सी.आर.सी. टकाना में २६ दिसंबर से ३० दिसंबर २०१४ तक दीवार पत्रिका सृजन कार्यशाला का आयोजन
किया गया .इस कार्यशाला में राजकीय प्राथमिक विद्यालय टकाना के लगभग
२५ बच्चों ने प्रतिभाग किया. प्रस्तुत इस कार्यशाला की डायरी .
२६-१२-१४
दीवार पत्रिका सृजन कार्यशाला का पहला दिन बहुत अच्छा रहा . बच्चों ने पूरा आनंद लिया . कुछ बच्चे तो हँसते -हँसते लोटपोट होते देखे गए . कुछ कह रहे थे अपने दोस्तों से ..मेरे तो हँसते -हँसते पेट दर्द हो गयी .शरुआत 'इब्नबतूता पहन के जूता' कविता से हुयी .उसके बाद चिंतामणि जोशी जी ने 'शेर और राजा की दोस्ती ' कहानी सुनाई . बच्चों ने पूरे मनोयोग से कहानी सुनी .कहानी में दोहरा संवाद बराबर जारी रहा . डा.सी.बी. जोशी जी ने अपने चुटीले अंदाज से बच्चों को लोटपोट कर दिया .इस तरह 'झिझक मिटाओ सत्र' अपने उद्देश्य में सफल रहा . सभी बच्चे पूरी तरह खुल गए . उन्होंने प्रश्न करने शुरू कर दिए .
दूसरा सत्र 'परिचय सत्र ' था जिसमे सबसे पहले सब्जियों की एक काल्पनिक सभा का जिक्र करते हुए उसमें सब्जियों का परिचय कुछ तुकबंदियों के साथ छोटी-छोटी कविताओं के रूप में दिया गया . बंच्चों को यह अंदाज पसंद आया .उनसे भी इसी अंदाज में अपना-अपना परिचय तैयार करने को कहा गया जिसका बड़े समूह में प्रस्तुतीकरण किया गया .योगेश पाण्डेय जी द्वारा हर एक प्रस्तुतीकरण के बाद अलग-अलग तरह की तालियाँ बजवाई गयी . यह बच्चों के लिए आकर्षण का बिंदु रहा .सभी ने अपने अपने अंदाज में परिचय तो दिया ही साथ ही छुक-छुक ताली,पंजाबी ताली ,जापानी ताली ,ककड़ी ताली , वर्ष ताली , स्काउट ताली ,सामान्य ताली आदि का आनंद लिया .
तीसरे सत्र में समूहीकरण किया गया .कुल २७ बच्चों को पांच छोटे -छोटे समूह में बांटा गया .बच्चों ने अपने-अपने समूहों का नामकरण किया .अपने-अपने समूह का परिचय तैयार किया .इस दौरान बच्चों की ओर से मांग आई कि सर लोगों को भी अपना-अपना परिचय देना चाहिए .अतः आज के दिन के समापन से पहले सभी बच्चे और उपस्थित शिक्षक साथी एक बड़े गोले में खड़े हुए .चंद्रशेखर जोशी जी ने रोचक अंदाज में एक गिनती गीत प्रस्तुत किया और फिर सभी शिक्षक साथियों ने अपना-अपना परिचय दिया .बच्चों से आज के पूरे दिन की गतिविधियों को घर जाकर डायरी में लिखने के लिए कहा गया .
टकाना सी.आर.सी.के समन्वयक मनोज कुमार विश्वकर्मा और गुरना सी .आर.सी. के समन्वयक नरेश पुनेठा और शिक्षक साथी राजेन्द्र जोशी भी उपस्थित रहे .
सी.आर.सी.समन्वयक और शिक्षक साथियों का जिस तरह का सहयोग और समर्थन मिल रहा है वह उत्साहजनक है . सभी अपनी ओर से कुछ न कुछ देने की इच्छा लिए कार्यशाला में उपस्थित हो रहे हैं .कार्यशाला के दौरान अनौपचारिक बातें भी होती रही . कर्मठ और समर्पित शिक्षक साथी चन्द्रशेखर जोशी के प्रयासों से प्रकाशित 'तरंग' पत्रिका को देखने का अवसर मिला .अपने संकुल क्षेत्र के विद्यालयों के शिक्षकों ,अभिभावकों और बच्चों की रचनाओं का उनके द्वारा सुन्दर रूप में संपादन और प्रकाशन किया गया है . यह प्रयास सराहनीय है . इसी तरह का एक प्रयास पिछले दिनों शिक्षक साथी योगेश पाण्डेय द्वारा किया गया था .जोशी जी का कहना था कि उनकी इच्छा है कि इसी तरह की एक पत्रिका पूरे जनपद स्तर पर निकाली जाय जिसमें जनपद के भीतर के शिक्षकों-अभिभावकों और बच्चों की रचनात्मकता को स्थान दिया जाय.आशा है उनकी यह इच्छा भविष्य में जरूर साकार रूप ग्रहण करेगी . मुझे विश्वास है जिले के विभिन्न स्कूलों से निकलने वाली दीवार पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाएँ उस पत्रिका के लिए विषय सामग्री का स्रोत बनेगी . यह जरूरी भी है कि दीवार पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही स्तरीय विषय सामग्री का कहीं न कहीं संकलन होना चाहिए.यह बच्चों की रचनात्मकता को और अधिक बल प्रदान करेगा .
