को योजनाबद्व तरीके से करने की दक्षता का विकास हो।

बाल पत्र्ािका बनाने की शुरूवात 
अपनी भाषा की कक्षा में जब मैंने यह देखा कि बच्चे सिखाने पर अपनी कविता व कहानियां लिख रहे हैं तो मैंने बच्चों की रचनाओं का उपयोग संसाधन के तौर पर करना शुरू किया ।मैं उन्हें कुछ शब्द देती व उन्हें इन शब्दों से कविता या कहानी लिखने को कहती । शुरूवात में मैं बच्चों को खुद शब्दों से कविता या कहानी लिखकर बताती फिर कक्षा में मिली जुली कहानी या कविता लिखवाती और फिर बच्चे अपने अनुभवों के आधार पर लिखने लगते। इसके बाद बच्चे अपनी लिखी कविता या कहानी पर प्रश्न बनाते।बच्चे अपनी रचना को सजा कर उसका चित्र्ा बनाकर उसे दीवार पर लगाते जिसे बाकि बच्चे भी पढते।जब बच्चों की खूब सारी रचनाए आ गयी तो मैने इनसे  पहली बाल पत्र्ािका बना दी।
उपरोक्त गतिविधी का बच्चों के सीखने पर सकारात्मक प्रभाव पढता देख उनकी पढने लिखने में रूचि बढती देख मैंने इस तरह की अन्य गतिविधियों को अपने भाषा शिक्षण का स्थायी साथी बना दिया।और इस दौरान लिखी उनकी रचनाओं का उपयोग बाल पत्र्ािकाएं बनाने के लिये किया । जैसे शब्दों से कहानी लिखना, चित्र्ा पर कहानी लिखना, अधूरी कहानी पूरी करना , कविता लिखना, मिलजुल कर कहानी लिखना, कहानी पर नाटक खेलना, कहानी पर प्रश्न बनाना, मिलजुल कर पढना , अपनी पढी किताब और अपनी लिखी रचना के बारे मे बताना आदि जिनका मुख्य उद्देश्य अपनी बात कहना-लिखना ,दूसरे की बात सुनना -पढना व अपनी मौलिक रचना को बडे समूह में प्रस्तुत करना होता है।इसमे हम अपने पुस्तकालय का भी भरपूर उपयोग करते । ये सारा काम इतना सहज होता है कि लगता ही नहीं कुछ अतिरिक्त हो रहा हैै।मैं कभी -कभी सिर्फ बाल पत्र्ािकाएं बनाने के उद्देश्य से भी रचनात्मक लेखन करवाती हूॅ।इन पत्र्ािकाओं को बनाने के दौरान बच्चे भी मदद करते पर ज्यादातर काम मैं स्वंम करती। बच्चों की भागीदारी बढाने के लिए व इस सामाग्री तक प्रत्येक बच्चे की पहुॅच बनाने के लिए मैंने बाल पत्र्ािका को दीवार पत्र्ािका में बदलने की सोची व इसे प्रत्येक माह बनवाना शुरू किया।
जब बच्चों से इस बारे में बात की तो वे उत्साहित हुए।सबसे पहले पत्र्ािका के नाम पर चर्चा हुयी।काफी सारे नामों मंे से इन्द्रधनुष नाम पर सहमती हुयी ,यह बात भी आयी कि हर पत्र्ािका का नया नाम भी हो सकता है। पहली दीवार पत्र्ािका बनाते समय मैं बच्चों को हर चीज सिखाती रही जैसे चार्ट कैसे रखेगे ? सामाग्री को उचित स्थान कैसे देगें ?सामाग्री लगाते व चार्ट सजाते हुए किन किन बातों का ध्यान रखेगे आदि ।दूसरी बार से मैंने तीन संपादक नियुक्त किए जो हर बार नये बच्चे होते हैं।इनका काम संपादकीय लिखना, माह के समाचारों को समराइज करके लिखना , पत्र्ािका बनाने से लेकर उसे डिसप्ले बोर्ड पर लगाना होता है जिसमें मै इनकी मदद करती हॅॅू।