२७-१२-१४
दीवार पत्रिका सृजन कार्यशाला का दूसरा दिन बहुत व्यस्त रहा . शुरुआत शिक्षक साथी किशोर पाटनी द्वारा एक रोचक गतिविधि से की गयी . पहला सत्र 'रंग वीथिका 'का था . सी.बी .जोशी और राजेन्द्र जोशी ने इस सत्र को संचालित किया . बच्चों को फिंगर पपेट बनाना बताया गया . बच्चों ने बहुत रूचि दिखाई . सभी बच्चों ने खुद भी पपेट तैयार की . समय की कमी के चलते प्रदर्शन नहीं हो पाया .
दूसरा सत्र 'पहेली बनाओ' राजीव जोशी द्वारा संचालित किया गया . उन्होंने बच्चों का ध्यान अपनी और आकर्षित करने के लिए 'मोटू राम हलवाई .....' गीत बड़े रोचक ढंग से हावभाव के साथ प्रस्तुत किया . बच्चे उसमें पूरी तरह डूब गए .शिक्षक साथी चिंतामणि जोशी , उपेन्द्र जोशी और योगेश पाण्डेय ने उन्हें सहयोग किया . बच्चों ने समूहवार एक-एक पहेली तैयार की जिसका बड़े समूह में प्रस्तुतीकरण भी किया गया .
तीसरे सत्र का संचालन चिंतामणि जोशी द्वारा किया गया जिसका नाम था -'कल्पनाओं की उड़ान भरो' .प्रत्येक समूह को अलग-अलग विषय दिया गया जिस पर उन्होंने अपनी कल्पनाओं कीउन्मुक्त उड़ान भरी . बच्चों ने बहुत सारी रोचक कल्पनाएँ की
.यह कार्यशाला की बड़ी उपलब्धि है कि जिस भी शिक्षक साथी को कार्यशाला के बारे में पता चल रहा है ,वह स्वेच्छा से अपना योगदान देने पहुँच रहे हैं . आज कुछ नए शिक्षक साथी विनोद बसेड़ा,राजेन्द्र पन्त ,उपेन्द्र जोशी ,राजीव जोशी ,किशोर पाटनी कार्यशाला में उपस्थित हुए .
कार्यशाला में बच्चों के साथ काम करते हुए तो बहुत कुछ सीखने को मिल ही रहा है .शिक्षक साथियों द्वारा की जा रही नयी-नई गतिविधिया भी पूर्वज्ञान में बहुत कुछ जोड़ रही हैं . शिक्षक साथियों से हो रही अनौपचारिक बातचीत से भी बहुत सारा अनुभव मिल रहा है .यह बात भी बार-बार महसूस हो रही है कि भयमुक्त वातावरण में काम करना आसान नहीं है . बहुत अधिक धैर्य की आवश्यकता होती है . कभी-कभी बार-बार आग्रह करने पर भी बच्चे बात पर ध्यान नहीं दे रहे हैं .सभी एक साथ चिल्लाकर अपनी बात कहने की कोशिश कर रहे हैं .जैसे प्रत्येक को यह लगता हो कि यदि वह चिल्लाएगा नहीं तो उसकी बात नहीं सुनी जायेगी . इसलिए उनका ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए बहुत अधिक उर्जा लग रही है . लेकिन अच्छी बात यह है कि अभी तक हर साथी ने अपने धैर्य को बनाए रखा है .
२८-१२-१४
डा.सी.बी.जोशी की कुमाऊनी लोक धुनों और राजीव जोशी की बांसुरी की तान में आबद्ध 'गोनू झा ' की कथा और इस पर बच्चों के तत्काल बोले गए सवादों ने कार्यशाला के तीसरे दिन को जीवंत बना दिया . बच्चे तो बच्चे उपस्थित शिक्षक भी कुछ देर के लिए अपने आप को भूल गए .पूरा वातावरण लोक संस्कृतिमय हो गया . आसपास रहने वाले लोग भी अपनी छतों से उस ओर देखने लगे . बच्चे गोनू झा और उसकी गाय के मुखौटे लगाए हुए थे जिन्हें उनके द्वारा थोड़ी देर पहले राजेन्द्र जोशी और सी.बी.जोशी के निर्देशन में स्वयं तैयार किया गया था . इससे पहले आज के दिन की शुरुआत निर्धारित समय से पूर्व ही शिक्षक साथी योगेश पाण्डेय द्वारा कुछ रोचक खेलों द्वारा हुयी . उसके बाद बच्चों ने अलग-अलग समूहों में बैठकर सामूहिक रूप से कहानी बनायी . दो समूहों ने दिए गए शब्दों तो दो ने दी गयी वस्तुओं के आधार पर कहानी बुनी . शिक्षक साथी चिंतामणि जोशी ने इस सत्र में कहानी बनाने में बच्चों का मार्गदर्शन किया .
तीसरे सत्र 'रूपक रचो ' या 'तुलना करो ' पर था जिसमें बच्चों को कुछ अधूरे वाक्य देते हुए उन्हें अपनी कल्पना से पूरा करने को कहा गया . वाक्य इस प्रकार थे -पेड़ खड़ा है जैसे.....सड़क लेटी है जैसे......घंटी बुला रही है जैसे.....टहनी झूल रही है जैसे .......ताला देख रहा है जैसे .......गाड़ी भाग रही है जैसे ..........बच्चों ने अपने -अपने अंदाज में वाक्य पूरे किये .तीसरा दिन कुल मिलाकर आनंददायी रहा . आपसी बातचीत में यह भी तय किया गया कि कार्यशाला में तैयार की जाने वाली दीवार पत्रिकाओं में एक स्तम्भ 'बड़ों की कलम ' से होगा जिसे शिक्षक साथी तैयार करेंगे ताकि कार्यशाला के दौरान बच्चों के साथ की गयी गतिविधियाँ हमेशा दीवार पत्रिका में उनके साथ रहें .नए शिक्षक साथियों के आने का क्रम आज भी जारी रहा . नए साथी के रूप में चन्द्रबल्लभ जोशी आज कार्यशाला में उपस्थित हुए .कार्यशाला में साथियों की ओर से कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी मिले .योगेश भाई का सुझाव था कि अगली कार्यशाला में अन्य स्कूलों के बच्चों को भी शामिल किया जाय . 'रंग वीथिका' के प्रति बच्चों के उत्साह को देखते हुए सी.बी. भाई का सुझाव था कि अगली एक कार्यशाला पूरी तरह इस पर ही केन्द्रित की जाय . यदि टीम की ऊर्जा इसी तरह बनी रही तो आशा की जानी चाहिए कि भविष्य में इन सुझावों का क्रियान्वयन भी अवश्य होगा .
२९ दिसंबर २०१४
हम थोडा परेशान भी होते रहे हैं कि बच्चे हमारा दिया काम नहीं कर रहे हैं ,जिसका मन जब हो रहा है अपनी जगह से उठकर कहीं दूसरी जगह चल दे रहा है ,अपने ही मन का काम कर रहा है ,किसी का मन झूलने का कर रहा है तो झूलने चल दे रहा है . कोई फिसलन पट्टी के ऊपर बने प्लेटफार्म में बैठ जा रहा है ,बड़े अनुनय -विनय से काम कराना पड़ रहा है , आप कुछ और करना चाह रहे हैं लेकिन बच्चा आपका हाथ पकड़कर अपने साथ बैठा दे रहा है, लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है बच्चे आपके आते ही आपसे लिपट पड़ रहे हैं ,अपने लिए लाये बिस्कुट या फल आपके साथ बाँट रहे हैं ,नहीं लेने पर बार-बार आग्रह कर रहे है ,सबसे बड़ी बात छुट्टी कर देने के बाद भी घर जाने को तैयार नहीं हैं , घर जाने से पहले आपसे हाथ मिला रहे हैं .....कुछ ऐसी ही दृश्य और अनुभवों से रु-ब-रु होने का अवसर मिला है कार्यशाला के पिछले चार दिनों में .ऐसे में एक चुनौती है कि बच्चों को निर्धारित लक्ष्य तक कैसे ले जाया जाय ? अपने मन माफिक काम कैसे कराया जाय? आसान नहीं यह .बिना पूर्व तैयारी ,धैर्य और ऊर्जा के संभव नहीं है .इसके लिए उच्चकोटि की कुशलता की आवश्यकता है. मुझे लगता है कि बच्चों से कुछ सीखने के लिए कहने से अच्छा है कि हम उनके सामने कुछ काम करते रहें .बच्चे उसे देखें . देखते-देखते बच्चों को करने का मन करता है ,वे खुद करने की इच्छा व्यक्त करते हैं . जब इच्छा व्यक्त करें तब उन्हें बताया जाय कैसे करना है ? मैं अक्सर एक ऐसे स्कूल की कल्पना करता हूँ कि जहाँ बच्चों को वह नहीं सिखाया जाय जो बड़े उन्हें सिखाना चाहते हैं ,बल्कि ऐसे अवसर बच्चों को उपलब्ध करवाए जाय जो बच्चे चाहें उसे वे सीख सकें . इस कार्यशाला में बच्चों के व्यवहार को देख एक बार पुनः यह कल्पना मेरे मन में पैदा हुयी .स्कूल में व्यवस्था रुपी मशीन के पुर्जे गढ़ने वालों को यह कल्पना बेसिर पैर की भी लग सकती है.खैर ......
बहरहाल ,कार्यशाला के चौथे दिन वरिष्ठ साथी चिंतामणि जोशी जी के सहयोग से बच्चों के साथ काम करते हुए 'सड़क किनारे स्कूल हमारा ' पंक्ति से शुरू करते हुए कुछ कवितायेँ बनवाई तथा 'जब मुझे बहुत ख़ुशी हुयी' या 'जब मुझे बहुत रोना आया' विषय पर बच्चों से अनुभव लिखवाए . गौर करने वाली बात रही कि सभी बच्चों ने जब मुझे ख़ुशी हुयी विषय पर ही अपने अनुभव लिखे . शिक्षक साथी किशोर पाटनी ने रोचक अंदाज में कहानी सुनाई .शुरू में भले कम रूचि ले रहे थे लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बड़ी बच्चे कहानी से जुड़ते गए .कठपुतली के जानकार राजेन्द्र जोशी ने 'गोनू झा' कहानी पर रिहर्सल अभिनय करवाया .कलानिपुण योगेश पाण्डेय ने अपनी कला का जादू बिखेरते हुए दीवार पत्रिकाओं की नाम पट्टिकाएं तैयार की . चार्ट पेपरों पर रचनाएँ चिपकाने का कार्य भी प्रारम्भ कर दिया गया है .बच्चे अपनी-अपनी रचनाओं को दीवार पत्रिका में देखने के लिए उत्सुक हैं . कुछ न कुछ लिख लाने की ललक बच्चों में दिखाई दे रही है .