पत्र्ािका बनाने के लिए सबसे पहले मैं बच्चों को रचनाएं लिखने के लिए विषय देती हूॅ। बच्चे अपनी रचना मुझे दिखाते हैं ।मैं उन्हें आवश्यक सुझाव देती हॅू फिर बच्चे अपनी रचनाएं फेयर करते हैं व उसे चित्र्ाों से सजाते हैं । बच्चे आपस में भी एक दूसरे की मदद करते हैं।इसमें कक्षा 4 व 5 के  सभी बच्चे शामिल होते हैं। सारे बच्चों की रचनाए आ जाने पर इन रचनाओं को चार्ट पेपर पर लगाया जाता है । फिर इन चार्ट पेपरस को डिसप्ले बोर्ड पर लगा दिया जाता है । इसके बाद प्रत्येक बच्चा अपनी रचना को पढता या सुनाता है। और फिर इसे सभी बच्चों के पढने के  लिए रख दिया जाता है।एक बार की पत्र्ािका बनाने के लिए 3 चार्ट पेपर लगते है। रंग ,स्कैच पैन व ए 4 साइज के पेपर आदि को लेकर कुल 40 से 50 रू खर्च होते हैं जो मैं ही करती हॅू।अभी तक हम 7 अंक निकाल चुके हैं।बच्चे अपनी रचना को सुबह की सभा में भी सुनाते है।इस सारे काम को लेकर बच्चों खूब उत्साह रहता है ज्यों ज्यों बच्चे अपने आप सारा काम देख रहे है उनके काम में ज्यादा रचनात्मकता व कार्यकुशलता बढ रही है।मेरी साथी शिक्षिका को भी लगता है कि ये काम बच्चोें को स्वाभाविक रूप से पढने लिखने को प्रेरित करता है। स्कूल में आने वाले आगंतुक व अभिभावक भी इसे पसंद करते है। बच्चे भी गर्व व पूरे आत्मविश्वास से अपनी रचनाओं व प्रकिया के बारे मंे बताते है।
दीवार पत्र्ािका बनाने के दौरान हुयी गतिविधियां भाषायी दक्षताआंे के विकास में तो निसंदेह सहायक हैं ही साथ ही हम इसे किसी संबोध पर आधारित कर अन्य विषयों से भी जोड सकते हैं जैसे -हमने माह सितम्बर 14 में अपनी पत्र्ािका का विषय बाल शोध मेला रखा । बच्चों ने 5 सितम्बर को अपने स्कूल में एक बाल शोध मेले का आयोजन किया था जिसके लिए उन्होंने साल भर अपने गाॅव व आसपास के पेड पौधांे का सूक्ष्म अवलोकन किया ।मेले के बाद बच्चों ने पूरी प्रकिया पर अपने अनुभव लिखे। इन अनुभवों को हमने अपनी पत्र्ािका में शामिल किया ।इसी तरह अगस्त के अंक में रोपाई के अनुभवों को स्थान दिया था।
हम कहाॅ पहुॅचे
आज जब मैं अपने बच्चों को देखती हॅू तो उन्हें ज्यादा मुखर , आत्मविश्वासी ,स्वयं पढने व सीखने को उत्सुक व स्कूल की हर गतिविधि में भाग लेने को तैयार पाती हॅू। उन्हें चुनौतियां स्वीकार होती हैं।वे मिलजुल कर पढते व सीखते हैं और उनमें कहीं भी कम या ज्यादा का भाव नहीं आता।बच्चे सहजता से अपने काम करते हैं।
दीवार पर लगायी सामागी्र को छोटे बच्चे भी अंदाजे से पढते हैं। वे उसे अपने साथियों के साथ मिलकर समझने का प्रयास करते हैं। बहुत सारी चीजें वे बडे बच्चों को काम करता हुआ देखकर सीखते हैं। किसी काम को शुरू करते हुए बच्चे अपने सुझाव भी देते हैं। दीवार पत्रिका बनाने का काम बच्चे अपनेआप करते हैं ।मैं  उनकी मदद करती हूॅ।बच्चे यह भी सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक बच्चे की रचना पत्रिका में शामिल हो।रचनाओं के सुधार में वे एक दूसरे की मदद करते हैं।
इस दौरान बच्चांे की रचनाएं विभिन्न पत्रिकाओं में भी छपती रही हैं।  जैसे चकमक, बाल प्रहरी आदि। आज मुझे लगता है कि मैंने जिन उद्देश्यों को ंलेकर बाल/ दीवार पत्रिका बनानी शुरू की थी वे पूरे हुए हैं।हमारी भाषा की कक्षा और समृद्व हुयी है और इसमें निरन्तर सीखना-सिखाना जारी है।दीवार पत्र्ािका पर काम जारी है और मुझे उम्मीद है कि इसमें नये नये विषय जुडते रहेगें।
पत्र्ािका के लिए लिखी बच्चों की कुछ रचनाएं
1   चूहा भागा                                                                                    योगेश बधाणी