३० दिसम्बर २०१४
दीवार पत्रिका सृजन कार्यशाला के पांचवे दिन हमने तय किया कि आज बच्चों को अधिक आजादी देते हुए काम किया जाएगा अर्थात ऐसा करो ..... जैसे निर्देश कम से कम दिए जायेंगे . एक दरी में हम बैठ गए और दूसरी में बच्चे . कुछ शिक्षक साथी चार्ट पर अब तक बच्चों द्वारा लिखी गयी विषय सामग्री को चिपकाने में लग गए और योगेश पाण्डेय सामने टंगे बोर्ड में गोले से विभिन्न आकृतियाँ बनाने लगे . कुछ बच्चे अपनी इच्छा से चिपकाने के कार्य में मदद करने पहुँच गए तो कुछ और पाण्डेय जी को देख-देख चित्र बनाने लगे . कुछ सी-सा में खेलते भी देखे गए उन्हें हमने बुलाया भी नहीं . कुछ आये और पेंटिंग बनाने की इच्छा व्यक्त करने लगे . सब अपने-अपने काम में जुटे रहे. कुछ चार्ट में अपनी रचनाएँ चिपकाते-चिपकाते पिछले दिनों सुनाई गयी कविता -मोटू राम हलवाई गाने लगे .मुझे भी उनके साथ भाग लगाते हुए अच्छा लग रहा था . इसी बीच कुछ बच्चे पाटनी सर के साथ 'स्टेच्यू बनो ' वाला खेल खेलने लगे . एक और खेल चल रहा था दूसरी और दो -तीन बच्चे अपनी ड्राइंग पूरी करने में लगे रहे . एक बच्चा अपनी लिखी डायरी को पूरा करने में व्यस्त देखा गया . कुछ चिंतामणि सर के साथ दीवार पत्रिका को अंतिम रूप देने में लगे . आज शिक्षक -कवि गिरीश चन्द्र पाण्डेय 'प्रतीक' कार्यशाला में आये . उन्होंने कार्यशाला के दौरान ही एक कविता रच बच्चों को सुनाई . कविता में आज के दिन की पूरी कार्यवाही का चित्रण था . बच्चों और उपस्थित शिक्षक साथियों को कविता खूब भाई .कविता का माहौल बना ही था कवि मित्र चिंतामणि जोशी ने भी एक कविता बच्चों को सुनाई . दूसरी ओर दीवार पत्रिका को अंतिम रूप देने का काम जारी रहा . विभिन्न कलाओं में सिद्धहस्त शिक्षक साथी योगेश पाण्डेय कुर्सी में बैठे -बैठे पेपर से विभिन्न आकृतियाँ बनाने लगे ,बच्चों ने उन्हें आ घेरा . घर को जाते-जाते भी बच्चे उनके पास कागज लेकर एक आकृति बनाने का आग्रह करते देखे गए . इसी बीच बच्चों से कार्यशाला के अनुभव को लेकर अपने -अपने दोस्त को एक पत्र लिखने को कहा गया . कुछ ने लम्बा पत्र लिखा ,कुछ एक दो पंक्ति लिखकर घूमने लगे और एक -दो ऐसे थे जिन्होंने उसमें कोई रूचि नहीं दिखाई . बच्चों को घर भेजने के बाद कुछ देर हम लोग कल की कार्ययोजना बनाने के लिए कुछ देर बैठे .तय किया गया कि कल दीवार पत्रिकाओं तथा कार्यशाला के दौरान बच्चों द्वारा तैयार कठपुतलियों व मुखोटों की प्रदर्शनी के साथ-साथ 'रंगवीथिका' के तहत बच्चों द्वारा तैयार 'गोनू झा की कथा ' का अभिनय और कुछ खेल करवाए जायेंगे . इस अवसर पर अभिभावकों को बच्चों के माध्यम से आमंत्रित किया गया है . यह भी तय किया गया कि सभी साथी अपने-अपनी फेसबुक वाल के जरिये रचनात्मक सरोकारों से जुड़े शिक्षकों और अन्य सहृदयों से बच्चों के उत्साहवर्धन हेतु उपस्थित होने की अपील करेंगे .
२६-१२-१४
दीवार पत्रिका सृजन कार्यशाला का पहला दिन बहुत अच्छा रहा . बच्चों ने पूरा आनंद लिया . कुछ बच्चे तो हँसते -हँसते लोटपोट होते देखे गए . कुछ कह रहे थे अपने दोस्तों से ..मेरे तो हँसते -हँसते पेट दर्द हो गयी .शरुआत 'इब्नबतूता पहन के जूता' कविता से हुयी .उसके बाद चिंतामणि जोशी जी ने 'शेर और राजा की दोस्ती ' कहानी सुनाई . बच्चों ने पूरे मनोयोग से कहानी सुनी .कहानी में दोहरा संवाद बराबर जारी रहा . डा.सी.बी. जोशी जी ने अपने चुटीले अंदाज से बच्चों को लोटपोट कर दिया .इस तरह 'झिझक मिटाओ सत्र' अपने उद्देश्य में सफल रहा . सभी बच्चे पूरी तरह खुल गए . उन्होंने प्रश्न करने शुरू कर दिए .
दूसरा सत्र 'परिचय सत्र ' था जिसमे सबसे पहले सब्जियों की एक काल्पनिक सभा का जिक्र करते हुए उसमें सब्जियों का परिचय कुछ तुकबंदियों के साथ छोटी-छोटी कविताओं के रूप में दिया गया . बंच्चों को यह अंदाज पसंद आया .उनसे भी इसी अंदाज में अपना-अपना परिचय तैयार करने को कहा गया जिसका बड़े समूह में प्रस्तुतीकरण किया गया .योगेश पाण्डेय जी द्वारा हर एक प्रस्तुतीकरण के बाद अलग-अलग तरह की तालियाँ बजवाई गयी . यह बच्चों के लिए आकर्षण का बिंदु रहा .सभी ने अपने अपने अंदाज में परिचय तो दिया ही साथ ही छुक-छुक ताली,पंजाबी ताली ,जापानी ताली ,ककड़ी ताली , वर्ष ताली , स्काउट ताली ,सामान्य ताली आदि का आनंद लिया .
तीसरे सत्र में समूहीकरण किया गया .कुल २७ बच्चों को पांच छोटे -छोटे समूह में बांटा गया .बच्चों ने अपने-अपने समूहों का नामकरण किया .अपने-अपने समूह का परिचय तैयार किया .इस दौरान बच्चों की ओर से मांग आई कि सर लोगों को भी अपना-अपना परिचय देना चाहिए .अतः आज के दिन के समापन से पहले सभी बच्चे और उपस्थित शिक्षक साथी एक बड़े गोले में खड़े हुए .चंद्रशेखर जोशी जी ने रोचक अंदाज में एक गिनती गीत प्रस्तुत किया और फिर सभी शिक्षक साथियों ने अपना-अपना परिचय दिया .बच्चों से आज के पूरे दिन की गतिविधियों को घर जाकर डायरी में लिखने के लिए कहा गया .
टकाना सी.आर.सी.के समन्वयक मनोज कुमार विश्वकर्मा और गुरना सी .आर.सी. के समन्वयक नरेश पुनेठा और शिक्षक साथी राजेन्द्र जोशी भी उपस्थित रहे .
सी.आर.सी.समन्वयक और शिक्षक साथियों का जिस तरह का सहयोग और समर्थन मिल रहा है वह उत्साहजनक है . सभी अपनी ओर से कुछ न कुछ देने की इच्छा लिए कार्यशाला में उपस्थित हो रहे हैं .कार्यशाला के दौरान अनौपचारिक बातें भी होती रही . कर्मठ और समर्पित शिक्षक साथी चन्द्रशेखर जोशी के प्रयासों से प्रकाशित 'तरंग' पत्रिका को देखने का अवसर मिला .अपने संकुल क्षेत्र के विद्यालयों के शिक्षकों ,अभिभावकों और बच्चों की रचनाओं का उनके द्वारा सुन्दर रूप में संपादन और प्रकाशन किया गया है . यह प्रयास सराहनीय है . इसी तरह का एक प्रयास पिछले दिनों शिक्षक साथी योगेश पाण्डेय द्वारा किया गया था .जोशी जी का कहना था कि उनकी इच्छा है कि इसी तरह की एक पत्रिका पूरे जनपद स्तर पर निकाली जाय जिसमें जनपद के भीतर के शिक्षकों-अभिभावकों और बच्चों की रचनात्मकता को स्थान दिया जाय.आशा है उनकी यह इच्छा भविष्य में जरूर साकार रूप ग्रहण करेगी . मुझे विश्वास है जिले के विभिन्न स्कूलों से निकलने वाली दीवार पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाएँ उस पत्रिका के लिए विषय सामग्री का स्रोत बनेगी . यह जरूरी भी है कि दीवार पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही स्तरीय विषय सामग्री का कहीं न कहीं संकलन होना चाहिए.यह बच्चों की रचनात्मकता को और अधिक बल प्रदान करेगा .
२७-१२-१४
दीवार पत्रिका सृजन कार्यशाला का दूसरा दिन बहुत व्यस्त रहा . शुरुआत शिक्षक साथी किशोर पाटनी द्वारा एक रोचक गतिविधि से की गयी . पहला सत्र 'रंग वीथिका 'का था . सी.बी .जोशी और राजेन्द्र जोशी ने इस सत्र को संचालित किया . बच्चों को फिंगर पपेट बनाना बताया गया . बच्चों ने बहुत रूचि दिखाई . सभी बच्चों ने खुद भी पपेट तैयार की . समय की कमी के चलते प्रदर्शन नहीं हो पाया .
दूसरा सत्र 'पहेली बनाओ' राजीव जोशी द्वारा संचालित किया गया . उन्होंने बच्चों का ध्यान अपनी और आकर्षित करने के लिए 'मोटू राम हलवाई .....' गीत बड़े रोचक ढंग से हावभाव के साथ प्रस्तुत किया . बच्चे उसमें पूरी तरह डूब गए .शिक्षक साथी चिंतामणि जोशी , उपेन्द्र जोशी और योगेश पाण्डेय ने उन्हें सहयोग किया . बच्चों ने समूहवार एक-एक पहेली तैयार की जिसका बड़े समूह में प्रस्तुतीकरण भी किया गया .