चूहा भागा   चूहा भागा
देखो उसने मेरा ले गया है धागा
देखो देखो भाग रहा है
जाकर उसे पकडकर लाओ
जैसे ही वह पकडा जाए                                       
उससे मेरा धागा छीना जाए
अगर वह खाए मार दिया जाए
मेरा धागा उसने खोया है
मेज के नीचे सोया है
जाकर उसे पकडकर लाओ
चूहा भागा   चूहा भागा
वह भाग ना पाए।


 2 चूहा भागा                                                                                   नीरज

चूहा भागा बिल से
बडी मुश्किल से
चूहे के दादा वहीं फॅस गये
चूहा भागा बिल से
बडी मुश्किल से
चूहे की दादी वहीं फॅस गयी
चूहा भागा बिल से
बडी मुश्किल से
चूहे का बडा लडका वहीं फॅस गया
चूहा भागा बिल से
बडी मुश्किल से
चूहे की पत्नी वहीं फॅस गयी
चूहा भागा बिल से
बडी मुश्किल से
चूहे की बहन वहीं फॅस गयी
चूहे को आया गुस्सा
उसने मारा डण्डा
तोडा उसने बिल को
वह सब निकले बाहर
खुश हुए बाहर आकर
चूहा भागा बिल से
बडी मुश्किल से।

3  कहानी
स्ीमा का कुत्ता    

 सुबोध कक्षा 4
एक लडकी थी । उसका नाम सीमा था।वह रोज स्कूल जाती थी । उसका स्कूल बहुत दूर था।एक दिन जब वह स्कूल जा रही थी उसको एक कुत्ता मिला । कुत्ते को भूख लगी थी । वह सीमा के पीछे पीछे कूूॅ कॅू करके चलने लगा । फिर वह सीमा की स्र्कट पकडकर खीचने लगा पहले तो सीमा डर गयी फिर उसे देखकर उसे दया आ गयी। वह कुत्ता भूख से बहुत कमजोर हो गया था।उसने अपने पास से उसे बिस्किट खाने कोे दिया।फिर वह स्कूल चली गयी ।जब सीमा की छुट्टी हुयी तो उसने देखा वह कुत्ता गेट पर खडा है । वह सीमा केे पीछे पीछे चलने लगा । सीमा उसे अपने घर ले गयी ।उसने अपनी माॅ को सारी बात बतायी । तबसे वह कुत्ता उसके साथ ही रहने लगा।
4 किसानों ने रोपायी लगायी
अंशिका कक्षा 4
एक गाॅव था ।उसका नाम किशनपुर था। वह एक नही के किनारे था।उस नदी में खूब पानी बहता था। गांव वाले नदी के पानी से अपने खेतों की रोपायी करते थे।एक बार बारिश ना होने से नदी का सारा पानी सूख गया।खेत भी सूख गये।लोगों की रोपायी नहीं हो पा रही थी। सब लोग परेेशान हो गये।वे बार बार आसमान की ओर देखते पर उन्हें एक भी बादल नहीं दिखायी देता। एक रात जब सब लोग सो रहे थे तो जोर जोर की बारिश शुरू हो गयी ।बारिश से नदी में पानी आने लगा । सुबह उठकर लोगों ने देखा नदी मंे खूूब सारा पानी आ गया था ।सब लोग बहुत खुश     हुए ।उन्होने अपने खेतों में पानी लगाया और रोपायी शुरू कर दी।

1 comment:

  1. रेखा चमोली जी शैक्षिक नवाचारों की विविधता के लिए जानी जाती हैं । दीवार पत्रिका पर उनकी यह यात्रा उम्मीदों भरी है । उनमें बच्चों लिए कुछ विशेष कर गुजरने का जज्बा हैं। अभी बहुत कुछ आना शेष है। यह तभी सम्भव होता है जब कोई अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा के साथ साथ बच्चों से अपनेपन का नाता जोड लेता है या जुड जाता है । उनकी यह यात्रा बच्चों को उनकी मंजिल तक पहुँचाते हुए अनवरत जारी रहे‚ इसी शुभकामना के साथ उनके प्रयास को बधाई ।

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