तीसरे सत्र का संचालन चिंतामणि जोशी द्वारा किया गया जिसका नाम था -'कल्पनाओं की उड़ान भरो' .प्रत्येक समूह को अलग-अलग विषय दिया गया जिस पर उन्होंने अपनी कल्पनाओं कीउन्मुक्त उड़ान भरी . बच्चों ने बहुत सारी रोचक कल्पनाएँ की
.यह कार्यशाला की बड़ी उपलब्धि है कि जिस भी शिक्षक साथी को कार्यशाला के बारे में पता चल रहा है ,वह स्वेच्छा से अपना योगदान देने पहुँच रहे हैं . आज कुछ नए शिक्षक साथी विनोद बसेड़ा,राजेन्द्र पन्त ,उपेन्द्र जोशी ,राजीव जोशी ,किशोर पाटनी कार्यशाला में उपस्थित हुए .
कार्यशाला में बच्चों के साथ काम करते हुए तो बहुत कुछ सीखने को मिल ही रहा है .शिक्षक साथियों द्वारा की जा रही नयी-नई गतिविधिया भी पूर्वज्ञान में बहुत कुछ जोड़ रही हैं . शिक्षक साथियों से हो रही अनौपचारिक बातचीत से भी बहुत सारा अनुभव मिल रहा है .यह बात भी बार-बार महसूस हो रही है कि भयमुक्त वातावरण में काम करना आसान नहीं है . बहुत अधिक धैर्य की आवश्यकता होती है . कभी-कभी बार-बार आग्रह करने पर भी बच्चे बात पर ध्यान नहीं दे रहे हैं .सभी एक साथ चिल्लाकर अपनी बात कहने की कोशिश कर रहे हैं .जैसे प्रत्येक को यह लगता हो कि यदि वह चिल्लाएगा नहीं तो उसकी बात नहीं सुनी जायेगी . इसलिए उनका ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए बहुत अधिक उर्जा लग रही है . लेकिन अच्छी बात यह है कि अभी तक हर साथी ने अपने धैर्य को बनाए रखा है .
२८-१२-१४
डा.सी.बी.जोशी की कुमाऊनी लोक धुनों और राजीव जोशी की बांसुरी की तान में आबद्ध 'गोनू झा ' की कथा और इस पर बच्चों के तत्काल बोले गए सवादों ने कार्यशाला के तीसरे दिन को जीवंत बना दिया . बच्चे तो बच्चे उपस्थित शिक्षक भी कुछ देर के लिए अपने आप को भूल गए .पूरा वातावरण लोक संस्कृतिमय हो गया . आसपास रहने वाले लोग भी अपनी छतों से उस ओर देखने लगे . बच्चे गोनू झा और उसकी गाय के मुखौटे लगाए हुए थे जिन्हें उनके द्वारा थोड़ी देर पहले राजेन्द्र जोशी और सी.बी.जोशी के निर्देशन में स्वयं तैयार किया गया था . इससे पहले आज के दिन की शुरुआत निर्धारित समय से पूर्व ही शिक्षक साथी योगेश पाण्डेय द्वारा कुछ रोचक खेलों द्वारा हुयी . उसके बाद बच्चों ने अलग-अलग समूहों में बैठकर सामूहिक रूप से कहानी बनायी . दो समूहों ने दिए गए शब्दों तो दो ने दी गयी वस्तुओं के आधार पर कहानी बुनी . शिक्षक साथी चिंतामणि जोशी ने इस सत्र में कहानी बनाने में बच्चों का मार्गदर्शन किया .
तीसरे सत्र 'रूपक रचो ' या 'तुलना करो ' पर था जिसमें बच्चों को कुछ अधूरे वाक्य देते हुए उन्हें अपनी कल्पना से पूरा करने को कहा गया . वाक्य इस प्रकार थे -पेड़ खड़ा है जैसे.....सड़क लेटी है जैसे......घंटी बुला रही है जैसे.....टहनी झूल रही है जैसे .......ताला देख रहा है जैसे .......गाड़ी भाग रही है जैसे ..........बच्चों ने अपने -अपने अंदाज में वाक्य पूरे किये .तीसरा दिन कुल मिलाकर आनंददायी रहा . आपसी बातचीत में यह भी तय किया गया कि कार्यशाला में तैयार की जाने वाली दीवार पत्रिकाओं में एक स्तम्भ 'बड़ों की कलम ' से होगा जिसे शिक्षक साथी तैयार करेंगे ताकि कार्यशाला के दौरान बच्चों के साथ की गयी गतिविधियाँ हमेशा दीवार पत्रिका में उनके साथ रहें .नए शिक्षक साथियों के आने का क्रम आज भी जारी रहा . नए साथी के रूप में चन्द्रबल्लभ जोशी आज कार्यशाला में उपस्थित हुए .कार्यशाला में साथियों की ओर से कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी मिले .योगेश भाई का सुझाव था कि अगली कार्यशाला में अन्य स्कूलों के बच्चों को भी शामिल किया जाय . 'रंग वीथिका' के प्रति बच्चों के उत्साह को देखते हुए सी.बी. भाई का सुझाव था कि अगली एक कार्यशाला पूरी तरह इस पर ही केन्द्रित की जाय . यदि टीम की ऊर्जा इसी तरह बनी रही तो आशा की जानी चाहिए कि भविष्य में इन सुझावों का क्रियान्वयन भी अवश्य होगा .
२९ दिसंबर २०१४
हम थोडा परेशान भी होते रहे हैं कि बच्चे हमारा दिया काम नहीं कर रहे हैं ,जिसका मन जब हो रहा है अपनी जगह से उठकर कहीं दूसरी जगह चल दे रहा है ,अपने ही मन का काम कर रहा है ,किसी का मन झूलने का कर रहा है तो झूलने चल दे रहा है . कोई फिसलन पट्टी के ऊपर बने प्लेटफार्म में बैठ जा रहा है ,बड़े अनुनय -विनय से काम कराना पड़ रहा है , आप कुछ और करना चाह रहे हैं लेकिन बच्चा आपका हाथ पकड़कर अपने साथ बैठा दे रहा है, लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है बच्चे आपके आते ही आपसे लिपट पड़ रहे हैं ,अपने लिए लाये बिस्कुट या फल आपके साथ बाँट रहे हैं ,नहीं लेने पर बार-बार आग्रह कर रहे है ,सबसे बड़ी बात छुट्टी कर देने के बाद भी घर जाने को तैयार नहीं हैं , घर जाने से पहले आपसे हाथ मिला रहे हैं .....कुछ ऐसी ही दृश्य और अनुभवों से रु-ब-रु होने का अवसर मिला है कार्यशाला के पिछले चार दिनों में .ऐसे में एक चुनौती है कि बच्चों को निर्धारित लक्ष्य तक कैसे ले जाया जाय ? अपने मन माफिक काम कैसे कराया जाय? आसान नहीं यह .बिना पूर्व तैयारी ,धैर्य और ऊर्जा के संभव नहीं है .इसके लिए उच्चकोटि की कुशलता की आवश्यकता है. मुझे लगता है कि बच्चों से कुछ सीखने के लिए कहने से अच्छा है कि हम उनके सामने कुछ काम करते रहें .बच्चे उसे देखें . देखते-देखते बच्चों को करने का मन करता है ,वे खुद करने की इच्छा व्यक्त करते हैं . जब इच्छा व्यक्त करें तब उन्हें बताया जाय कैसे करना है ? मैं अक्सर एक ऐसे स्कूल की कल्पना करता हूँ कि जहाँ बच्चों को वह नहीं सिखाया जाय जो बड़े उन्हें सिखाना चाहते हैं ,बल्कि ऐसे अवसर बच्चों को उपलब्ध करवाए जाय जो बच्चे चाहें उसे वे सीख सकें . इस कार्यशाला में बच्चों के व्यवहार को देख एक बार पुनः यह कल्पना मेरे मन में पैदा हुयी .स्कूल में व्यवस्था रुपी मशीन के पुर्जे गढ़ने वालों को यह कल्पना बेसिर पैर की भी लग सकती है.खैर ......
बहरहाल ,कार्यशाला के चौथे दिन वरिष्ठ साथी चिंतामणि जोशी जी के सहयोग से बच्चों के साथ काम करते हुए 'सड़क किनारे स्कूल हमारा ' पंक्ति से शुरू करते हुए कुछ कवितायेँ बनवाई तथा 'जब मुझे बहुत ख़ुशी हुयी' या 'जब मुझे बहुत रोना आया' विषय पर बच्चों से अनुभव लिखवाए . गौर करने वाली बात रही कि सभी बच्चों ने जब मुझे ख़ुशी हुयी विषय पर ही अपने अनुभव लिखे . शिक्षक साथी किशोर पाटनी ने रोचक अंदाज में कहानी सुनाई .शुरू में भले कम रूचि ले रहे थे लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बड़ी बच्चे कहानी से जुड़ते गए .कठपुतली के जानकार राजेन्द्र जोशी ने 'गोनू झा' कहानी पर रिहर्सल अभिनय करवाया .कलानिपुण योगेश पाण्डेय ने अपनी कला का जादू बिखेरते हुए दीवार पत्रिकाओं की नाम पट्टिकाएं तैयार की . चार्ट पेपरों पर रचनाएँ चिपकाने का कार्य भी प्रारम्भ कर दिया गया है .बच्चे अपनी-अपनी रचनाओं को दीवार पत्रिका में देखने के लिए उत्सुक हैं . कुछ न कुछ लिख लाने की ललक बच्चों में दिखाई दे रही है .
३० दिसम्बर २०१४
दीवार पत्रिका सृजन कार्यशाला के पांचवे दिन हमने तय किया कि आज बच्चों को अधिक आजादी देते हुए काम किया जाएगा अर्थात ऐसा करो ..... जैसे निर्देश कम से कम दिए जायेंगे . एक दरी में हम बैठ गए और दूसरी में बच्चे . कुछ शिक्षक साथी चार्ट पर अब तक बच्चों द्वारा लिखी गयी विषय सामग्री को चिपकाने में लग गए और योगेश पाण्डेय सामने टंगे बोर्ड में गोले से विभिन्न आकृतियाँ बनाने लगे . कुछ बच्चे अपनी इच्छा से चिपकाने के कार्य में मदद करने पहुँच गए तो कुछ और पाण्डेय जी को देख-देख चित्र बनाने लगे . कुछ सी-सा में खेलते भी देखे गए उन्हें हमने बुलाया भी नहीं . कुछ आये और पेंटिंग बनाने की इच्छा व्यक्त करने लगे . सब अपने-अपने काम में जुटे रहे. कुछ चार्ट में अपनी रचनाएँ चिपकाते-चिपकाते पिछले दिनों सुनाई गयी कविता -मोटू राम हलवाई गाने लगे .मुझे भी उनके साथ भाग लगाते हुए अच्छा लग रहा था . इसी बीच कुछ बच्चे पाटनी सर के साथ 'स्टेच्यू बनो ' वाला खेल खेलने लगे . एक और खेल चल रहा था दूसरी और दो -तीन बच्चे अपनी ड्राइंग पूरी करने में लगे रहे . एक बच्चा अपनी लिखी डायरी को पूरा करने में व्यस्त देखा गया . कुछ चिंतामणि सर के साथ दीवार पत्रिका को अंतिम रूप देने में लगे . आज शिक्षक -कवि गिरीश चन्द्र पाण्डेय 'प्रतीक' कार्यशाला में आये . उन्होंने कार्यशाला के दौरान ही एक कविता रच बच्चों को सुनाई . कविता में आज के दिन की पूरी कार्यवाही का चित्रण था . बच्चों और उपस्थित शिक्षक साथियों को कविता खूब भाई .कविता का माहौल बना ही था कवि मित्र चिंतामणि जोशी ने भी एक कविता बच्चों को सुनाई . दूसरी ओर दीवार पत्रिका को अंतिम रूप देने का काम जारी रहा . विभिन्न कलाओं में सिद्धहस्त शिक्षक साथी योगेश पाण्डेय कुर्सी में बैठे -बैठे पेपर से विभिन्न आकृतियाँ बनाने लगे ,बच्चों ने उन्हें आ घेरा . घर को जाते-जाते भी बच्चे उनके पास कागज लेकर एक आकृति बनाने का आग्रह करते देखे गए . इसी बीच बच्चों से कार्यशाला के अनुभव को लेकर अपने -अपने दोस्त को एक पत्र लिखने को कहा गया . कुछ ने लम्बा पत्र लिखा ,कुछ एक दो पंक्ति लिखकर घूमने लगे और एक -दो ऐसे थे जिन्होंने उसमें कोई रूचि नहीं दिखाई . बच्चों को घर भेजने के बाद कुछ देर हम लोग कल की कार्ययोजना बनाने के लिए कुछ देर बैठे .तय किया गया कि कल दीवार पत्रिकाओं तथा कार्यशाला के दौरान बच्चों द्वारा तैयार कठपुतलियों व मुखोटों की प्रदर्शनी के साथ-साथ 'रंगवीथिका' के तहत बच्चों द्वारा तैयार 'गोनू झा की कथा ' का अभिनय और कुछ खेल करवाए जायेंगे . इस अवसर पर अभिभावकों को बच्चों के माध्यम से आमंत्रित किया गया है . यह भी तय किया गया कि सभी साथी अपने-अपनी फेसबुक वाल के जरिये रचनात्मक सरोकारों से जुड़े शिक्षकों और अन्य सहृदयों से बच्चों के उत्साहवर्धन हेतु उपस्थित होने की अपील करेंगे .
एक सार्थक पहल।
ReplyDeleteमुझे यह कहते हुए प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है की,दीवार पत्रिका एक अभियान ,दिन दूना रात चौगुना बृद्धि को प्राप्त हो रही है। हमारे कुछ शिक्षक साथी बड़ी निष्ठां से इस कार्य में लगे है
ReplyDeleteऔर आशा ही नहीं विश्वास भी है कि प्रदेश का देश का हर शिक्षक इसको बच्चों तक पहुंचाएगा ।दीवार पत्रिका और सशक्त माध्यम हो सकती है अगर इसके क्षेत्र को केवल भाषा और साहित्य तक ही सीमित न किया जाय वरन हर उस विषय को इसमें संजोया जाय जो व्यवहारिक रूप से हमारे और बच्चों के लिए जरूरी हो।
पुनेठा सर से निवेदन होगा दखल पत्रिका में एक स्तम्भ दीवार पत्रिका का हो ।जिसमे दीवार पत्रिका की गतिविधियाँ शामिल की जाएँ।
दीवार पत्रिका की गतिविधियाँ उच्च स्तर तक पहुचाई जाएँ
मीडिया की सहायता भी इसमें कारगर हो सकती है
जनपद में एक दीवार पत्रिका समूह भी हो तो अच्छा हो।
जिसके माध्यम से इसे एक व्यापक रूप दिया जा सके।अधिकारी वर्ग,तथा नीति नियंताओं तक बात सही तरीके से पहुँच सके
कुल मिलाकर यह अभियान एक खजाना समेटे हुए है। जिसे खोलने की चाबी हम सब को ढूंढनी है या बनानी है
धन्यवाद
टकाना कार्यशाला सफलता का एक पायदान है। जिसे हमें आगे बढ़ाना होगा ।सभी साथियों व पुनेठा जी को बहुत साधुवाद।
ReplyDeleteis tarah kee karyshalayen desh ke har hisse men hona chahiye.shikshak bandhu aage aayen,bachcho ko rachnatamak-samvedansheel banayen!!
ReplyDeleteबढ़िया प्रयास।बधाई।
ReplyDeleteBahut sarthak prayas hai. Shubhkamnayen
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